मंगलवार, 17 मार्च 2026

आओ बात करे....बस बात ....मेरी नन्ही परी ने जब ये नाम दिया

 CHAPTER -4

आओ बात करे .....बस बात

हाँ, आप से ही कह रही हूँ ... 

 आइये ..... ज़रा बैठिये।

कोई जल्दी नहीं  है। ...

बस कुछ लम्हे.......

जो शयद हम रोज़ सोचते है

 पर  कह नहीं  पाते। ..

(आओ... बात करें.....बस बात) 

ये  लफ्ज़ , मैंने कही से चुराए नहीं 

ये शब्द .......जब मेरी बेटी २ साल की थी,

 तब वो मेरी ऊँगली पकड़ कर ,

पास बैठा लेती थी और बोलती 

मम्मी...... "आओ ना ... बात करें" ....और 

 मैं सब काम छोड़ कर उससे बात करती थी


न उसे कोई कहानी  चाहिए थी,

 न ही कोई सवाल। .....

बस मेरा होना काफी था, 

कोई अपना जो साथ हो  

बिना कहे समझने  वाला........

बच्चों को वक़्त देना बहुत ज़रूरी है, 


कुछ भी लौट कर नहीं आता ,लेकिन जब अपने बच्चे ,

सामने होते है तो जैसे बचपन फिर से लौट आता हैं।

 जब भी वक़्त बच्चो के साथ मिले उसे पूरा enjoy कीजिये 

एक बार उनके साथ बच्चा बन कर देखिये, 

"सब काम एक तरफ... वो पल"....


लेकिन आज के इंसान की सबसे बड़ी  सच्चाई यही है कि 

इतनी बड़ी CONTACT LIST पर बात है....

पर CONNECTION ZERO....

सब के नंबर PHONE में हैं ... पर दिल के पास कोई  नहीं ,


कभी कभी बात करने का मन होता है 

पर उस CONTACT LIST में  कोई नह ी होता, 

जिसे बिना सोचे हम बात कर  ले....


क्यों? ...आख़िर  क्यों? .....

आखिर हम इतने व्यस्त कहा होते जा रहे? 

जो रिश्तों को खोते जा रहे....


आज लोग ONLINE बहुत हैं 

पर AVAILABLE नहीं।।।।।


STATUS लगा लेंगे ,

REEL पर दिखाई  देंगे ,

पर कॉल आ जाये ,तो मन कहता है...

अभी बात नह करनी .....


जब  नार्मल बात नहीं होती,

 फिर जो होती है ।

वो होती है थकान  की...ख़ामोशी की...

अंदर भरी हुई बातो की(भीड़).....

और ये वो बाते है, जो हर किसी से नह ी  होती।।।।


इसलिए इंसान अकेला नहीं होता ,

बस थका होता है 

कर वक़्त STRONG बन  कर ,

समझ समझ कर, 

चुप रह कर, 

शयद इसीलिए फ़ोन हाथ में होते हुए भी,

 डायल करने का मन नहीं होता .

और फिर वही अकेलेपन ......


 "क्यों ना.... इसलिए अकेलेपन से ही जीत लिए जाये।।।

खुद को "

आओ बात करे। .. 

खुद के भरोसे को वापिस लाये। .. "मैं खुद ही हु। ..जो भी हूँ "


ना कोई और है... ना ही हो सकता है 

ये बात किसी और को नहीं खुद को बताने है 

आओ प्यार करे......  

खुद से ......

आओ इंतज़ार करे खुद का..

आखिर .... हम कब खुद के लिए खुद को फ्री कर पाएंगे .

(आओ... बात करें.....बस बात) .........

सोमवार, 16 मार्च 2026

"ऐ मुसाफ़िर ....कौन खुश है तुझसे ....और तूने किसको खुश करना है?"

 

ऐ मुसाफ़िर… ज़रा खुद से पूछ

कौन खुश है तुझसे…
और तुझे किसको खुश करना है?

ज़िन्दगी की इस धारा में
तुझे आखिर
अकेले ही उतरना है।

भीड़ बहुत मिलेगी रास्तों में,
सलाहों की दुकानें भी सजी होंगी।
हर मोड़ पर कोई न कोई
तुझे सही रास्ता बताने को खड़ा होगा।

और मज़े की बात यह है कि
उनमें से आधे लोग
खुद ही अपने रास्ते
भूलकर आए होंगे।

कोई कहेगा—
“यह मत करो, लोग क्या कहेंगे?”

