अरे नन्ही चिड़िया,
कभी मेरे आँगन में भी आया कर। ..
कभी कुछ अपनी सुना ,
कभी मेरी सुन् जाया कर। ....ऐ नन्ही चिड़िया...
किसी को फुर्सत नहीं ,
यहाँ बात करने की। .
इसलिए बस नन्हे नन्हे पंखो से..
आँगन में उतर आया। .....
ऐ नन्ही चिड़िया .........
कभी मेरे आँगन में भी आया कर। ...
कभी धुप की गर्मी,
कभी छाँव की ठंडक
कभी बारिश की बूंदो से थक कर
बस मेरे आँगन में बैठ जाया कर .. ..
ऐ नन्ही चिड़िया। ..
कभी मेरे आँगन में भी आया कर ...
फिर हम दोनों फुर्सत से ,
अपनी अपनी कह लेंगे। ..
तू भी ची ची कर लेना ,
पल भर फिर यु ही रह लेंगे।।
फिर पंखो को फैला कर....
अपने आसमान में उड़ जाया कर ,
ऐ नन्ही चिड़िया। ..
कभी मेरे आँगन में भी आया कर....
..
उस बचपन के आँगन में...
तू आज भी उड़ कर जाती होगी। ..
माँ होती थी जिस आँगन में,
तू वहाँ से दाना लाती होगी
अपने पंखो में छुपा मुझे भी
माँ के आँगन में घुमाया कर..
.ऐ नन्ही चिड़िया। ...
कभी मेरे आँगन में भी आया कर....
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