"बीच वाले स्टेशन बोले... रुक... रुक..." ज़िंदगी भी कुछ ऐसे ही सिग्नल देती है.
"बीच वाले स्टेशन बोले... रुक... रुक... रुक..." ज़िंदगी भी कुछ ऐसे ही सिग्नल देती है... रेलगाड़ी... रेलगाड़ी... बीच वाले स्टेशन कहते हैं... "रुक... रुक... रुक..." ट्रेन रुकती है, क्योंकि उसे पता होता है कि हर रुकना, सफ़र का अंत नहीं होता। ज़िंदगी भी बिल्कुल ऐसी ही है। कभी लाल सिग्नल देकर कहती है... "थोड़ा ठहर..." कभी पीला सिग्नल देकर समझाती है... "तैयार रह..." और फिर एक दिन हरा सिग्नल मुस्कुराकर कहता है... "अब चल... मंज़िल तेरी राह देख रही है।" इसलिए हर रुकावट को हार मत समझो। ज़िंदगी के मेले तो यूँ ही लगते रहेंगे... बस मुसाफ़िर बदलते रहेंगे, कुछ साथ चलेंगे, कुछ बीच स्टेशन पर उतर जाएँगे, कुछ नए चेहरे सफ़र में शामिल हो जाएँगे। लेकिन... जो अपनी पटरी पर चलता रहता है, वही एक दिन अपनी मंज़िल तक पहुँचता है। ज़िंदगी हमें चलना नहीं सिखाती... ज़िंदगी हमें सही समय पर रुकना भी सिखाती है। 🌿🚆 "रेलगाड़ी... रेलगाड़ी..." बचपन में यह शब्द सुनते ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती थी। "आओ बच्चो खेल दिखाए सीटी छुक छुक करती रेल चलाये सीटी द...