"और जब मैं छोटी थी. --मासूमियत से समझदारी तक का सफर---"
और जब मैं छोटी थी.....
और जब मैं छोटी थी…
ज़िन्दगी बहुत साधारण सी ही थी…
ख़ुशी का मतलब सिर्फ इतना होता था कि—
माँ की गोद, पिताजी की उंगली
और शाम को गली में अपने दोस्तों के साथ खेलना।
बस… हम्म्म…
मुझे याद है,
जब छोटी-सी बात पर दिल भर आता था…
ख़ुशी में बिना मतलब के हंस पड़ती थी…
न फ्यूचर का बोझ था,
न ही लोगों की सोच का डर।
सपने तब भी थे… पर मासूम थे।
मैं जब छोटी थी,
सपने बहुत बड़े नहीं थे…
बस इतना चाहती थी कि—
सब हमेशा साथ रहें।
किसी को खोने का ख्याल भी डराता था,
पर लगता था—
ऐसा होता ही नहीं है।
तब मुझे नहीं पता था
कि ज़िन्दगी सिर्फ स्कूल और खेल का नाम नहीं…
ये इम्तहान भी लेती है।
फिर धीरे-धीरे
मैं बड़ी होने लगी…
और जैसे-जैसे बड़ी हुई,
ज़िन्दगी ने रंग बदलने शुरू कर दिए।
लोग जो पहले अपने लगते थे,
उनका रवैया बदलने लगा।
मैं सीखने लगी—
चुप रहना,
समझना,
और खुद को संभालना।
मुझे पहली बार एहसास हुआ,
कि हर आंसू दिखाने के लिए नहीं होते…
और हर दर्द
बताया भी नहीं जा सकता।
और जब मैं छोटी थी—
मैं सिर्फ महसूस करती थी…
आज मैं समझती हूँ।
आज मुझे पता है—
हर कोई साथ नहीं देता,
लेकिन खुद का साथ
सबसे ज़रूरी होता है।
ज़िन्दगी ने मुझे
टूटना भी सिखाया
और खुद को जोड़ना भी।
आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ,
तो उस छोटी-सी लड़की को
गले लगाने का मन करता है।
उससे कहना चाहती हूँ…
बचपन तो सबका मासूम होता है…
वो मासूमियत ही तो बचपन है।
"तू कमजोर नहीं थी…
बस, तुझे ज़िन्दगी का पता नहीं था।"
आज अगर मैं STRONG हूँ…
सिर्फ इसलिए क्योंकि
मैंने हर दर्द से
कुछ सीखा।
हम्म्म…
बहुत कुछ…
ज़िन्दगी जीने के लिए,
ज़िन्दगी से भागने के लिए नहीं।
पर अच्छा लग रहा है…
ऐसा लग रहा है,
एक नई इंसान बन रही हूँ…
और अब…
जब मैं इस सफर को थोड़ा और समझने लगी हूँ,
तो महसूस होता है—
बड़ा होना सिर्फ उम्र का बढ़ना नहीं होता,
बल्कि सोच का बदलना भी होता है।
पहले छोटी-छोटी बातों पर
रो लिया करती थी…
अब बड़ी-बड़ी बातों को
मुस्कुराकर सहना सीख लिया है।
पहले जब कोई अपना
थोड़ा सा भी दूर होता था,
तो लगता था—
दुनिया ही खत्म हो गई।
अब समझ आ गया है—
दूरियां भी
रिश्तों की सच्चाई सिखा देती हैं।
ज़िन्दगी ने
कभी-कभी बहुत थकाया भी…
ऐसे पल भी आए,
जब लगा—
अब आगे चलना मुश्किल है।
पर हर बार,
अंदर कहीं एक छोटी-सी आवाज़ उठी—
"रुकना मत…
अभी बहुत कुछ बाकी है।"
कभी-कभी रात के सन्नाटे में
जब सब सो जाते हैं,
तो मन चुपचाप
पुरानी यादों के पन्ने पलटने लगता है।
वो बचपन की हंसी…
वो दोस्तों के साथ की शरारतें…
वो माँ की डांट में छुपा प्यार…
और पिताजी की चुप्पी में छुपी चिंता…
सब कुछ
एक-एक कर
आंखों के सामने आ जाता है।
और तब एहसास होता है—
हम चाहे जितने भी बड़े हो जाएं,
हमारे अंदर एक बच्चा
हमेशा ज़िंदा रहता है।
वो बच्चा
