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माँ केआँगन की होली के रंग.... गुजिया की खुश्बू के संग

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  होली.... मेरे बचपन की .... माँ रंगो की एक थाली बनाती थी।  कभी कभी घर में रंग नहीं होते थे ,            तो भी माँ को कोई शिकायत नहीं होती थी।  वो हल्दी निकलती ,  कुमकुम रखती, और मुस्कुरा कर कहती--- " यही रंग हैं। ...  इन्ही से होली  मना लो।" और हमें सच में वो हल्दी धूप  जैसे खिली पीले  पीले रंगों सी लगती थी।  कुमकुम लाल गुलाल सा माँ की ममता जैसा लगता था।  रंग कम थे, पर माँ की आँखों में पूरी होली चमकती थी।  पास ही एक दूसरी थाली होती थी---- जिस में गुजिया  लबालब भरी होती थी।   गरम खुशबूदार , जैसे माँ के कड़ाई   से अभी अभी निकली हो, वो माँ के किचन की गुजिया थी.... जिस का स्वाद आज भी  किसी हलवाई की दुकान में नहीं मिलता।  और मज़े की बात ये थी --- माँ सिर्फ गुजिया बनाना नहीं,   चोरी करना भी सीखा जाती थी।  कहती " अभी मत खाना" और फिर जान बुझ कर  पीठ फेर लेती।  हम एक दूसरे को देखते, आँखों ही आँखों में हसंते , और एक गरम गुजिया  चुपचाप उठा लेते।  ...

इस होली रंग बदले: गुलाल के साथ , रिश्तों में सम्मान और प्यार के रंग

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 इस होली रंग बदले: गुलाल के साथ , रिश्तों में  सम्मान और प्यार के रंग    होली है .... तो रंग तो होना ही चाहिए।  पर दोस्तों, इस बार रंगों को  थोड़ा सा बदल कर देखें। हरा ,नारंगी, लाल, गुलाल  के साथ क्यों न   कुछ प्यार भरे शब्दों की होली खेली  जाये।  क्योकि चेहरों को सुर्ख लाल करना,  सिर्फ रंगों से ज़रूरी नहीं , कभी कभी दो मीठे शब्द भी  वो रंग चढ़ा जाते है. जो दिनों तक नहीं उतरता।  इस होली  माता पिता के दुलार के रंग हों, भाई बेहन के विश्वास के रंग हो, पति-पत्नी के  प्यार और सम्मान के रंग हो, और हर रिश्ते में  व्यवहार के रंग  भर दिए जाये  क्योंकि  रंग अगर रिश्तों में उतर जाएँ  तो ज़िंदगी खुद त्यौहार बन जाती है।  "होली के रंग, अपनों के संग" का भाव ही कुछ निराला है।  यह केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि प्रेम, एकता और  अपनों के साथ पुराने गिले-शिकवे भुलाकर नए रिश्ते जोड़ने का पर्व ,  सभी को गले लगाकर, प्रेम और भाईचारे का रंग फैलाएं। मिलजुल कर होली मनाएं, स्वादिष्ट गुजिया औ...

ख़ामोशी के दर्द----कुछ अपने, कुछ अपनों के ... दिल को छू लेने वाली सच्चाई

CHAPTER-4   और वो चली गयी... ... वो ज्यादा बोलती नहीं थी  बस सब सुन लेती थी  घर के शोर में उसकी आवाज़ कभी ऊपर नहीं आयी  बच्चों की पढ़ाई  घर की जिम्मेदारियां  और रिश्तों के बीच वो खुद को कही रख ही नहीं पाई .... लोग कहते थे वो strong    पर STRONG का मतलब ये नहीं होता   कि दर्द महसूस ही न हो......  वो रोज़ थक कर भी मुस्कुरातीं रही  अपनी परेशानियों को बाद में  देख लेंगे कह कर टालती रही  किसी ने नहीं पूछा...... उसका दिन केसा गया......  किसी ने नहीं देखा   कब उसकी आँखों की चमक धीरे धीरे बुझने लगी  और फिर एक दिन --- सब कुछ नार्मल। .. सुबह भी हुई...  शाम भी आयी  लेकिन बस एक चीज़ बदल गयी  वो फिर किसी को नज़र नहीं आयी.... वो चली गयी..( दुनिया से )  लोग हैरान थे  उसने कुछ कहा "क्यों नहीं ?" किसी को बताया क्यों नहीं  लेकिन वो बताती किसे । .....सब तो  अपने थे, वो अपने "क्या सुनते  भी है"?.. .ये तो उसे पता ही नहीं था  ये वो अपने थे.....  जो कुछ बोलने ...