कोई कहेगा—
“ऐसे जीयो, वैसे मत जीओ।”

और कोई तो इतना चिंतित होगा
तुम्हारी ज़िन्दगी के बारे में,
कि तुमसे भी ज़्यादा
परेशान दिखाई देगा।

पर सच पूछो तो
उसे तुम्हारी ज़िन्दगी से नहीं,
तुम्हारे फैसलों से
समस्या होती है।

ज़िन्दगी भी बड़ी दिलचस्प चीज़ है।

जब हम छोटे होते हैं
तो लोग कहते हैं—
“बेटा पढ़ लो, ज़िन्दगी बन जाएगी।”

जब पढ़ लेते हैं
तो कहते हैं—
“अब नौकरी करो, ज़िन्दगी बन जाएगी।”

जब नौकरी कर लेते हैं
तो कहते हैं—
“अब शादी कर लो, ज़िन्दगी बन जाएगी।”

और जब शादी हो जाती है
तो वही लोग पूछते हैं—
“इतने परेशान क्यों रहते हो?”

सच में…

कभी-कभी लगता है
ज़िन्दगी से ज़्यादा
लोगों की उम्मीदें
थका देती हैं।

ऐ मुसाफ़िर,
थोड़ा रुक

ज़रा खुद से पूछ—

क्या तू सच में वही कर रहा है
जो तेरे दिल को सुकून देता है?

या इस डर से जी रहा है
कि कहीं कोई नाराज़
न हो जाए?

क्योंकि अगर
हर किसी को खुश करने निकल पड़े
तो एक दिन पता चलेगा—

सब खुश हैं…
सिवाय तेरे।

और यह दुनिया भी कमाल है।

अगर तू सफल हो गया
तो लोग कहेंगे—

“हमें तो पहले ही पता था।”

और अगर ठोकर खा गया
तो वही लोग कहेंगे—

“हमें तो पहले ही शक था।”

मतलब…

तुम जीतो
तो भी कहानी उनकी।

तुम हारो
तो भी कहानी उनकी।

इसलिए बेहतर है
कि कम से कम
कहानी अपनी लिखो।

ज़िन्दगी की इस धारा में
उतरना तो पड़ेगा ही।

कभी लहरें साथ देंगी,
कभी हिचकोले भी मिलेंगे।

कभी लगेगा
सब कुछ आसान है।

और कभी ऐसा भी लगेगा
जैसे किस्मत ने
छुट्टी ले ली हो

पर सच यही है—

अगर तुम पार हो गए
तो ज़िन्दगी संवर जाएगी।

और अगर बीच में ही
डर गए
तो वही हिचकोले
पूरी ज़िन्दगी का
किस्सा बन जाएँगे।

कभी-कभी ज़िन्दगी
हमें हल्का सा धक्का भी देती है
ताकि हम समझ जाएँ
कि हम खड़े कहाँ हैं।

पर हम इंसान भी
बड़े दिलचस्प होते हैं।

संकेत साफ़ होते हैं,
फिर भी समझने में
पूरी उम्र लगा देते हैं।

और फिर एक दिन
अचानक कहते हैं—

“काश…
थोड़ा पहले समझ जाता।”

इसलिए ऐ मुसाफ़िर…

अब संभल जा।

क्योंकि लौटकर
फिर इसी दुनिया की दलदल में
आना पड़ेगा।

और अगर हर बार
वही गलती दोहराई
तो ज़िन्दगी भी कहेगी—

“भाई… कुछ तो नया कर लो।”

देखो,
तुम्हें रोकने का
मुझे कोई शौक नहीं।

मैं तो बस इतना जानता हूँ कि
ज़िन्दगी की किताब में
हर पन्ने का हिसाब
कभी न कभी सामने आता है।

और जब आता है
तो बड़ी शांति से पूछता है—

**“जो जीना था…
वो जिया?

या बस
दूसरों को खुश करते रहे?”**

तो ऐ मुसाफ़िर…

इतना भी गंभीर मत हो
कि ज़िन्दगी बोझ लगने लगे।

थोड़ा हँस भी लिया कर,
थोड़ा खुद पर
मुस्कुरा भी लिया कर।

क्योंकि सच कहूँ—

ज़िन्दगी उतनी मुश्किल नहीं होती
जितना हम उसे
दूसरों की उम्मीदों से
बना देते हैं।

तो अब फिर वही सवाल—

कौन खुश है तुझसे?
और तुझे किसको खुश करना है?

अगर जवाब मिल जाए
तो समझ लेना
तुम्हारी आधी ज़िन्दगी
संवर गई।

और अगर जवाब
अभी न मिले…

तो कोई बात नहीं।

मुसाफ़िर हो…

चलते-चलते
कभी न कभी
मिल ही जाएगा।

बस… चलते रहो।

."जब तक हम खुद को खुश रखना नहीं सीख लेते, किसीको कैसे खुश रख सकते है ?"

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

आओ बात करे---चकमक पत्थर से कृत्रिम बुद्धिमत्ता(AI ) तक

आओ बात करें — सोच बदलने से क्या बदलेगा?

chapter --6 

आजकल हम अक्सर एक वाक्य सुनते हैं—

“सोच बदलो, समाज बदलेगा।”

यह बात सुनने में अच्छी लगती है,

लेकिन कभी-कभी मन में एक सवाल भी उठता है—

आख़िर समाज को बदलने की ज़रूरत क्यों है?

क्या हमारे माता-पिता और बुजुर्गों की सोच गलत थी?


क्या वे कम समझदार थे?

उन्होंने वही सिखाया  जो उन्हें सही लगा, क्योंकि उनका

उद्देश्य हमेशा हमारा भला ही था।

            तो फिर आज हर जगह सोच बदलने की बात क्यों की जा रही है?


बदलाव का मतलब विरोध नहीं होता

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि सोच बदलने का मतलब

अपने बुजुर्गों को गलत साबित करना नहीं होता।

असल में बदलाव का मतलब है—

समझ का विस्तार।

समय बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं और इंसान के सामने नई चुनौतियाँ आती हैं।

ऐसे में सोच का विकसित होना स्वाभाविक है।


सोच के विकास को समझने के लिए एक उदाहरण

अगर हम पुराने समय को देखें, तो लोग चकमक पत्थर से आग जलाते थे।

फिर समय बदला और माचिस का आविष्कार हुआ।

इसके बाद लाइटर आया, जिसने आग जलाना और आसान बना दिया।

आज के दौर में तो इलेक्ट्रिक उपकरणों से भी गर्मी और आग पैदा की जा सकती है।

क्या इसका मतलब यह है कि पहले का तरीका गलत था?

बिलकुल नहीं।

उस समय के हिसाब से वही सबसे बेहतर और उपयोगी तरीका था।

लेकिन जैसे-जैसे समय आगे बढ़ा, वैसे-वैसे नए साधन और नई सोच सामने आती गई।

यही प्रक्रिया प्रगति कहलाती है।


पुरानी सीख और नई समझ का संतुलन

हमारे बुजुर्गों ने हमें जो मूल्य सिखाए हैं,

वे हमारी मजबूत नींव हैं।

लेकिन हर नई पीढ़ी उस नींव पर

एक नई मंज़िल बनाती है।

अगर हम सिर्फ पुरानी बातों को ही पकड़े रहेंगे, तो आगे बढ़ना मुश्किल हो जाएगा।

और अगर हम पुरानी सीख को पूरी तरह नकार देंगे, तो हमारी जड़ें कमजोर हो जाएंगी।

इसलिए सही रास्ता यही है कि

पुरानी सीख और नई समझ के बीच संतुलन बनाया जाए।


क्या नई पीढ़ी सच में ज्यादा समझदार है?

आज के समाज में कभी-कभी ऐसा लगता है कि नई पीढ़ी खुद को

बहुत ज्यादा समझदार मानने लगी है।

लेकिन असली समझदारी यह नहीं है कि हम पुरानी पीढ़ी को गलत साबित करें।

सच्ची समझदारी यह है कि

हम अपने बुजुर्गों का सम्मान करें
उनकी बातों और अनुभव को समझें
और फिर समय के अनुसार उसमें सुधार करें

क्योंकि बिना सम्मान के किया गया बदलाव अक्सर अहंकार में बदल जाता है।


समाज कैसे बदलता है?

