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" मुसाफ़िर ...ज़िन्दगी भी बड़ी दिलचस्प चीज़ है।क्यों ?"

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  ऐ मुसाफ़िर… ज़रा खुद से पूछ कौन खुश है तुझसे… और तुझे किसको खुश करना है? ज़िन्दगी की इस धारा में तुझे आखिर अकेले ही उतरना है। भीड़ बहुत मिलेगी रास्तों में, सलाहों की दुकानें भी सजी होंगी। हर मोड़ पर कोई न कोई तुझे सही रास्ता बताने को खड़ा होगा। और मज़े की बात यह है कि उनमें से आधे लोग खुद ही अपने रास्ते भूलकर आए होंगे। कोई कहेगा— “यह मत करो, लोग क्या कहेंगे?” कोई कहेगा— “ऐसे जीयो, वैसे मत जीओ।” और कोई तो इतना चिंतित होगा तुम्हारी ज़िन्दगी के बारे में, कि तुमसे भी ज़्यादा परेशान दिखाई देगा। पर सच पूछो तो उसे तुम्हारी ज़िन्दगी से नहीं, तुम्हारे फैसलों से समस्या होती है। ज़िन्दगी भी बड़ी दिलचस्प चीज़ है। जब हम छोटे होते हैं तो लोग कहते हैं— “बेटा पढ़ लो, ज़िन्दगी बन जाएगी।” जब पढ़ लेते हैं तो कहते हैं— “अब नौकरी करो, ज़िन्दगी बन जाएगी।” जब नौकरी कर लेते हैं तो कहते हैं— “अब शादी कर लो, ज़िन्दगी बन जाएगी।” और जब शादी हो जाती है तो वही लोग पूछते हैं— “इतने परेशान क्यों रहते हो?” सच में… कभी-कभी लगता है ज़िन्दगी से ज़्यादा लोगों की उम्मीदें थका...