उसने खुद को सुन लिया
वो हमेशा दूसरों की आवाज़ सुनती आयी थी।
घर की , रिश्तों की, जिम्मेदारियों की...
"लेकिन अपनी.........कभी नहीं"। l
हर सुबह वही ROUTINE---
चाय, खाना, काम, बच्चों की चिंता.......
और फिर एक हल्की सी थकान
जो चेहरे पर नहीं दिल में रहती थी.
वो मुस्कुराती रही,
सबको समझाती रही, सबकी तकलीफों
को अपने दिल में जगह देती रही।
और फिर उसे खुद भी आदत हो गयी
खामोश रहने की
कभी मन में कोई सवाल उठता भी ,
तो वो खुद ही उसे दब देती।
उसे लगने लगा थी उसकी बातों की कोई ज़रूरत नहीं।
"लोग कहते थे, "
"तुम स्ट्रांग हो"
पर किसी ने यह कभी नहीं पूछा की स्ट्रांग बनते बनते, वह
कितनी बार टूटी.
उस दिन कुछ अलग था।
न कोई बड़ा फैसला ,
न कोई लड़ाई ,
बस उसने शीशे में खुद को देखा ,
और पहली बार खुद से पूछा--
"तू ठीक है ना"?
आंखे भर आई।
"शब्द नहीं थे, पर एहसास बहुत थे"।
वह बैठ गई।
रोई नहीं। ..
बस साँस ली।
उसी पल उसने तय किया ---
अब वह हर बात पर चुप नहीं रहेगी।
हर दर्द को आदत नहीं बनाएगी।
और खुद को आखरी नंबर पर रखना,
"अब बंद करेगी"
वो आवाज़ जो सालो से
उसके भीतर कही छुपी हुई थी।
वो कह रही थी---
"तुम्हे भी हक़ है महसूस करने का....
तुम्हे भी हक़ है अपनी बात कहने का ".
उसने पहली बार
अपने दिल की बात को
चुप करने की कोशिश नहीं की।
उसने उसे सुना। ....
समझा। ....
और स्वीकार किया।
उस दिन दुनिया नहीं बदली।
लोग भी वही रहे,
पर वह बदल गयी।
क्युकी जिस दिन कोई इंसान
खुद को सुन लेता है
.
उसी दिन से उसकी नयी शुरुआत होती है....
चल ऐ ज़िन्दगी। ..
अब नया दौर ज़िन्दगी का तय कर आते है
सन्देश: खुद को सुनना selfish नहीं होता , self - awareness
ज़रूरी होता है।
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