समाज कभी भी अचानक नहीं बदलता।

यह बदलाव धीरे-धीरे आता है।

जब लोग सवाल पूछते हैं,

जब लोग सोचते हैं,

जब लोग नई चीज़ों को समझने की कोशिश करते हैं—

तभी समाज आगे बढ़ता है।

लेकिन यह बदलाव तभी सुंदर और सकारात्मक होता है

जब उसमें सम्मान, धैर्य और विनम्रता भी शामिल हो।


आधुनिकता और तकनीकी बदलाव का दौर

आज का समय केवल सामाजिक बदलाव का नहीं, बल्कि तकनीकी बदलाव का भी है।

आज दुनिया में कंप्यूटर, इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) ने

हमारे सोचने और सीखने का तरीका ही बदल दिया है।

पहले ज्ञान सीमित था—

किताबों, अनुभवों या किसी व्यक्ति की सलाह तक।

लेकिन आज एक छोटा सा मोबाइल फोन

दुनिया भर की जानकारी हमारे सामने ला देता है।

इंटरनेट और नई तकनीक के कारण युवा पीढ़ी तेजी से सीख रही है और नई तरह से सोच रही है।

इसी वजह से कई बार ऐसा लगता है कि सोच अचानक बदल गई है।


निष्कर्ष

असल में सोच बदलना परंपराओं का विरोध नहीं है, बल्कि उन्हें समझते हुए आगे बढ़ना है।

हमारे बुजुर्गों की सीख हमारी जड़ों की तरह है,

और नई सोच उन जड़ों पर उगने वाली नई शाखाओं की तरह।

अगर जड़ें मजबूत हों और शाखाएँ फैलती रहें,

तो पेड़ और भी ज्यादा मजबूत और फलदायी बनता है।

ठीक उसी तरह समाज भी आगे बढ़ता है—

पुरानी सीख के सम्मान और नई सोच के संतुलन के साथ।

गुरुवार, 12 मार्च 2026

माँ तो बस माँ है..... शब्द छोटा ,संसार बड़ा---- एहसास ,प्यार, विश्वास का

माँ तो बस माँ है..... शब्द छोटा ,संसार बड़ा

एक एहसास ,

एहसास है प्यार का,

प्यार का दुलार का ,

दुलार संसार का,

संसार तो  माँ  है.......


CHAPTER- -5

माँ ...एक शब्द नहीं ,

एक संसार है.

माँ सुबह की पहली किरण  है। 

जो खिड़की में नहीं, दिल में उतरती है। 

माँ एक आवाज़ है,

जो नाम ले कर  नहीं बुलाती ,फिर भी सब से गहरी उतरती है,

माँ, वह स्पर्श है,

जो माथे पर हाथ रखते ही सारी उलझने सुलझा देता है। 

माँ....

धुप भी है , छाँव भी है। 

थकन भी है आराम भी है। 

माँ रसोई की खुबू में खुली हुई दुआ है। 

माँ  दरवाजे पर टीके इंतज़ार का सब्र है। 

माँ की आँखों में,

 नींद कम होती है,

चिंता ज्यादा। 

माँ की थाली में ,रोटी कम पड़  जाती है। 

पर हमारे  हिस्से की, कभी कम होती। 

माँ की हथेलियों की लकीरों में, हमरी किस्मत बस्ती है। 

माँ की झुर्रियों में हमारे  बड़े होने की कहानी लिखी होती है। 


माँ वह ताकत है जो हमारे  हिस्से का दर्द छुपा कर 

हमे हिम्मत देती है। 


वह दिवार है जो खुद दरकती है। 

पर घर को टूटने नहीं देती। 

वह दीपक है जो खुद जलता है पर उजाला हमे देता है। 

 माँ की गोद दुनिया का सब से सुरक्षित स्थान है। 

माँ का आंचल सब से अछि छाँव है। 

माँ की  सब से अच्छी सिख है। 

माँ की डांट चुप्पी सब से गहरी समझ है। 

माँ कभी भगवान का दूसरा नाम लगती है.

