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"इत्र की खुशबू... जो यादों को महकाए"---खूबसूरत सफर

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  इत्र की खुशबू... जो यादों को महकाए कुछ खुशबुएँ शरीर पर नहीं, रूह पर लगती हैं... — खामोश कलम कभी-कभी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत सफर किसी सड़क, किसी स्टेशन या किसी मंज़िल से नहीं शुरू होता... वह शुरू होता है एक खुशबू से। वो इत्र की खुश्बू , जो बाहर  से नहीं। .... अंदर से भी महकती है।  यादें बहुत खूबसूरत होती है  जो खुश्बू  बन कर  आती है , और दिल के हर कोने में बस  जाती है।  एक ऐसी खुशबू, जो अचानक किसी गुजरते हुए पल में हवा के साथ आकर आपकी सांसों को छू लेती है और फिर आपको वर्षों पीछे ले जाती है... उस आंगन में... जहाँ दादी शाम को तुलसी के पास दिया जलाती थीं। उस गली में... जहाँ बारिश के बाद मिट्टी महकती थी। उस कमरे में... जहाँ माँ की अलमारी में रखा इत्र पूरे घर को अपने होने का एहसास करवाता था। और तब समझ आता है कि... यादों का भी अपना एक इत्र होता है। जिसे वक्त कभी पुराना नहीं कर पाता। खुशबुएँ कभी बूढ़ी नहीं होतीं इंसान बूढ़ा हो जाता है। तस्वीरें पीली पड़ जाती हैं। दीवारों का रंग उतर जाता है। लेकिन कुछ खुशबुएँ... वर्षों बाद भी उत...