मासूम सी ख़्वाहिश ...माँ का आँगन ,और वो नन्ही चिड़िया

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  अरे नन्ही चिड़िया, कभी मेरे आँगन में भी आया कर। ... कभी मेरे  आँगन में भी आया कर। .. कभी कुछ अपनी सुना ,  कभी मेरी सुन् जाया कर। ....ऐ नन्ही चिड़िया...  किसी को  फुर्सत नहीं , यहाँ बात करने की। . इसलिए बस नन्हे नन्हे पंखो से..  आँगन में उतर आया कर। ..... ऐ नन्ही चिड़िया ......... कभी मेरे आँगन में भी आया कर। ... कभी धुप की गर्मी, कभी छाँव की ठंडक  कभी बारिश की बूंदो से थक कर  बस मेरे आँगन में बैठ जाया कर .. .. ऐ नन्ही चिड़िया। .. कभी मेरे आँगन में भी आया कर ... फिर हम दोनों फुर्सत से , अपनी अपनी कह लेंगे। .. मेरी सुनते सुनते ... तू भी ची ची कर  लेना ,   पल भर  फिर यु ही रह लेंगे।।  फिर पंखो को फैला कर....  अपने आसमान में उड़ जाया कर , ऐ नन्ही चिड़िया। ..  कभी मेरे आँगन में भी आया कर....  .. उस बचपन के आँगन में...  तू आज भी उड़ कर  जाती होगी। .. माँ होती थी जिस आँगन में,               तू वहाँ  से दाना लाती होगी  अपने पंखो में छुपा मुझे भी...

आओ बात करे :शिवरात्रि और मन के अँधेरे की

 शिवरात्रि पर स्पेशल:-- "हे भोले बाबा, मेरे भोले नाथ ,  तीनो लोक में  तू ही तू."..  जब दुनिया के शोर में मन अपनी आवाज़ खो देता है, तब शिव का नाम ही है जो हमे वापस खुद से मिलता है।  शिवरात्रि सिर्फ एक त्यहार नहीं, ये एक अंतर-यात्रा है--- जहा हम अपनी कमज़ोरी, अपना दर्द, अपनी थकान  भोले नाथ के चरणों में अर्पण कर  देते है। जब शिव के साथ माँ पार्वती  होती है तो  भक्ति में शक्ति और शक्ति में  करुणा जुड़ जाती है  शिव का अर्थ: विनाश नहीं निर्माण है   अक्सर लोग शिव को विनाश का देवता  कहते हैं,पर सच ये है,   शिव विनाश नहीं परिवर्तन  है।  जो गलत है उसे तोडना ,जो सच है उसे बचाना,  ये शिव का स्वरुप है :- शिव:"  वो शून्य है जहाँ से सब शुरू होता है. और वो स्थिरता है जहा सब ठहर जाता है," जब जीवन में सब कुछ उलझा हुआ लगता है  तब शिव हमे सिखाते है - सब कुछ पकड़ने से नहीं , बल्कि छोड़ने से मिलता है।  माँ  पार्वती  : शक्ति जो संभाल लेती है  अगर शिव तपस्या है  तो पार्वती   समर...

वो चुप थी...ख़ामोशी में छुपी भावनाओं की कहानी

CHAPTER – 3 वो चुप थी… (औरत की खामोशी की सच्चाई) वो चुप थी… इसलिए नहीं… कि उसके पास कहने को कुछ नहीं था… बल्कि इसलिए… कि उसने बहुत कुछ कहकर देख लिया था… हर बार… थोड़ा समझाने की कोशिश की… थोड़ा अपने दिल को खोलने की कोशिश की… पर हर बार… उसकी बातों को… या तो टाल दिया गया… या हल्का समझ लिया गया… और फिर… धीरे-धीरे… उसने बोलना कम कर दिया… उसकी चुप्पी… कमजोरी नहीं थी… वो उन जज़्बातों का बोझ थी… जो हर बार… “सब ठीक है…” कहकर दबा दिए जाते थे… वो औरत थी… जिसे बचपन से सिखाया गया— “सबको खुश रखना…” पर ये कभी नहीं सिखाया गया… कि खुद खुश कैसे रहना है… उसे प्यार तो मिला… पर शर्तों के साथ… इज़्ज़त भी मिली… पर चुप रहने की कीमत पर… अपनापन भी मिला… पर अपनी पहचान छोड़ने के बाद… वो हँसती थी… ताकि घर का माहौल हल्का रहे… वो सहती थी… ताकि रिश्तों का बोझ किसी और पर न पड़े… किसी ने नहीं देखा… उस मुस्कान के पीछे… कितनी बार उसका दिल टूटा था… कितनी बार उसने खुद को समझाया था— “चलो… इस बार भी जाने दो…” कितनी रातें ऐसी थीं… जब वो चुपचाप लेटी रहती थी… आँखें खुली होती थीं… पर सवाल बंद नहीं होते थे… कितनी बार… वो बस इतना ...

