"मुस्कराहट .....एक ख़ुशी, एक मुस्कान खुद के लिए , क्यों ?"
एक मुस्कान खुद के लिए ज़िन्दगी भर हमने हर वक्त दूसरों के लिए जीना सीखा। उनके लिए ख़ुशियाँ, उनके लिए फैसले, उनके लिए सहन करना। अपनी हदों में रहकर भी हमने अपनी हदें पार की, ताकि सब खुश रह सकें अपनी भावनाओं को दबाया, अपनी ज़रूरतों को अनदेखा किया—बस यह सोचकर कि शायद यही ज़िन्दगी है। और फिर भी—न कभी उन्हें खुशी मिली, न कभी उन्होंने शुक्र अदा किया। लेकिन अब… अब यह सवाल भी बेकार लगने लगा है। अब वक्त है, अपनी मुस्कान, अपनी खुशियाँ, अपनी ज़िन्दगी खुद के लिए जीने का। "दिल में तूफ़ान हो गया बरपा , तुमने जो मुस्कुरा के देख लिया" (ek mirror look ) एक मुस्कान खुद के लिए… यह सरल नहीं है। यह selfish नहीं है। यह हमारी ज़रूरत है। जब हम दूसरों की उम्मीदों और मांगों के बोझ तले दबे रहते हैं, तो हम केवल ज़िंदा होते हैं, लेकिन जीते नहीं। और जीना—सच में जीना—शुरू होता है तब जब हम खुद की खुशी को मान्यता देते हैं। हमने बहुत कुछ सहा है। बहुत दर्द, बहुत निराशा, बहुत अधूरी उम्मीदें। । हमने अपने आप को छोटा किया, अपने स...