संदेश

aao baat krein लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

"आज को ,आज कैसे जिया जाए--जीवन इसी पल में है"

चित्र
  आज को--आज कैसे जिया जाए, कल का भाव कैसे लिया जाए मन की भागदौड़ से शांति तक का सच्चा सफर जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही है—हम आज में रहते हैं, पर जीते कल या बीते कल में हैं। मन हर समय भागता रहता है—कभी भविष्य की चिंता में, कभी अतीत की यादों में। पर सच्चाई यह है कि जीवन केवल इसी पल में है , और जो इस पल को पकड़ना सीख गया, वही सच्चा जीवन जीना सीख गया। यह लेख केवल पढ़ने के लिए नहीं है— यह जीने की एक विधि है , जिसे धीरे-धीरे अपनाया जा सकता है। पहला सत्य — आज को आज कैसे जिया जाए आज की धूप को आज ही ओढ़ लो, कल की छाँव का इंतज़ार मत करो। जो पल सामने खड़ा है चुपचाप, उसे यूँ ही जाने  देने  का अपराध मत करो। भाव (Meaning) इन पंक्तियों का भाव यह है कि जो समय अभी हमारे सामने है, वही सबसे मूल्यवान है। हम अक्सर सोचते रहते हैं—“कल बेहतर होगा”, “कल समय मिलेगा”, “कल खुश रहेंगे।” पर सच यह है कि कल कभी आता नहीं, वह हमेशा ‘आज’ बनकर ही आता है। मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह जीवन को टालता रहता है। वह सोचता है कि जब सब ठीक हो जाएगा—तब खुश होगा। जब पैसा आ जाएगा—तब शांति मिलेगी। जब समस्या खत्म ...

माँ महागौरी:" शुद्धत्ता और शांति की अद्भुत शक्ति" ---

चित्र
8वाँ नवरात्रा — माँ महागौरी शुद्धता और शांति की अद्भुत शक्ति नवरात्रा का आठवाँ दिन… मन को एक अलग ही सुकून देता है। जैसे भीतर की थकान धीरे-धीरे उतर रही हो… और मन किसी अदृश्य शांति को महसूस कर रहा हो। माँ महागौरी को समर्पित यह दिन बहुत पवित्र और श्रेष्ठ माना जाता है। इन दिनों पूरा वातावरण ही मंगलमय हो जाता है— घर में पूजा की सुगंध… घंटी की मधुर ध्वनि… और दिल में एक भरोसा— कि माँ की कृपा से सब ठीक हो जाएगा। सच में, माँ की कृपा से तन और मन दोनों हल्के हो जाते हैं। माँ महागौरी अपने भक्तों पर विशेष कृपा बरसाती हैं। जय माँ… जय जय माँ। माँ महागौरी का अर्थ क्या है? "महागौरी" नाम में ही उनके स्वरूप का पूरा अर्थ छुपा है। महागौरी = महान + गौरी महा — अर्थात महान गौरी — अर्थात सफेद, शुद्ध और पवित्र माँ का स्वरूप पूर्ण रूप से सफेद वर्ण का बताया गया है— रौशनी की तरह निर्मल… दूध की तरह पवित्र… और चाँदनी की तरह शांत। उनका वाहन बैल (नंदी) माना जाता है और वे चार भुजाओं वाली हैं— एक हाथ में त्रिशूल एक हाथ में डमरू एक हाथ वरमुद्रा में एक हाथ अभय मुद्रा में यह स्वरूप हमें एक गहरा संदेश देता है— श...

इस होली रंग बदले: गुलाल के साथ , रिश्तों में सम्मान और प्यार के रंग

चित्र
 इस होली रंग बदले: गुलाल के साथ , रिश्तों में  सम्मान और प्यार के रंग    होली है .... तो रंग तो होना ही चाहिए।  पर दोस्तों, इस बार रंगों को  थोड़ा सा बदल कर देखें। हरा ,नारंगी, लाल, गुलाल  के साथ क्यों न   कुछ प्यार भरे शब्दों की होली खेली  जाये।  क्योकि चेहरों को सुर्ख लाल करना,  सिर्फ रंगों से ज़रूरी नहीं , कभी कभी दो मीठे शब्द भी  वो रंग चढ़ा जाते है. जो दिनों तक नहीं उतरता।  इस होली  माता पिता के दुलार के रंग हों, भाई बेहन के विश्वास के रंग हो, पति-पत्नी के  प्यार और सम्मान के रंग हो, और हर रिश्ते में  व्यवहार के रंग  भर दिए जाये  क्योंकि  रंग अगर रिश्तों में उतर जाएँ  तो ज़िंदगी खुद त्यौहार बन जाती है।  "होली के रंग, अपनों के संग" का भाव ही कुछ निराला है।  यह केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि प्रेम, एकता और  अपनों के साथ पुराने गिले-शिकवे भुलाकर नए रिश्ते जोड़ने का पर्व ,  सभी को गले लगाकर, प्रेम और भाईचारे का रंग फैलाएं। मिलजुल कर होली मनाएं, स्वादिष्ट गुजिया औ...

वो चुप थी...ख़ामोशी में छुपी भावनाओं की कहानी

CHAPTER – 3 वो चुप थी… (औरत की खामोशी की सच्चाई) वो चुप थी… इसलिए नहीं… कि उसके पास कहने को कुछ नहीं था… बल्कि इसलिए… कि उसने बहुत कुछ कहकर देख लिया था… हर बार… थोड़ा समझाने की कोशिश की… थोड़ा अपने दिल को खोलने की कोशिश की… पर हर बार… उसकी बातों को… या तो टाल दिया गया… या हल्का समझ लिया गया… और फिर… धीरे-धीरे… उसने बोलना कम कर दिया… उसकी चुप्पी… कमजोरी नहीं थी… वो उन जज़्बातों का बोझ थी… जो हर बार… “सब ठीक है…” कहकर दबा दिए जाते थे… वो औरत थी… जिसे बचपन से सिखाया गया— “सबको खुश रखना…” पर ये कभी नहीं सिखाया गया… कि खुद खुश कैसे रहना है… उसे प्यार तो मिला… पर शर्तों के साथ… इज़्ज़त भी मिली… पर चुप रहने की कीमत पर… अपनापन भी मिला… पर अपनी पहचान छोड़ने के बाद… वो हँसती थी… ताकि घर का माहौल हल्का रहे… वो सहती थी… ताकि रिश्तों का बोझ किसी और पर न पड़े… किसी ने नहीं देखा… उस मुस्कान के पीछे… कितनी बार उसका दिल टूटा था… कितनी बार उसने खुद को समझाया था— “चलो… इस बार भी जाने दो…” कितनी रातें ऐसी थीं… जब वो चुपचाप लेटी रहती थी… आँखें खुली होती थीं… पर सवाल बंद नहीं होते थे… कितनी बार… वो बस इतना ...