बुधवार, 28 जनवरी 2026

जब मैं छोटी थी --मासूमियत से समझदारी तक का सफर

और जब मैं  छोटी थी.......
            
       एक सफर मासूमियत से समझदारी तक

 और जब मैं   बहुत छोटी थी 
ज़िन्दगी बहुत साधारण सी ही थी...
ख़ुशी का मतलब सिर्फ इतना होता था कि 

माँ की गोद , पिताजी की उगंली 
और शाम को गली में अपने दोस्तों के साथ खेलना।

बस ......हम्म्म 
मुझे याद है 
जब छोटीसी  बात पर दिल भर आता था
 ख़ुशी में बिना मतलब के हंस पड़ती थी 
न फ्यूचर का बोझ था
 न ही लोगों की सोच का डर

सपने तब भी थे। ... पर मासूम थे 

मैं  जब छोटी थी सपने बहुत बड़े nahi थे 
बस इतना चाहती  थी की
सब हमेशा साथ रहे 
किसी को खोने का ख्याल भी डरा
पर लगता था ऐसा होता ही नहीं है  

तब मुझे नहीं पता था 
कि ज़िन्दगी सिर्फ स्कूल और खेल का नाम नहीं 
ये इम्तहान भी लेती है 

फिर धीरे धीरे मैं  बड़ी होने लगी 

और जैसे जैसे  बड़ी हुई 
ज़िन्दगी ने रंग बदलने शुरू कर दिए 
लोग जो पहले अपने लगते थे,
उनका रैवैया बदलने लगा 

मैं सीखने लगी ---
चुप रहना ,
समझना ,
और खुद को संभालना |
मुझे पहली बार एहसास हुआ,
की हर आंसू दिख ाने के लिए नहीं होते 
और हर दर्द बत ाया भी नहीं जा सकता 

और जब मैं  छोटी थी ---मैं सिर्फ महसूस करती थी
 
आज मैं  समझती हूँ ,
आज मुझे पता है हर कोई साथ नहीं देता. 
लेकिन खुद का साथ सब से ज़रूरी होता है . 

ज़िन्दगी ने मुझे टूटना भी सिखाया 
और खुद को जोड़ना  भी ,

आज जब मैं पीछे मुड़ कर देखती हूँ  
तो  उस छोटी सी लड़की को गले लगाने का मन करता है .

उससे कहना चाहती  हूँ। ...
बचपन तो सब का मासूम होता है...
 वो मासूमियत ही तो बचपन है 
"तू कमजोर नहीं थी 
बस, तुझे ज़िन्दगी का पता नहीं था "

आज अगर मैं  स्ट्रांग हूँ ......
 सिर्फ इसलिए क्यूंकि 
मैंने हर दर्द से कुछ सीखा 


 हम्म्म बहुत कुछ ......

ज़िन्दगी जीने केलिए 
ज़िन्दगी से भागने के लिए नहीं। ....

पर अच्छा लग रहा है। ..
ऐसा लग रहा है ,
एक नयी इंसान बन रही हूँ 


क्या आपको भी ऐसा लग रहा है.?
तो चलो कुछ किया जाये ,
एक नयी सोच के साथ 
उन पलों  को जिया जाये .
 
 
चलो फिर आज बड़े हो जाये। .....कुछ बड़पन के साथ भी जीया  जाये
 

धन्यवाद। ........

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