"कामयाबी की परिभाषा --- दूसरों की नज़रों में....V/S..... अपनी नज़रों में"
"दूसरों की परिभाषा से बाहर निकलकर अपनी
कामयाबी की परिभाषा लिखना"
"बेटा, कुछ बनकर दिखाना।"
शायद यह वाक्य हम सबने कभी न कभी सुना है।
लेकिन किसी ने यह नहीं बताया कि "कुछ बनना" आखिर होता क्या है?
क्या बड़ा घर होना कामयाबी है?
क्या बैंक बैलेंस का बढ़ना कामयाबी है?
क्या नाम, शोहरत और पहचान ही सफलता का अंतिम पड़ाव हैं?
या फिर...
कामयाबी की परिभाषा:-- हर इंसान के लिए अलग हो सकती है?
बचपन से हमें एक ऐसी दौड़ में शामिल कर दिया जाता है, जिसका रास्ता तो सबको दिखाया जाता है, लेकिन मंज़िल चुनने का अधिकार बहुत कम लोगों को मिलता है।
हमें बताया जाता है कि अच्छे नंबर लाओ, अच्छी नौकरी पाओ, खूब पैसा कमाओ और फिर दुनिया तुम्हें सफल कहेगी।
धीरे-धीरे हम दुनिया की परिभाषा को अपनी परिभाषा समझ बैठते हैं।
और यहीं से कहानी बदल जाती है।
क्योंकि हम अपनी खुशी को महसूस करने के बजाय, दूसरों की नज़रों में खुद को तलाशने लगते हैं।
कामयाबी आखिर किसकी है?
एक किसान सुबह खेत में जाता है।
शाम को लौटकर अपने परिवार के साथ बैठकर खाना खाता है।
वह मुस्कुरा रहा है।
दूसरी तरफ एक उद्योगपति है।
करोड़ों की कंपनी है।
लेकिन रात को नींद की गोलियां लेकर सोता है।
अब बताइए...
इन दोनों में सफल कौन है?
समाज शायद दूसरे व्यक्ति की तरफ इशारा करेगा।
लेकिन जीवन?
जीवन शायद पहले व्यक्ति के चेहरे की मुस्कान को देखेगा।
क्योंकि जीवन की किताब में सफलता का पैमाना केवल पैसा नहीं होता।
उसमें सुकून, संतोष और अर्थ भी शामिल होते हैं।
सबसे बड़ी भूल
हम अक्सर अपनी जिंदगी की तुलना किसी और की उपलब्धियों से करने लगते हैं।
किसी के पास बड़ी कार है।
किसी का घर बड़ा है।
किसी के SOCIAL MEDIA पर लाखों FOLLOWERS हैं।
और हम सोचते हैं...
"शायद मैं पीछे रह गया हूँ।"
लेकिन क्या कभी हमने यह सोचा कि जिस व्यक्ति से हम अपनी तुलना कर रहे हैं, हो सकता है वह भी किसी और को देखकर खुद को अधूरा समझ रहा हो?
तुलना का खेल कभी खत्म नहीं होता।
क्योंकि हमेशा कोई न कोई हमसे आगे होगा।
लेकिन खुशी का खेल उसी दिन शुरू होता है, जिस दिन हम अपनी यात्रा को स्वीकार कर लेते हैं।
आसमान छूना या जमीन पर मुस्कुराना?
दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं।
कुछ लोग आसमान छूना चाहते हैं।
वे बड़े सपने देखते हैं।
नई ऊंचाइयों को पाना चाहते हैं।
और इसमें कुछ भी गलत नहीं है।
लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो जमीन पर रहकर मुस्कुराना चाहते हैं।
उन्हें शाम की चाय, परिवार की हंसी, कुछ किताबें और मन की शांति काफी लगती है।
समस्या तब पैदा होती है ,जब एक वर्ग दूसरे को गलत साबित करने लगता है।
जो आसमान छूना चाहता है, वह जमीन पर मुस्कुराने वाले को महत्वाकांक्षाहीन समझता है।
और जो जमीन पर मुस्कुराना चाहता है, वह बड़े सपने देखने वाले को लालची समझता है।
जबकि सच्चाई यह है कि दोनों अपने-अपने रास्ते पर सही हैं।
खुद से एक सवाल
अगर दुनिया में कोई आपको जज न करे...
कोई आपकी तुलना किसी से न करे...
कोई आपको सफल या असफल न कहे...
तो आप किस तरह की जिंदगी चुनेंगे?
यही सवाल आपकी की तरफ पहला कदम है।
क्योंकि वहां आपकी इच्छा बोलती है, समाज की नहीं।
KHAMOSH KALAM--- खुद से पूछिए
प्रश्न 1:
क्या मैं वह जिंदगी जी रहा हूँ जो मैं चाहता था?
उत्तर: यदि जवाब "हाँ" है, तो आप सफल हैं। यदि जवाब "नहीं" है, तो अभी रास्ता बाकी है।
प्रश्न 2:
क्या मेरी खुशी केवल दूसरों की स्वीकृति पर निर्भर है?
उत्तर: यदि हाँ, तो आपने अपनी खुशी की चाबी किसी और को दे दी है।
प्रश्न 3:
क्या पैसा जरूरी है?
उत्तर: बिल्कुल।
पैसा सुविधा देता है, सुरक्षा देता है।
लेकिन केवल पैसा ही सफलता नहीं है।
प्रश्न 4:
क्या बिना प्रसिद्ध हुए भी सफल हुआ जा सकता है?
उत्तर: हाँ।
दुनिया के सबसे खूबसूरत काम अक्सर बिना तालियों के किए जाते हैं।
Question 5:
सबसे बड़ी सफलता क्या है?
उत्तर:
खामोश कलम की बात
शायद कामयाबी का सबसे सुंदर रूप वह नहीं है जो दुनिया को दिखाई देता है।
वह है...
अपने मन की अदालत में खुद को निर्दोष पाना।
अपने सपनों से समझौता न करना।
अपने भीतर की मुस्कान को बचाए रखना।
और यह जानना कि आपकी जिंदगी की कीमत किसी और की उपलब्धियों से तय नहीं होती।
किसी को आसमान छूना है...
छूने दीजिए।
किसी को जमीन पर बैठकर चाय की प्याली के साथ मुस्कुराना है...
उसे मुस्कुराने दीजिए।
क्योंकि सफलता की कोई एक परिभाषा नहीं होती।
हर इंसान अपनी कहानी का लेखक है। (क्यों , ठीक कहा ना )
और शायद जिंदगी की सबसे बड़ी आजादी यही है कि...
दूसरों की परिभाषा से बाहर निकलकर, अपनी कामयाबी की परिभाषा खुद लिखी जाए।
(read this also) -----
क्या जो अपने पढ़ा , वैसा आपभी महसूस करते है तो अपने विचार ज़रूर बताइये — खामोश कलम

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें