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"कामयाबी... आखिर है क्या?...लक्ष्य प्राप्ति पर एक आत्ममंथन"

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  कामयाबी... आखिर है क्या? कामयाबी... आखिर है क्या? : लक्ष्य प्राप्ति पर एक आत्ममंथन मेरी बेटी के नाम... जिसने रुकना भी सीखा, गिरना भी सीखा  और फिर चलना भी सीख लिया। कहते हैं, कामयाब हो जाओ... फिर सब ठीक हो जाएगा। सच ही तो है। जब वर्षों की मेहनत किसी मंज़िल तक पहुँचती है, तो आँखों में चमक आ ही जाती है।  मन मुस्कुरा उठता है। भीतर कहीं कोई कहता है—"हाँ... कर दिखाया।" कामयाबी की खुशी होना बिल्कुल स्वाभाविक है। लेकिन एक प्रश्न हमेशा मेरे भीतर दस्तक देता रहा है— यदि कामयाबी की खुशी इतनी स्वाभाविक है, तो क्या असफलता का  दुख भी उतना ही स्वाभाविक नहीं? फिर हम दुख से इतना डरते क्यों हैं? शायद इसलिए कि बचपन से हमने अपने बच्चों को जीत का अर्थ तो समझाया,  पर हार का सम्मान करना कभी नहीं सिखाया। बच्चा जब पहली बार चलना सीखता है, बच्चा जब पहली बार चलना सीखता है, तब वह न जाने कितनी बार गिरता है।  तब हम उसकी हर गिरावट पर ताली बजाते हैं। उसे उठाते हैं।  मुस्कुराकर कहते हैं—"कोई बात नहीं... फिर चलो।" पर जैसे-जैसे वह बड़ा होता जाता है, हमारी भाषा बदलने लगती है। "अच्छे न...