कभी धरती का धैर्य। 

वह गिरने नहीं देती। 

और अगर गिर जाये तो उठना सिखाती है। 

माँ--- केवल जनम नहीं देती जीना सिखाती है.

चलना सिखाती है । 


और ज़रूरत पड़े तो खड़े होना भी सिखाती है। 


माँ की दुनिया,-----

हम से शुरू हो कर  हम ही  पर खतम होजाती है। 

उसकी दुआएँ हमारे हर रस्ते से पहले पहुंच जाती है। 

माँ की हंसी में घर बसता है। 

माँ की ख़ामोशी में त्याग छिपा होता है। 

माँ के "खाना खा लिया " में पूरा ब्रह्माण्ड छिपा होता है। 

माँ की "सावधान रहना"में 

पूरी उम्र की सुरक्षा छुपी होती है। 


माँ जब दूर होती है तो भी पास होती है। 

जब चुप होती है तो भी साथ होतीहै। 

  •   माँ--- कभी छुट्टी नहीं लेती। 
  •   माँ---  कभी आधी नहीं होती। 
  •   माँ ----कभी कम नहीं होती। 

वह हर भूमिका में पूरी होती है। 
बेटी होकर भी,
पत्नी हो कर  भी ,

और सब से बढ़ कर माँ हो कर,

माँ की ऊगली पकड़ कर हम ने दुनिया देखि 

माँ का हाथ छोड़ कर हम ने दुनिया जी। 

पर हर जीत के बाद जिस की तलाश होती है...वो माँ होती है- 

 माँ --वह आशीर्वाद है जो बिना मांगे मिलता है। 

 माँ--वह प्रार्थना है जो बिना बोले सुनी जाती है। 

वह प्रेम है जो शर्तो से नहीं बांधता। 

 
फूल ,उपहार ,शब्द सब छोटे पड़ जाते है.
क्यों कि माँ का ऋण चुकाया नहीं जा सकता। 
माँ को बस महसूस किया जा सकता है। 
सम्मान दिया जा सकता है। 
 
माँ तू घर की धड़कन है। 
तू जीवन की जड़ है तू हर रिश्ते का आधार है। 
तू है तो सब है 
..
माँ तुझे शब्दों  में बांधना संभव नहीं। ...
फिर भी हर शब्द तुझ से ही शुरू होता है। 

आओ बात करे .....माँ की ....."जो शब्द नहीं तो उसके बिना  शब्द ही नहीं है "
माँ तुझे कोटि कोटि वंदन। .....





 

बुधवार, 11 मार्च 2026

"दूसरों को सुनते सुनते ,एक दिन उसने खुद को सुन लिया"

 उसने खुद को सुन लिया 

वो हमेशा दूसरों की आवाज़ सुनती आयी थी। 

घर की , रिश्तों की, जिम्मेदारियों की...

"लेकिन अपनी.........कभी नहीं"। l


हर सुबह वही ROUTINE---

चाय, खाना, काम, बच्चों की चिंता.......

और फिर एक हल्की सी थकान 

जो चेहरे पर नहीं दिल में रहती थी.

वो मुस्कुराती रही,

सबको समझाती  रही, सबकी तकलीफों 

को अपने दिल में जगह देती रही।

 

और फिर उसे खुद भी आदत हो गयी

खामोश रहने की

कभी मन में कोई सवाल उठता भी ,

तो वो खुद ही उसे दब देती। 

उसे लगने लगा थी उसकी बातों की कोई ज़रूरत नहीं।   


"लोग कहते थे, "

"तुम स्ट्रांग हो"

पर किसी ने यह कभी नहीं पूछा की स्ट्रांग बनते बनते, वह 

कितनी बार टूटी.

 

उस दिन कुछ अलग था। 

न कोई बड़ा फैसला ,

न कोई लड़ाई ,

बस उसने शीशे में खुद को देखा ,

और पहली बार खुद से पूछा--

"तू  ठीक है ना"?


आंखे भर आई। 

"शब्द नहीं थे, पर एहसास बहुत थे"। 

वह बैठ गई। 

रोई नहीं। ..

