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"दूसरों को सुनते सुनते ,एक दिन उसने खुद को सुन लिया"

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उसने खुद को सुन लिया. .. वो हमेशा दूसरों की आवाज़ सुनती आयी थी। घर की, रिश्तों की, जिम्मेदारियों की... "लेकिन अपनी.........कभी नहीं"। हर सुबह वही ROUTINE— चाय, खाना, काम, बच्चों की चिंता....... और फिर एक हल्की सी थकान जो चेहरे पर नहीं, दिल में रहती थी। वो मुस्कुराती रही, सबको समझाती रही, सबकी तकलीफों को अपने दिल में जगह देती रही। कभी किसी ने पूछा नहीं— "तुम कैसी हो?" और उसने भी कभी बताने की कोशिश नहीं की। क्योंकि उसे लगता था— उसकी तकलीफों से किसी को फर्क नहीं पड़ेगा। धीरे-धीरे उसे खुद भी आदत हो गयी खामोश रहने की। कभी मन में कोई सवाल उठता भी, तो वो खुद ही उसे दबा देती। उसे लगने लगा था— उसकी बातों की कोई ज़रूरत नहीं। "लोग कहते थे," "तुम STRONG हो" पर किसी ने यह कभी नहीं पूछा— STRONG बनते-बनते, वह कितनी बार टूटी। कितनी बार उसने अपने आँसू निगले। कितनी बार उसने अपनी खुशी टाल दी। कितनी बार उसने खुद को समझाया— "अभी नहीं… बाद में।" लेकिन वो "बाद में" कभी आया ही नहीं। फिर एक दिन कुछ अलग हुआ। न कोई बड़ा फैसला, न कोई लड़ाई, न कोई तूफान। ब...