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"प्रार्थना क्या है?:-- क्यों , कब और किससे की जाती है"?

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  प्रार्थना क्या है?  आओ बात करें ....जो की 100 % हमारे विश्वास से जुडी है.. क्यों की जाती है, कब की जाती है, और किससे की जाती है? ( प्रार्थना ) मनुष्य जब स्वयं को बहुत कमजोर महसूस करने लगता है… जब जीवन के बोझ उसके कंधों से भारी हो जाते हैं… जब रिश्तों की आवाज़ें भी भीतर के शोर को शांत नहीं कर पातीं… तब वह प्रार्थना करता है। और कभी-कभी… जब वही मनुष्य खुद को बहुत शक्तिशाली समझने लगता है… जब उसके भीतर अहंकार धीरे-धीरे जन्म लेने लगता है… जब उसे लगता है कि सब कुछ उसी के कारण है… तब भी उसे प्रार्थना की आवश्यकता होती है। क्योंकि प्रार्थना केवल माँगना नहीं है। प्रार्थना वह पुल है … जो इंसान को उसके अहंकार से हटाकर विनम्रता तक ले जाता है। जो डर से निकालकर विश्वास तक पहुँचाता है। जो “मैं” से हटाकर “हम” तक ले जाता है। प्रार्थना क्या है? — आत्मा की मौन भाषा प्रार्थना शब्दों का खेल नहीं है। यह किसी विशेष भाषा, धर्म, मंदिर, मस्जिद, चर्च या गुरुद्वारे तक सीमित नहीं है। प्रार्थना वह भाव है… जो बिना बोले भी ईश्वर तक पहुँच जाता है। एक माँ का अपने बच्चे के लिए रात भर जागना भी प्रार्थना है। किसी...

"असतो मा सद्गमय: असत्य से सत्य की ओर – आत्मा की यात्रा"

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  🌿✨ असतो मा सद्गमय: असत्य से सत्य की ओर – आत्मा की यात्रा   प्रस्तावना :--- ' असतो मा सद्गमय' बृहदारण्यक उपनिषद का एक प्रसिद्ध शांति मंत्र है , जिसका अर्थ है—"हे ईश्वर, मुझे असत्य (अंधकार/भ्रम) से सत्य (प्रकाश/ज्ञान)  की ओर ले चलो"। यह पूर्ण मंत्र आध्यात्मिक मार्गदर्शन, अज्ञानता से ज्ञान, और  मृत्यु से अमरत्व (आध्यात्मिक मुक्ति) की प्राप्ति के लिए एक प्रार्थना है “असतो मा सद्गमय” — यह केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि मानव आत्मा की सबसे गहरी पुकार है। इसका अर्थ है — “मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो।” लेकिन असत्य केवल झूठ बोलना नहीं है… यह भ्रम है, अज्ञान है, डर है, अधूरी समझ है। और सत्य केवल शब्द नहीं है… यह वह शांति है जहाँ मन थककर भी मुस्कुरा देता है। यह लेख सिर्फ पढ़ने के लिए नहीं… बल्कि महसूस करने के लिए है। 🌑 कहानी: “धुंध में खोया यात्री” बहुत समय पहले एक पहाड़ी गाँव में एक युवक रहता था — आरव। आरव बुद्धिमान था, लेकिन उसके मन में हमेशा एक बेचैनी रहती थी। वह दुनिया को समझना चाहता था, लेकिन हर बार और उलझ जाता था। एक दिन वह जंगल से गुजर रहा था। रास्ता साफ था, लेकिन ...

माँ तो बस माँ है...माँ का प्यार: एक एहसास जो शब्दों से परे है

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माँ तो बस माँ है… शब्द छोटा, संसार बड़ा           " HAPPY MOTHER'S DAY" एक एहसास… एहसास है प्यार का, प्यार का दुलार का, दुलार संसार का— क्योंकि संसार ही माँ है… CHAPTER – 5 : माँ… एक शब्द नहीं, एक संसार है माँ सुबह की पहली किरण है, जो खिड़की में नहीं, दिल में उतरती है। माँ एक आवाज़ है— जो नाम लेकर नहीं बुलाती, फिर भी सबसे गहराई तक पहुँच जाती है। माँ वह स्पर्श है— जो माथे पर हाथ रखते ही हर उलझन सुलझा देता है। माँ धूप भी है, छाँव भी है, थकान भी है, आराम भी है। माँ रसोई की खुशबू में घुली हुई दुआ है, दरवाज़े पर टिका इंतज़ार का सब्र है। माँ की आँखों में नींद कम होती है, चिंता ज़्यादा। माँ की थाली में रोटी कम पड़ जाए, पर हमारे हिस्से की कभी कम नहीं होती। माँ की हथेलियों की लकीरों में हमारी किस्मत बसती है, और उसकी झुर्रियों में हमारे बड़े होने की कहानी लिखी होती है। माँ वह ताकत है जो हमारे हिस्से का दर्द छुपाकर हमें हिम्मत देती है। वह दीवार है— जो खुद दरकती है, पर घर को टूटने नहीं देती। वह दीपक है— जो खुद जलता है, पर उजाला हमें देता है। माँ की गोद—दुनिया का सबसे सुरक्ष...