सोमवार, 16 मार्च 2026

"ऐ मुसाफ़िर ....कौन खुश है तुझसे ....और तूने किसको खुश करना है?"

 

ऐ मुसाफ़िर… ज़रा खुद से पूछ

कौन खुश है तुझसे…
और तुझे किसको खुश करना है?

ज़िन्दगी की इस धारा में
तुझे आखिर
अकेले ही उतरना है।

भीड़ बहुत मिलेगी रास्तों में,
सलाहों की दुकानें भी सजी होंगी।
हर मोड़ पर कोई न कोई
तुझे सही रास्ता बताने को खड़ा होगा।

और मज़े की बात यह है कि
उनमें से आधे लोग
खुद ही अपने रास्ते
भूलकर आए होंगे।

कोई कहेगा—
“यह मत करो, लोग क्या कहेंगे?”

कोई कहेगा—
“ऐसे जीयो, वैसे मत जीओ।”

और कोई तो इतना चिंतित होगा
तुम्हारी ज़िन्दगी के बारे में,
कि तुमसे भी ज़्यादा
परेशान दिखाई देगा।

पर सच पूछो तो
उसे तुम्हारी ज़िन्दगी से नहीं,
तुम्हारे फैसलों से
समस्या होती है।

ज़िन्दगी भी बड़ी दिलचस्प चीज़ है।

जब हम छोटे होते हैं
तो लोग कहते हैं—
“बेटा पढ़ लो, ज़िन्दगी बन जाएगी।”

जब पढ़ लेते हैं
तो कहते हैं—
“अब नौकरी करो, ज़िन्दगी बन जाएगी।”

जब नौकरी कर लेते हैं
तो कहते हैं—
“अब शादी कर लो, ज़िन्दगी बन जाएगी।”

और जब शादी हो जाती है
तो वही लोग पूछते हैं—
“इतने परेशान क्यों रहते हो?”

सच में…

कभी-कभी लगता है
ज़िन्दगी से ज़्यादा
लोगों की उम्मीदें
थका देती हैं।

ऐ मुसाफ़िर,
थोड़ा रुक

ज़रा खुद से पूछ—

क्या तू सच में वही कर रहा है
जो तेरे दिल को सुकून देता है?

या इस डर से जी रहा है
कि कहीं कोई नाराज़
न हो जाए?

क्योंकि अगर
हर किसी को खुश करने निकल पड़े
तो एक दिन पता चलेगा—

सब खुश हैं…
सिवाय तेरे।

और यह दुनिया भी कमाल है।

अगर तू सफल हो गया
तो लोग कहेंगे—

“हमें तो पहले ही पता था।”

और अगर ठोकर खा गया
तो वही लोग कहेंगे—

“हमें तो पहले ही शक था।”

मतलब…

तुम जीतो
तो भी कहानी उनकी।

तुम हारो
तो भी कहानी उनकी।

इसलिए बेहतर है
कि कम से कम
कहानी अपनी लिखो।

ज़िन्दगी की इस धारा में
उतरना तो पड़ेगा ही।

कभी लहरें साथ देंगी,
कभी हिचकोले भी मिलेंगे।

कभी लगेगा
सब कुछ आसान है।

और कभी ऐसा भी लगेगा
जैसे किस्मत ने
छुट्टी ले ली हो

पर सच यही है—

अगर तुम पार हो गए
तो ज़िन्दगी संवर जाएगी।

और अगर बीच में ही
डर गए
तो वही हिचकोले
पूरी ज़िन्दगी का
किस्सा बन जाएँगे।

कभी-कभी ज़िन्दगी
हमें हल्का सा धक्का भी देती है
ताकि हम समझ जाएँ
कि हम खड़े कहाँ हैं।

पर हम इंसान भी
बड़े दिलचस्प होते हैं।

संकेत साफ़ होते हैं,
फिर भी समझने में
पूरी उम्र लगा देते हैं।

और फिर एक दिन
अचानक कहते हैं—

“काश…
थोड़ा पहले समझ जाता।”

इसलिए ऐ मुसाफ़िर…

अब संभल जा।

क्योंकि लौटकर
फिर इसी दुनिया की दलदल में
आना पड़ेगा।

और अगर हर बार
वही गलती दोहराई
तो ज़िन्दगी भी कहेगी—

“भाई… कुछ तो नया कर लो।”

देखो,
तुम्हें रोकने का
मुझे कोई शौक नहीं।

मैं तो बस इतना जानता हूँ कि
ज़िन्दगी की किताब में
हर पन्ने का हिसाब
कभी न कभी सामने आता है।

और जब आता है
तो बड़ी शांति से पूछता है—

**“जो जीना था…
वो जिया?

या बस
दूसरों को खुश करते रहे?”**

तो ऐ मुसाफ़िर…

इतना भी गंभीर मत हो
कि ज़िन्दगी बोझ लगने लगे।

थोड़ा हँस भी लिया कर,
थोड़ा खुद पर
मुस्कुरा भी लिया कर।

क्योंकि सच कहूँ—

ज़िन्दगी उतनी मुश्किल नहीं होती
जितना हम उसे
दूसरों की उम्मीदों से
बना देते हैं।

तो अब फिर वही सवाल—

कौन खुश है तुझसे?
और तुझे किसको खुश करना है?

अगर जवाब मिल जाए
तो समझ लेना
तुम्हारी आधी ज़िन्दगी
संवर गई।

और अगर जवाब
अभी न मिले…

तो कोई बात नहीं।

मुसाफ़िर हो…

चलते-चलते
कभी न कभी
मिल ही जाएगा।

बस… चलते रहो।

."जब तक हम खुद को खुश रखना नहीं सीख लेते, किसीको कैसे खुश रख सकते है ?"

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