बस साँस ली। 


उसी पल उसने तय किया ---

अब वह हर बात पर चुप नहीं रहेगी। 

हर दर्द को आदत नहीं बनाएगी। 

और खुद को आखरी नंबर पर रखना,

 "अब बंद करेगी"

वो आवाज़ जो सालो से

उसके भीतर कही छुपी हुई थी। 


वो कह रही थी---

"तुम्हे भी हक़ है महसूस करने का....

तुम्हे भी हक़ है अपनी बात कहने का ".

उसने पहली बार 

अपने दिल की बात को 

चुप करने की कोशिश नहीं की। 

उसने उसे सुना। ....

समझा। ....

और स्वीकार किया। 


उस दिन दुनिया नहीं बदली। 

लोग भी वही  रहे,

पर वह बदल गयी। 


क्युकी जिस दिन कोई इंसान

 खुद को सुन लेता है

.

उसी दिन से उसकी नयी शुरुआत होती है....

चल ऐ ज़िन्दगी। .. 

अब नया दौर ज़िन्दगी का तय कर  आते है    


सन्देश: खुद को सुनना selfish   नहीं होता , self - awareness

ज़रूरी होता है। 


शुक्रवार, 6 मार्च 2026

महिला दिवस -----नारी जाति का सम्मान करने से बनता है ---उज्जवल समाज

महिला दिवस -----नारी जाति का सम्मान----उज्जवल समाज

संसार में महिला दिवस एक दिन नहीं, 

बल्कि नारी के सम्मान के योगदान को याद करने का अवसर है,

महिलाये परिवार,समाज और देश की शक्ति का  आधार है

सिर्फ सशक्त नहीं........ सम्मानित भी....

"सम्मान " ज़रूरी है। 

सिर्फ शब्दों से नहीं,

 व्यवहार में। 

पिता- माता को ,

भाई- बहन को,-

 पति- पत्नी को

देवर -भाभी को

"सम्मान देंग, तो नींव मजबूत होंगी "

आज का समाज तेज है। 

डिजिटल है।

 दिखावे से भरा हुआ है। 

"SOCIAL MEDIA "ने हमे आवाज़ दी है। 

पर उसी के साथ निर्णय लेने की जल्दी देदी। 

आज एक लड़की  ,उसकी सोच से पहले जज की जाती है। 

उसकी मुस्कान को गलत  समझ लिया जाता है। 

उसकी चुप्पी  को कमजोरी मान लिया जाता है। 

ये सिर्फ महिलाओ की समस्या नहीं है। 

ये सोच की समस्या है।

       कहते है ---"नज़र को बदल लो नज़ारे बदल जायेंगे ,

                         सोच को बदल लो सितारे बदल जायेंगे"  

बचपन बदल गया है। 

बच्चे अब कहानियों से कम स्क्रीन से ज्यादा सीखते है। 

रिश्तों की समझ , रील्स की लम्बाई जितनी छोटी  गयी है। 

और इसलिए सम्मान धीरे धीरे optional होता जा रहा है। 

यही चिंता का विषय है। 

क्योंकि जब समाज की सोच बदलती है। 

तो भविष्य की दिशा भी बदलती है। 


अधूरी जानकारी: भयानक बीमारी 

अगर आज कोई  online content से यह सिख रहा है 

की ताक़त का मतलब दबाब है ,

तो वह रिश्तोंमें संतुलन कैसे समझेगा। 

अगर एक लड़की

 हर वक़्त तुलना और ट्रॉल्लिंग से गुजर रही है,

तो उसका आत्मविश्वास कैसे सुरक्षित रहेगा? 

