माँ केआँगन की होली के रंग.... गुजिया की खुश्बू के संग
होली.... मेरे बचपन की .... माँ रंगो की एक थाली बनाती थी। कभी कभी घर में रंग नहीं होते थे , तो भी माँ को कोई शिकायत नहीं होती थी। वो हल्दी निकलती , कुमकुम रखती, और मुस्कुरा कर कहती--- " यही रंग हैं। ... इन्ही से होली मना लो।" और हमें सच में वो हल्दी धूप जैसे खिली पीले पीले रंगों सी लगती थी। कुमकुम लाल गुलाल सा माँ की ममता जैसा लगता था। रंग कम थे, पर माँ की आँखों में पूरी होली चमकती थी। पास ही एक दूसरी थाली होती थी---- जिस में गुजिया लबालब भरी होती थी। गरम खुशबूदार , जैसे माँ के कड़ाई से अभी अभी निकली हो, वो माँ के किचन की गुजिया थी.... जिस का स्वाद आज भी किसी हलवाई की दुकान में नहीं मिलता। और मज़े की बात ये थी --- माँ सिर्फ गुजिया बनाना नहीं, चोरी करना भी सीखा जाती थी। कहती " अभी मत खाना" और फिर जान बुझ कर पीठ फेर लेती। हम एक दूसरे को देखते, आँखों ही आँखों में हसंते , और एक गरम गुजिया चुपचाप उठा लेते। ...