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आओ बात करे---चकमक पत्थर से कृत्रिम बुद्धिमत्ता(AI ) तक

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आओ बात करें — सोच बदलने से क्या बदलेगा? chapter --6   आजकल हम अक्सर एक वाक्य सुनते हैं— “सोच बदलो, समाज बदलेगा।” यह बात सुनने में अच्छी लगती है, लेकिन कभी-कभी मन में एक सवाल भी उठता है— आख़िर समाज को बदलने की ज़रूरत क्यों है? क्या हमारे माता-पिता और बुजुर्गों की सोच गलत थी? क्या वे कम समझदार थे? उन्होंने वही सिखाया  जो उन्हें सही लगा, क्योंकि उनका उद्देश्य हमेशा हमारा भला ही था।             तो फिर आज हर जगह सोच बदलने की बात क्यों की जा रही है? बदलाव का मतलब विरोध नहीं होता सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि सोच बदलने का मतलब अपने बुजुर्गों को गलत साबित करना नहीं होता। असल में बदलाव का मतलब है— समझ का विस्तार। समय बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं और इंसान के सामने नई चुनौतियाँ आती हैं। ऐसे में सोच का विकसित होना स्वाभाविक है। सोच के विकास को समझने के लिए एक उदाहरण अगर हम पुराने समय को देखें, तो लोग चकमक पत्थर से आग जलाते थे। फिर समय बदला और माचिस का आविष्कार हुआ। इसके बाद लाइटर आया, जिसने आग जलाना और आसान बना दिया। आज के दौर में तो इलेक्ट्रिक उपकरण...

"एक नयी शुरुआत.... चल ऐ ज़िन्दगी, फिर से जीते है..."

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🍃 एक नयी शुरुआत... चल ,ऐ ज़िन्दगी, फिर से जीते है..." कुछ कहानियां शोर मचा कर नहीं आती... वो चुपचाप ज़िन्दगी के किसी कोने में जनम लेती है और धीरे धीरे हमे और मज़बूत बना देती है. एक नयी शुरुआत करने का मन है. फिर से कुछ एहसासो, कुछ नए विचारों को साथ ले कर, खुद को STRONG बनाने की कोशिश कर रहीं हूँ। जाने क्यों... शयद इसलिए, क्यूंकि रुक--रुक कर, जीना खुद को थका देता है। या....फिर इसलिए, क्यूंकि अब हार मान लेना, दिल को मंजूर नहीं होता। बहुत बार लगा, की बस यही रुक जाऊ। पर हर बार ज़िन्दगी ने मुझे आगे बढ़ना सिखाया। कभी-कभी लगता है… कि जो पीछे छूट गया, वो ही सबसे ज़्यादा अपना था। पर सच तो ये है, कि जो छूट गया… वो हमें कुछ सिखा कर ही गया। हर अधूरी बात, हर टूटा हुआ भरोसा, एक नई समझ बनकर हमारे अंदर कहीं बस जाता है। और वही समझ, हमें अगली बार पहले से ज्यादा समझदार बना देती है। ज़िन्दगी चलने का नाम है। रुकना तो फिर वैकुंठ धाम है। यह बात समझ आते ही, अंदर कहीं कुछ बदलने लगता है। दिल से एक आवाज़ उठती है--- "चल ऐ ज़िन्दगी... आज एक बार खुलकर फिर से जीते हैं"। ना पूरी तैयारी के साथ, न ही हर...