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"महक उठा मेरा मन--इत्र की खुशबू में लिपटी एक सदाबहार ज़िंदगी की दास्तान"

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  महक उठा मेरा मन इत्र की खुशबू में लिपटी एक सदाबहार ज़िंदगी की दास्तान कभी-कभी जीवन में कोई मौसम नहीं बदलता, कोई रास्ता नहीं बदलता, कोई मंज़िल नहीं बदलती, फिर भी सब कुछ बदल जाता है। बस एक खुशबू आकर दिल के किसी बंद दरवाज़े को खोल देती है। एक महक, जो याद बन जाती है। एक सुगंध, जो दुआ बन जाती है। एक इत्र, जो साधारण से दिन को भी उत्सव बना देता है। आज सुबह जब हवा की एक नरम लहर खिड़की से भीतर आई, तो लगा जैसे किसी ने चुपके से गुलाब की पंखुड़ियों पर लिखी कोई प्रेम-पाती मेरे मन तक पहुँचा दी हो। और तभी मन ने कहा— "महक उठा मेरा मन, खुशबू को बिखराता। जैसे कोई इत्र रूह में उतरकर, जीवन को गीत बनाता।" खुशबू का संसार केवल सुगंध नहीं, संस्कृति है दुनिया में शायद ही कोई ऐसी सभ्यता हो जिसने खुशबू को सम्मान न दिया हो। प्राचीन मिस्र की रानियाँ सुगंधित तेलों से अपने दिन की शुरुआत करती थीं। अरब की रेतों में ऊद की महक को शाही गरिमा का प्रतीक माना गया। भारत में चंदन, केवड़ा और गुलाब का इत्र मंदिरों से लेकर राजमहलों तक अपनी पहचान बनाए रहा। फ्रांस ने तो इत्र को कला का दर्जा दे दिया। पर सच कहें तो इत्र...