" हे कभी सुना ---"ख़ामोशी जब बोलने लगती है "---पहली दस्तक

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CHAPTER—2 🍃 आओ बात करें… ख़ामोशी की आवाज़ से इंसान को अजीब ही मिट्टी से गढ़ा है भगवान ने… खासतौर पर एक औरत को। जब वह मुस्कुराती है… तो जैसे पूरी कायनात खूबसूरत हो जाती है, मानो कहीं धीमा-सा संगीत बज रहा हो, और हर तरफ खुशबू-सी फैल जाती हो। लेकिन… क्या कभी आपने सुना है— वो जब ख़ामोश हो जाती है… तो उसकी ख़ामोशी भी बोलने लगती है। आओ बात करें… उन बातों की, जो हर रोज होंठों तक आकर फिर भीतर ही कहीं गिर जाती हैं। क्योंकि हर कोई बोलना चाहता है, पर सुनना… सुनना किसी को नहीं आता। हमने भी कोशिश की थी— समझाने की, जताने की, खुद को सही ठहराने की। पर हर बार… शब्द किसी दीवार से टकराकर लौट आए। तभी हमने चुप रहना सीख लिया। चुप्पी… पहले आसान लगती है। क्योंकि उसमें सवाल नहीं होते, जवाब नहीं देने पड़ते। पर यही चुप्पी… धीरे-धीरे बोझ बन जाती है। और एक दिन… यही ख़ामोशी बोलने लगती है। जब ख़ामोशी अंदर जमा होने लगे… सीने में अजीब-सी घुटन, आँखों में बिना नाम का दर्द, और दिल में बिन बोले शब्दों की भीड़। वो लम्हा… डरावना होता है— जब इंसान खुद से भी बात करना छोड़ दे। सवाल: क्या सच में चुप रहना सही होता है? जवाब: कभी-...

आओ बात करे... chapter -1 ....खुद को मज़बूत कर के जीवन को संभालना

**CHAPTER – 1 🍃🌠 आओ बात करे… बस बात…** आओ बात करे….. आज किसी और से नहीं… खुद से। क्योंकि अक्सर हम सबसे बातें करते हैं, पर अपने भीतर जो चल रहा होता है , उसे सुनने का वक़्त ही नहीं निकालते। सुबह से रात तक, हम किसी के लिए माँ होते हैं, किसी के लिए बेटी, किसी के लिए साथी, किसी के लिए ज़िम्मेदारी। पर… अपने लिए कब होते हैं? ज़िन्दगी हमें मजबूत दिखना सिखा देती है— मुस्कुराते रहना, सब संभाल लेना, और हर सवाल के जवाब में "I AM OK" कह देना। धीरे-धीरे ये सब एक आदत बन जाता है। पर सच ये है कि— हर मजबूती के पीछे एक थकी हुई आवाज़ होती है , जो बस इतना कहना चाहती है— “थोड़ा रुक जाओ… आओ बात करे… बस बात…” कभी आपने खुद से आख़िरी बार कब बात की थी? सोचिए… आख़िरी बार कब आपने अपने दिल से पूछा था— "तुम सच में कैसे हो?" हम अक्सर उन लम्हों को भूलने की कोशिश करते हैं— जहाँ हम टूटे थे, पर कह नहीं पाए। उन सवालों को दबा देते हैं— जिनके जवाब कभी मिल ही नहीं पाए। और उन ख्वाहिशों को… जो "ज़िम्मेदारियों" के नीचे कहीं दब सी गईं। Research कहती है कि जब इंसान अपने emotions को बार-बार दबाता ...