जो छोटी-छोटी खुशियों में
आज भी मुस्कुरा सकता है…
जो थोड़ी-सी मोहब्बत पाकर
आज भी खिल उठता है।
आज मैं समझती हूँ—
मजबूत होना
मतलब ये नहीं कि
कभी रोना नहीं चाहिए।
मजबूत होना
मतलब ये है—
रोकर भी
खुद को फिर से खड़ा करना।
ज़िन्दगी ने
कई बार गिराया,
पर हर बार
उठना भी सिखाया।
कई बार
लोगों ने साथ छोड़ा,
पर हर बार
खुद का हाथ पकड़ना भी सिखाया।
और आज…
जब मैं खुद को आईने में देखती हूँ,
तो उस चेहरे में
सिर्फ एक औरत नहीं,
बल्कि एक सफर दिखाई देता है।
एक ऐसा सफर—
जो मासूमियत से शुरू हुआ था,
और समझदारी तक पहुंचा है।
"क्या आपको भी
कभी-कभी ऐसा लगता है…?" (SHARE KIJIYE)
कि अंदर कहीं
एक छोटी-सी बच्ची
आज भी बैठी है—
जो बस
थोड़ी-सी खुशी चाहती है,
थोड़ा-सा सुकून चाहती है।
अगर हाँ…
तो चलो,
आज कुछ नया किया जाए।
एक नई सोच के साथ
उन पलों को फिर से जिया जाए…
थोड़ा-सा बचपन
आज भी अपने अंदर बचाकर रखा जाए…
थोड़ी-सी मासूमियत
आज भी जी ली जाए…
क्योंकि
बड़ा होना ज़रूरी है,
पर बचपन को भूल जाना
ज़रूरी नहीं।
तो चलो…
आज फिर
थोड़ा-सा मुस्कुराया जाए,
थोड़ा-सा खुद को समझा जाए…
चलो फिर आज
बड़े हो जाएं…
पर कुछ बड़प्पन के साथ
बचपन को भी जिया जाए।
*❖ सवाल 1:**
क्या आपको भी कभी ऐसा लगता है…( COMEENT)
कि आपके अंदर आज भी एक छोटी-सी बच्ची या बच्चा चुपचाप बैठा है,
जो बस थोड़ी-सी खुशी और अपनापन चाहता है?
**❖ जवाब:**
शायद हाँ…
क्योंकि उम्र चाहे जितनी बढ़ जाए,
दिल के किसी कोने में बचपन
कभी पूरी तरह बड़ा नहीं होता।
वो आज भी छोटी-छोटी बातों पर मुस्कुराना चाहता है,
और कभी-कभी
बिना वजह रो भी लेना चाहता है।
**❖ सवाल 2:**
क्या आपको भी कभीअपने छोटे वाले( बचपन वाले )रूप को देखकर
उसे गले लगाने का मन करता है?
**❖ जवाब:**
मन तो बहुत करता है…
उस मासूम चेहरे को देखकर
बस इतना कहना चाहता है दिल—
"तू गलत नहीं थी…
तू बस मासूम थी।
तुझे दुनिया की सच्चाई
अभी पता नहीं थी।"
**❖ सवाल 3**
क्या कभी ऐसा लगा
कि ज़िन्दगी ने आपको
आपकी सोच से ज्यादा मजबूत बना दिया?
**❖ जवाब:**
हाँ…
क्योंकि हर दर्द
कुछ न कुछ सिखाकर जाता है।
हर ठोकर
एक नई समझ दे जाती है।
और धीरे-धीरे
हम वो बन जाते हैं,
जिसके बारे में
कभी सोचा भी नहीं था—
**एक मजबूत इंसान।**
KHAMOSH KALAM WHISPERS :---
मेरी **खामोश कलम**
आज बस इतना कहना चाहती है—
अगर ज़िन्दगी ने
आपको समय से पहले बड़ा कर दिया है…
तो कोई बात नहीं।
पर अपने अंदर के
उस छोटे-से बच्चे को
कभी मरने मत देना।
क्योंकि वही बच्चा
आपको हर दर्द के बाद
फिर से मुस्कुराना सिखाता है…
और वही बच्चा
आपको याद दिलाता है—
**कि ज़िन्दगी
सिर्फ जिम्मेदारियों का नाम नहीं,
बल्कि उन छोटी-छोटी खुशियों का नाम भी है
जो हमें जीने की वजह देती हैं।**
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एक सफर मासूमियत से समझदारी तक
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