CHAPTER --3
वो चुप थी....
इसलिए नहीं ..
कि उसके पास..
कहने को कुछ नहीं था,
बल्कि इसलिए
कि उसने बहुत कुछ कह कर देख लिया
उसकी चुप्पी ....
कमजोरी नहीं थी
वो उन जज्बातो का बोझ थी
जो हर बार
"सब ठीक है"
कह कर दबा दिए जाते है
वो औरत थी---
जिसे खुश रहना सिखाया गया ,
पर खुश होना नहीं।
उसे प्यार मिला,
पर शर्तों के साथ।
इज्जत मिली,
पर चुप रहने की कीमत पर
अपनापन मिला पर,
अपनी पहचान छोड़ने के बाद।
वो हंसती थी
ताकि घर का माहौल हल्का रहे
वो सहती थी।
ताकि रिश्ते ,
भारी न हो जाये।
किसी ने नहीं देखा
उस ख़ामोशी के पीछे
कितनी बार,
उसका दिल टुटा था।
कितनी बार
वो बस इतना चाहती थी
बस कोई पूछ ले ---
"तुम सच में ठीक है ?"
उसकी चुप्पी में
शिकायते नहीं थी ,
बस उम्मीदें थीं।
उम्मीद, कि कभी तो
उसके जज्बात
बिना बोले समझे जायेंगे।
वो प्यार चाहती थी---
मुस्कान वाली नहीं,
सुकून वाली।
पर जब हर बार
उसकी भावनाओं को
"ज़्यादा सोचना"
कह कर ताल दिया गया
तो उसने बोलना छोड़ दिया।
कहना छोड़ दिया
और उस दिन जब वो सच में चुप हो गई ,
लोगो ने कहा--
" आज कल वो बदल गयी है"
हाँ ...
वो बदल गयी थी
और वो सब के लिए नहीं,
खुद के लिए जीना सीख रही थी .
MORAL....
औरत की चुप्पी को
उसकी सहमति मत समझिये
कभी कभी
खामोशी
सब से ऊँची चीख़ होती है.
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