शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

ख़ामोशी के दर्द----कुछ अपने, कुछ अपनों के ... दिल को छू लेने वाली सच्चाई

CHAPTER-4

 और वो चली गयी......

वो ज्यादा बोलती नहीं थी 

बस सब सुन लेती थी 

घर के शोर में उसकी आवाज़ कभी ऊपर नहीं आयी 

बच्चों की पढ़ाई 

घर की जिम्मेदारियां 

और रिश्तों के बीच वो खुद को कही रख ही नहीं पाई ....


लोग कहते थे वो strong  

पर STRONG का मतलब ये नहीं होता  

कि दर्द महसूस ही न हो...... 

वो रोज़ थक कर भी मुस्कुरातीं रही 

अपनी परेशानियों को बाद में

 देख लेंगे कह कर टालती रही 


किसी ने नहीं पूछा......

उसका दिन केसा गया...... 

किसी ने नहीं देखा 

 कब उसकी आँखों की चमक धीरे धीरे बुझने लगी 


और फिर एक दिन ---

सब कुछ नार्मल। ..

सुबह भी हुई...

 शाम भी आयी 


लेकिन बस एक चीज़ बदल गयी 

वो फिर किसी को नज़र नहीं आयी....

वो चली गयी..( दुनिया से ) 

लोग हैरान थे 

उसने कुछ कहा "क्यों नहीं ?"

किसी को बताया क्यों नहीं 


लेकिन वो बताती किसे। .....सब तो  अपने थे,

वो अपने "क्या सुनते  भी है"?...ये तो उसे पता ही नहीं था 

ये वो अपने थे..... 

जो कुछ बोलने पर खुद ही जज बन जाते थे 


इसलिए जब भी उसने बोला 

 "अरे कभी तो समझा करो"  कहा गया 

जब भी रोई उसे  स्ट्रांग बनो समझाया गया 

 वो दुनिया से नहीं.......

 चुप रहने की आदत से हारी थी 

और उसके जाने के बाद 

घर में सब कुछ था..... पर सुकून नहीं.......


हम एक औरत को उसके फ़र्ज़ हमेशा याद दिलाते रहते हैं 

लेकिन खुद अपनी ड्यूटी जो उस के प्रति वो हम कभी याद भी रखना नहीं चाहते ,

हम किस तरह का समाज बना रहे है 

शायद रिश्ते उतने परिपक्व नहीं रहे ,पर अपने घर के प्रति ,समाज के प्रति ,हमे कुछ तो खुद को जिम्मेदारी लेने के योग्य बनाना होगा ......

कम से कम खुद से तो बात करनी ही होगी। ."तो आओ बात करें "........




  


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