संदेश

जनवरी, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

"जब मैं छोटी थी --मासूमियत से समझदारी तक का सफर"

चित्र
और जब मैं छोटी थी..... एक सफर मासूमियत से समझदारी तक और जब मैं छोटी थी… ज़िन्दगी बहुत साधारण सी ही थी… ख़ुशी का मतलब सिर्फ इतना होता था कि— माँ की गोद, पिताजी की उंगली और शाम को गली में अपने दोस्तों के साथ खेलना। बस… हम्म्म… मुझे याद है, जब छोटी-सी बात पर दिल भर आता था… ख़ुशी में बिना मतलब के हंस पड़ती थी… न फ्यूचर का बोझ था, न ही लोगों की सोच का डर। सपने तब भी थे… पर मासूम थे। मैं जब छोटी थी, सपने बहुत बड़े नहीं थे… बस इतना चाहती थी कि— सब हमेशा साथ रहें। किसी को खोने का ख्याल भी डराता था, पर लगता था— ऐसा होता ही नहीं है। तब मुझे नहीं पता था कि ज़िन्दगी सिर्फ स्कूल और खेल का नाम नहीं… ये इम्तहान भी लेती है। फिर धीरे-धीरे मैं बड़ी होने लगी… और जैसे-जैसे बड़ी हुई, ज़िन्दगी ने रंग बदलने शुरू कर दिए। लोग जो पहले अपने लगते थे, उनका रवैया बदलने लगा। मैं सीखने लगी— चुप रहना, समझना, और खुद को संभालना। मुझे पहली बार एहसास हुआ, कि हर आंसू दिखाने के लिए नहीं होते… और हर दर्द बताया भी नहीं जा सकता। और जब मैं छोटी थी— मैं सिर्फ महसूस करती थी… आज मैं समझती हूँ। आज मुझे पता है— हर कोई साथ नहीं देता,...

"मुस्कराहट .....एक ख़ुशी, एक मुस्कान खुद के लिए , क्यों ?"

चित्र
  एक मुस्कान खुद के लिए                      ज़िन्दगी भर हमने हर वक्त दूसरों के लिए जीना सीखा। उनके लिए ख़ुशियाँ, उनके लिए फैसले, उनके लिए सहन करना। अपनी हदों में रहकर भी हमने अपनी हदें पार की, ताकि सब खुश रह सकें अपनी भावनाओं को दबाया, अपनी ज़रूरतों को अनदेखा किया—बस यह सोचकर कि शायद यही ज़िन्दगी है। और फिर भी—न कभी उन्हें खुशी मिली, न कभी उन्होंने शुक्र अदा किया।  लेकिन अब… अब यह सवाल भी बेकार लगने लगा है। अब वक्त है, अपनी मुस्कान, अपनी खुशियाँ, अपनी ज़िन्दगी खुद के लिए जीने का। "दिल में तूफ़ान हो गया बरपा , तुमने जो मुस्कुरा के देख लिया"  (ek mirror look ) एक मुस्कान खुद के लिए… यह सरल नहीं है। यह selfish नहीं है। यह हमारी ज़रूरत है। जब हम दूसरों की उम्मीदों और मांगों के बोझ तले दबे रहते हैं, तो हम केवल ज़िंदा होते हैं, लेकिन जीते नहीं। और जीना—सच में जीना—शुरू होता है तब जब हम खुद की खुशी को मान्यता देते हैं। हमने बहुत कुछ सहा है। बहुत दर्द, बहुत निराशा, बहुत अधूरी उम्मीदें। । हमने अपने आप को छोटा किया, अपने स...

"एक नयी शुरुआत.... चल ऐ ज़िन्दगी, फिर से जीते है..."

चित्र
🍃 एक नयी शुरुआत... चल ,ऐ ज़िन्दगी, फिर से जीते है..." कुछ कहानियां शोर मचा कर नहीं आती... वो चुपचाप ज़िन्दगी के किसी कोने में जनम लेती है और धीरे धीरे हमे और मज़बूत बना देती है. एक नयी शुरुआत करने का मन है. फिर से कुछ एहसासो, कुछ नए विचारों को साथ ले कर, खुद को STRONG बनाने की कोशिश कर रहीं हूँ। जाने क्यों... शयद इसलिए, क्यूंकि रुक--रुक कर, जीना खुद को थका देता है। या....फिर इसलिए, क्यूंकि अब हार मान लेना, दिल को मंजूर नहीं होता। बहुत बार लगा, की बस यही रुक जाऊ। पर हर बार ज़िन्दगी ने मुझे आगे बढ़ना सिखाया। कभी-कभी लगता है… कि जो पीछे छूट गया, वो ही सबसे ज़्यादा अपना था। पर सच तो ये है, कि जो छूट गया… वो हमें कुछ सिखा कर ही गया। हर अधूरी बात, हर टूटा हुआ भरोसा, एक नई समझ बनकर हमारे अंदर कहीं बस जाता है। और वही समझ, हमें अगली बार पहले से ज्यादा समझदार बना देती है। ज़िन्दगी चलने का नाम है। रुकना तो फिर वैकुंठ धाम है। यह बात समझ आते ही, अंदर कहीं कुछ बदलने लगता है। दिल से एक आवाज़ उठती है--- "चल ऐ ज़िन्दगी... आज एक बार खुलकर फिर से जीते हैं"। ना पूरी तैयारी के साथ, न ही हर...