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"बचपन की यादें: क्यों, बचपन ही जिंदगी का सबसे खूबसूरत दौर होता है"

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  बचपन — वो जगह जहाँ आज भी दिल सुकून ढूँढता है कौन भूल पाता है अपने बचपन को… जब भी उन गलियों में लौटकर जाओ — चाहे सच में, या सिर्फ यादों की उँगली पकड़कर — तो लगता है  जैसे ज़िंदगी अब भी वहीं बैठी हमारा इंतज़ार कर रही है। वो टूटी हुई साइकिल, बरसात में कागज़ की नाव, छत पर सोते हुए तारों को गिनना, और बिना वजह खिलखिलाकर हँस देना… शायद जीना उसी का नाम था। आज की दुनिया में इंसान जितना बड़ा होता जा रहा है, उतना ही अंदर से खाली भी होता जा रहा है। चेहरों पर मुस्कानें हैं, लेकिन दिलों में थकान है। रिश्ते हैं, पर अपनापन कहीं खो गया है। आज तो हाल ये है कि — “हम 2-4 बार यूँ क्या हँस-हँसा लिए, लोगों ने हाथ में पत्थर उठा लिए…” लोग अब खुश इंसान को देखकर खुश नहीं होते, बल्कि सवाल करने लगते हैं — “इतना खुश कैसे है?” “इसकी ज़िंदगी में दुख नहीं क्या?” और यही सोच इंसान को अंदर ही अंदर कठोर बना देती है। लेकिन इन सबके बावजूद भी, जब कभी कोई पुराना गाना सुनाई देता है, जब मिट्टी की खुशबू बारिश में महसूस होती है, जब कोई बच्चा मासूमियत से खिलखिलाकर हँसता है… तो इंसान का दिल फिर चुपके से बचपन की तरफ भाग ज...