हम एक ऐसे दौर में है जहा "नारी  सशक्तिकरण" की बाते बहुत है,
 पर सम्मान देने की आदत कम है। 
और बिना सम्मान के कोई भी सशक्तिकरण अधूरा है। 
"
"INTERNATIONAL WOMEN'S DAY" 
सिर्फ महिलाओ को strong कह देने का दिन नहीं है। 
यह दिन है यह सोचने का --
"क्या हम अपने घरो में सम्मान देना सीखा रहे है."?
"क्या हम अपने बेटों को सवेदनशील बनना सीखा रहे है?
क्या हम अपनी बेटियों को डर के नहीं, विश्वास के साथ जीना सीखा रहे है।
 
समाज स्त्री और पुरुष दोनों से बनता है। 
अगर एक असुरक्षित होगा,
 तो दूसरा भी स्थिर नहीं रह पायेगा। 
पुरुष को भी एक तय ढांचे में कैद कर दिया गया है। 
मत रो"
हमेशा "मज़बूत बने रहो"
"कमजोरी मत दिखाओ"

और महिलाओ से कहा गया 
"ज्यादा मत बोलो"   ...."ज्यादा आगे मत बढ़ो "। 
"ज्यादा मत दिखो"

दोनों पर दबाब है। 
दोनों पर अपेक्षाएं है। 
फिर भी हम एक दूसरे को दोष देते रहते है। 
असल में ज़रूरत दोष की नहीं दिशा की है। 

social मीडिया बुरा नहीं है। 
पर बिना समझ के उपयोग खतरनाक है। 
अगर बच्चे ,वायरल को सफलता समझेंगे ,
तो मूल्य पीछे छूट जायेंगें। 

अगर LIKES  से आत्मसमान बढ़ेगा तो रिश्ते कमजोर पड़ेंगे। 
इसलिए आज ज़रूरत है डिजिटल साक्षरता की। 
 डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा ज़रूरी है। .ये हम आने वाले  ब्लॉग में विचार करेंगे .

"आज अपनी जननी को प्रणाम ,और पूरी महिला वर्ग को सम्मान देना ही एक ऊँची सोच को व्यक्त करता हैं 
आओ बात करे..... उस सोच पर  जो "महिलाओं को सम्मान का एहसास सिर्फ शब्दों में नहीं व्यवहार में भी करवाएं ".......

और सिर्फ आज नहीं हर पल ,हर कदम पर.... महिला सशक्त तो  समाज सशक्त 
        " HAPPY INTERNATIONAL WOMEN'S DAY"

बुधवार, 4 मार्च 2026

होली...रंग....तरंग .....उमंग ......



 होली .....

होली में रंग,

रंग में तरंग,

तरंग में उमंग ,

        उमंग तेरे प्यार की ,

         प्यार की फुहार की,

          फुहार है बहार की ,

           बहार इंतज़ार की ,

इंतज़ार उस पल का,

पल में इकरार का,

इकरार दिल-ए -यार का,

यार के एतबार का। 

              ऐतबार की बात में,

              बात की हर सांस में,

              सांस के हर राग में,

               राग की मिठास में,.

मिठास मुस्कान की,

मुस्कान अरमान की,

अरमान उड़ान की,

उड़ान आसमान की,

                 आसमान नीला है,

                 नीली तो पतंग है,

                 पतंग संग डोर है,

                 डोर है हवाओं में

हवा में तेरा  नशा  ,

नशे की वो घडी,

घडी जो ठहरी ज़रा ,

                ठहरी सी वो नज़र ,

                 नज़र में  तेरा असर ,

                  असर से भीगा मन ,

                   मन मेंयाम रँग।

श्याम रंग जो चढ़ गया ,

दुनिया से तर गया ,

तर के वो किधर गया,

किधर का  ही सवाल है,

सवाल बेमिसाल है,

                    बेमिसाल जोश  है                 

                     जोश मदहोश है,

                       मदहोश सी वो चाल है,,

                     चाल मस्तानी है,

मस्तानी ,जवानी है,

जवानी की कहानी है,

 कहानी तो पुरानी  है 

पुरानी  बात छोड़ दो ,

            छोड़ना तो स्वार्थ है,

           स्वार्थ का क्या अर्थ है,

           अर्थ तो व्यर्थ है,

          व्यर्थ ही समर्थ है,

समर्थ ही तो होना है ,

होना तो विश्वास है,

विश्वास रब के साथ है,

रब ही तो अंदर है,

          अंदर एक समंदर है,

          समंदर में तो पानी है ,,

           पानी में रवानी है, 

रवानी " वह क्या बात है 

बात तो एक बोली है 

बोली तो बस" होली है "

"होली रे होली "


प्यार भरी ,सम्मान भरी ,विश्वास भरी। ..रंग भरी। ............