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"बीच वाले स्टेशन बोले... रुक... रुक..." ज़िंदगी भी कुछ ऐसे ही सिग्नल देती है.

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  "बीच वाले स्टेशन बोले... रुक... रुक... रुक..."   ज़िंदगी भी कुछ ऐसे ही सिग्नल देती है...  रेलगाड़ी... रेलगाड़ी... बीच वाले स्टेशन कहते हैं... "रुक... रुक... रुक..." ट्रेन रुकती है, क्योंकि उसे पता होता है कि हर रुकना, सफ़र का अंत नहीं होता। ज़िंदगी भी बिल्कुल ऐसी ही है। कभी लाल सिग्नल देकर कहती है... "थोड़ा ठहर..." कभी पीला सिग्नल देकर समझाती है... "तैयार रह..." और फिर एक दिन हरा सिग्नल मुस्कुराकर कहता है... "अब चल... मंज़िल तेरी राह देख रही है।" इसलिए हर रुकावट को हार मत समझो। ज़िंदगी के मेले तो यूँ ही लगते रहेंगे... बस मुसाफ़िर बदलते रहेंगे, कुछ साथ चलेंगे, कुछ बीच स्टेशन पर उतर जाएँगे, कुछ नए चेहरे सफ़र में शामिल हो जाएँगे। लेकिन... जो अपनी पटरी पर चलता रहता है, वही एक दिन अपनी मंज़िल तक पहुँचता है। ज़िंदगी हमें चलना नहीं सिखाती... ज़िंदगी हमें सही समय पर रुकना भी सिखाती है। 🌿🚆 "रेलगाड़ी... रेलगाड़ी..." बचपन में यह शब्द सुनते ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती थी।  "आओ बच्चो  खेल दिखाए सीटी  छुक छुक करती रेल चलाये  सीटी द...

नवरात्रे का चौथा दिन...माँ कूष्माण्डा की शक्ति और जीवन में उनका महत्व

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🌺 नवरात्रि का चौथा दिन – माँ कूष्मांडा: एक मुस्कान से सृजन करने वाली शक्ति नवरात्रि का हर दिन अपने आप में एक अलग ऊर्जा, एक अलग एहसास लेकर आता है… और चौथा दिन… कुछ खास है… कुछ अलग है… ये दिन समर्पित है माँ कूष्मांडा को… वो माँ… जिन्होंने एक हल्की सी मुस्कान से इस पूरे ब्रह्मांड का सृजन कर दिया… सोचिए… जहाँ कुछ भी नहीं था… न रोशनी… न अंधेरा… न कोई दिशा… वहाँ सिर्फ एक मुस्कान से… इतना विशाल संसार बन गया… कितनी अद्भुत है ये शक्ति… ✨ माँ कूष्मांडा – सृजन की ऊर्जा माँ कूष्मांडा को सृष्टि की रचयिता कहा जाता है… उनकी मुस्कान में इतनी शक्ति है कि वो अंधकार को भी उजाले में बदल सकती हैं… वो हमें सिखाती हैं… कि हर शुरुआत के लिए बड़े कदम नहीं… बस एक छोटी सी सकारात्मक सोच… एक मुस्कान ही काफी है… नवरात्रि के चौथे दिन मां दुर्गा के कूष्मांडा की पूजा की जाती है। कुष्मांडा का अर्थ है 'कद्दू' (कुम्हड़ा), जो ऊर्जा का प्रतीक है। मान्यता है कि जब सृष्टि में अंधकार था, तब देवी ने अपनी हल्की मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की थी, इसलिए इन्हें 'ब्रह्मांड की माता' कहा जाता है। ...

"मुस्कराहट .....एक ख़ुशी, एक मुस्कान खुद के लिए , क्यों ?"

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  एक मुस्कान खुद के लिए                      ज़िन्दगी भर हमने हर वक्त दूसरों के लिए जीना सीखा। उनके लिए ख़ुशियाँ, उनके लिए फैसले, उनके लिए सहन करना। अपनी हदों में रहकर भी हमने अपनी हदें पार की, ताकि सब खुश रह सकें अपनी भावनाओं को दबाया, अपनी ज़रूरतों को अनदेखा किया—बस यह सोचकर कि शायद यही ज़िन्दगी है। और फिर भी—न कभी उन्हें खुशी मिली, न कभी उन्होंने शुक्र अदा किया।  लेकिन अब… अब यह सवाल भी बेकार लगने लगा है। अब वक्त है, अपनी मुस्कान, अपनी खुशियाँ, अपनी ज़िन्दगी खुद के लिए जीने का। "दिल में तूफ़ान हो गया बरपा , कई बार ज़िन्दगी हमें ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है, जहाँ बाहर सब कुछ सामान्य दिखाई देता है, लेकिन भीतर एक ऐसा तूफ़ान उठ चुका होता है जिसे कोई देख नहीं पाता। वर्षों तक दूसरों के लिए जीते-जीते इंसान अपनी ही पहचान से दूर होता चला जाता है। उसे यह भी याद नहीं रहता कि उसकी अपनी इच्छाएँ क्या थीं, उसके अपने सपने कौन से थे और उसकी मुस्कान आख़िरी बार बिना किसी वजह के कब आई थी।  तुमने जो मुस्कुरा के देख लिया"  ...