मासूम सी ख़्वाहिश ...माँ का आँगन ,और वो नन्ही चिड़िया
अरे नन्ही चिड़िया,
कभी मेरे आँगन में भी आया कर। ...
कभी कुछ अपनी सुना ,
कभी मेरी सुन् जाया कर। ....ऐ नन्ही चिड़िया...
किसी को फुर्सत नहीं ,
यहाँ बात करने की। .
इसलिए बस नन्हे नन्हे पंखो से..
आँगन में उतर आया कर। .....
ऐ नन्ही चिड़िया .........
कभी मेरे आँगन में भी आया कर। ...
कभी धुप की गर्मी,
कभी छाँव की ठंडक
कभी बारिश की बूंदो से थक कर
बस मेरे आँगन में बैठ जाया कर .. ..
ऐ नन्ही चिड़िया। ..
कभी मेरे आँगन में भी आया कर ...
फिर हम दोनों फुर्सत से ,
अपनी अपनी कह लेंगे। ..
मेरी सुनते सुनते ...
तू भी ची ची कर लेना ,
पल भर फिर यु ही रह लेंगे।।
फिर पंखो को फैला कर....
अपने आसमान में उड़ जाया कर ,
ऐ नन्ही चिड़िया। ..
कभी मेरे आँगन में भी आया कर....
..
उस बचपन के आँगन में...
तू आज भी उड़ कर जाती होगी। ..
माँ होती थी जिस आँगन में,
तू वहाँ से दाना लाती होगी
अपने पंखो में छुपा मुझे भी
माँ के आँगन में घुमाया कर..
.ऐ नन्ही चिड़िया। ...
कभी मेरे आँगन में भी आया कर....
बस उनकी यादों को लेकर
तू प्यार के गीत सुनाया कर
ऐ नन्ही चिड़िया…
कभी मेरे आँगन में भी आया कर…
और जब भी तू उड़कर आए,
तो ज़रा उन स्कूल के रास्तों से भी होकर आना…
जहां कभी हमारे कदम
मासूम सपनों के साथ चला करते थे।
वो रास्ते आज भी याद आते हैं,
जहां कंधों पर टंगा भारी सा बस्ता
दिल को कभी भारी नहीं लगता था…
क्योंकि साथ में चलते थे
कुछ अपने जैसे दोस्त,
जो हर थकान को
हंसी में बदल दिया करते थे।
कभी रास्ते में
पेड़ों की छांव तले रुक जाना,
कभी बिना वजह
हंसते-हंसते late हो जाना…
और फिर स्कूल की घंटी सुनकर
तेज़-तेज़ कदम बढ़ा देना—
जैसे दुनिया की सबसे बड़ी दौड़
हम ही जीतने वाले हों।
ऐ नन्ही चिड़िया…
उन दोस्तों की बस्ती से हो कर आना
उन दोस्तों की हंसी भी साथ ले आना…
जो आज भी
मेरे दिल के किसी कोने में
वैसे ही गूंजती है।
याद है वो क्लास का कोना,
जहां किताबें खुली रहती थीं,
पर नज़रें अक्सर
दोस्तों की शरारतों पर टिक जाती थीं।
कभी टीचर की डांट पर
एक-दूसरे की तरफ देखकर मुस्कुरा देना,
तो कभी किसी एक की छोटी सी गलती पर
सबका साथ में खड़ा हो जाना—
जैसे दोस्ती
कोई रिश्ता नहीं,
बल्कि एक भरोसा हुआ करती थी।
और वो लंच ब्रेक…
जिसका इंतज़ार
पूरे दिन रहता था।
एक टिफिन खुलता था,
और पांच-छह हाथ
उसमें एक साथ उतर आते थे…
पर किसी को कभी
कमी महसूस नहीं होती थी।
उस वक्त
रोटी का स्वाद
सिर्फ खाने में नहीं,
बल्कि साथ बैठने में होता था…
और दोस्ती
हर कौर के साथ
और गहरी हो जाया करती थी।
ऐ नन्ही चिड़िया…
अगर तुझसे हो सके,
तो वो कॉलेज की गलियां भी देख आना…
जहां कदम थोड़े संभलकर चलते थे,
पर दिल अब भी
बचपन की तरह बेफिक्र था।
कॉलेज की वो सुबहें…
जब किताबों से ज्यादा
दोस्तों से मिलने की खुशी होती थी।
कैंटीन की वो छोटी-सी मेज,
जहां चाय के एक कप पर
घंटों बातें चलती थीं।
कभी भविष्य के सपनों को
हवा में उड़ाया करते थे,
तो कभी बिना वजह
एक-दूसरे को छेड़कर
हंसी के ठहाके लगाया करते थे।
वो दिन
शायद छोटे थे,
पर यादें बहुत बड़ी छोड़ गए…
इतनी बड़ी
कि आज भी
मन के किसी कोने में
वैसे ही सजी हुई हैं।
आज जब
जिंदगी की राहें
थोड़ी लंबी और जिम्मेदार हो गई हैं,
तो कभी-कभी
मन चुपचाप
उन पुराने दिनों में लौट जाना चाहता है।
जहां न कोई जल्दबाज़ी थी,
न कोई बोझ…
सिर्फ दोस्त थे,
उनकी सच्ची बातें थीं,
और साथ चलने का
एक अनकहा वादा था।
ऐ नन्ही चिड़िया…
तू जब भी मेरे आँगन में आए,
तो उन दोस्तों की
एक हल्की सी झलक ले आना…
उनकी आवाज़ों की गूंज,
उनकी हंसी की मिठास
और उन रास्तों की धूल
मेरे आँगन में बिखेर जाना।
ताकि मैं
कुछ पल के लिए ही सही,
फिर से
उन्हीं रास्तों पर चल सकूं…
जहां दोस्ती
सबसे सच्चा रिश्ता हुआ करती थी,
और जिंदगी
बहुत ही आसान लगती थी।
ऐ नन्ही चिड़िया…
कभी मेरे आँगन में भी आया कर…


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