आओ बात करे....
उन बातों की,
जो हर रोज़
होठों तक आ कर ,
फिर भीतर ही कही गिर जाती है।
क्यों कि हर कोई बोलना चाहता है,
पर सुनना ......
सुनना किसी को नहीं आता।
हम ने भी कोशिश की थी,,
समझने की,जताने की,
खुद को सही ठहराने की ,
पर हर बार शब्द
किसी दीवार से टकरा कर
लौट आये।
तभी हम ने चुप रहना सिख लिया।
चुप्पी आसान लगती है।
क्यों की उसमें सवाल नहीं होते,
जवाब नहीं देने पड़ते।
पर ये चुप्पी। ....
धीरे धीरे बोझ बन जाती है।
और एक दिन। .....
यही ख़ामोशी बोलने लगती है।
सीने में अजीब-सी घुटन ,
आँखों में बिना नाम का दर्द,
और दिल में
बिन बोले शब्दों की भीड़।
वो लम्हा डरावना होता है ,
जब इंसान
खुद से भी बात करना छोड़ दे।
इससे पहले की
ख़ामोशी चिल्लाने लगे ,
इससे पहले
की अंदर का शोर
हमें तोड़ दे----
आओ बात करे.. ..बस बात। .....
किसी और से नहीं
बस खुद से।
बिना शर्म,
बिना डर ,
बिना ये सोचे कि
कोन क्या कहेगा।
बस बात......
दिल की ,
सच की,
और उस इंसान की
जो अब तक
सब के लिए मज़बूत बना रहा।
आओ.... बात करें। .....
क्योकि ....
कभी कभी बात करना ही इलाज होता है।
तो अब आप क्या सोच रहें ?????
करेंगे ना बात। .......
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