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बुनियाद — हमारी पहचान की असली नींव — (एक आईना समाज के नाम)

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बुनियाद  — हमारी पहचान की असली नींव “मजबूत इमारतें ऊँचाई से नहीं, मजबूत बुनियाद से पहचानी जाती हैं।” बुनियाद घर की हो तो  ईंटो की नींव मजबूत होनी चाहिए।  ताकि मकान सालो साल मजबूत रहे.. लेकिन परिवार की बुनियाद घर में रहने वाले लोगो के  संस्कारों से मजबूत बनती है...हमारे अच्छे  विचार से  ,  अच्छा परिवार  बनता है. अच्छा परिवार  तो अच्छे  समाज की बुनियाद होती है।  हम अक्सर कहते हैं — आजकल के बच्चे बड़ों का सम्मान नहीं करते… बच्चे बुजुर्गों के पास बैठना पसंद नहीं करते… बच्चे हमारी बात नहीं मानते… लेकिन क्या हमने कभी ठहरकर खुद से पूछा है — क्यों… आखिर क्यों? क्या सच में गलती केवल बच्चों की है? या कहीं न कहीं हमारी अपनी बुनियाद कमजोर हो रही है? बच्चों को दोष देना आसान है, खुद को देखना मुश्किल जब बच्चे हमारी बात नहीं मानते, तो हम तुरंत शिकायत करने लगते हैं। हम कहते हैं — “आज की पीढ़ी बदल गई है।” लेकिन सच तो यह है कि हर पीढ़ी उसी मिट्टी से बनती है, जो उसे घर में मिलती है। बच्चे केवल किताबों से नहीं सीखते, वे हमारे व्यवहार से सीखते हैं। अगर...

“मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।”:--- मन की स्थिति

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  मन के हारे हार है, मन के जीते जीत परमात्मा को पाइए मन ही के प्रतीत" मन के हारे हार है, मन के जीते जीत" संत कबीरदास जी का एक प्रसिद्ध दोहा है, जिसका अर्थ है कि जीत और हार हमारी मानसिक स्थिति पर निर्भर करती है । यदि आप मन में हार स्वीकार कर लेते हैं, तो आप हार जाते हैं, और यदि मन में जीत का निश्चय कर लेते हैं, तो सफल होते हैं। यह कहावत आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच को सबसे महत्वपूर्ण मानती है मन… एक ऐसा शब्द, जो छोटा है, लेकिन इसकी गहराई पूरी जिंदगी को दिशा दे देती है। इंसान बाहर से जितना भी मजबूत क्यों न दिखे, उसकी असली ताकत उसके मन की स्थिति पर निर्भर करती है। यही वजह है कि कहा गया है— “मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।” लेकिन सवाल ये है कि जब मन ही चंचल हो, डगमगाता रहे, कभी इधर तो कभी उधर भागता रहे… तब जीत कैसे मिले? 🧠 मन की चंचलता — असली युद्ध भीतर है मन का स्वभाव ही चंचल है। वो कभी अतीत में जाता है, कभी भविष्य की चिंता में उलझ जाता है। कभी कहता है: “तुम नहीं कर पाओगे” कभी कहता है: “कल से शुरू करेंगे” कभी डराता है: “अगर असफल हो गए तो?”       यही च...

"पैसे की असली दुनिया: पैसे की प्रकृति, फायदे, नुकसान और हमारी जिंदगी पर पैसे का असर"

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  पैसे की असली दुनिया:  पैसे  की प्रकृति, फायदे, नुकसान और हमारी जिंदगी पर पैसे  का असर पैसा… एक छोटा सा शब्द, लेकिन इसकी ताकत पूरी दुनिया को  चलाती है। हम सुबह उठते हैं, काम करते हैं, सपने देखते है —इन सबके पीछे कहीं न कहीं पैसा जुड़ा होता है। लेकिन क्या हमने कभी रुककर सोचा है कि आखिर पैसा है क्या? क्या ये सिर्फ कागज़ और सिक्के हैं, या इससे कहीं ज्यादा गहरी चीज़? इस  में हम पैसे की असली प्रकृति, इसके फायदे और नुकसान, और आज की “पैसों की दुनिया” को एक इंसानी नजरिए से समझने की कोशिश करेंगे। पैसे की असली प्रकृति क्या है? पैसा असल में कोई वस्तु नहीं है, बल्कि एक विश्वास (trust) है। यह एक ऐसा माध्यम है, जिसे हम सब मिलकर मानते हैं कि इसकी कीमत है। अगर कल से लोग इस पर भरोसा करना बंद कर दें, तो इसकी कोई वैल्यू नहीं बचेगी। पैसा हमें एक सरल तरीका देता है लेन-देन का। पहले के समय में लोग चीजों का आदान-प्रदान (barter system) करते थे—जैसे अनाज के बदले कपड़े। लेकिन पैसा आने के बाद सब कुछ आसान हो गया। लेकिन असली बात यह है कि पैसा सिर्फ लेन-देन का जरिया नहीं है। यह हमारे स...

" मुसाफ़िर ...ज़िन्दगी भी बड़ी दिलचस्प चीज़ है।क्यों ?"

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  ऐ मुसाफ़िर… ज़रा खुद से पूछ कौन खुश है तुझसे… और तुझे किसको खुश करना है? ज़िन्दगी की इस धारा में तुझे आखिर अकेले ही उतरना है। भीड़ बहुत मिलेगी रास्तों में, सलाहों की दुकानें भी सजी होंगी। हर मोड़ पर कोई न कोई तुझे सही रास्ता बताने को खड़ा होगा। और मज़े की बात यह है कि उनमें से आधे लोग खुद ही अपने रास्ते भूलकर आए होंगे। कोई कहेगा— “यह मत करो, लोग क्या कहेंगे?” कोई कहेगा— “ऐसे जीयो, वैसे मत जीओ।” और कोई तो इतना चिंतित होगा तुम्हारी ज़िन्दगी के बारे में, कि तुमसे भी ज़्यादा परेशान दिखाई देगा। पर सच पूछो तो उसे तुम्हारी ज़िन्दगी से नहीं, तुम्हारे फैसलों से समस्या होती है। ज़िन्दगी भी बड़ी दिलचस्प चीज़ है। जब हम छोटे होते हैं तो लोग कहते हैं— “बेटा पढ़ लो, ज़िन्दगी बन जाएगी।” जब पढ़ लेते हैं तो कहते हैं— “अब नौकरी करो, ज़िन्दगी बन जाएगी।” जब नौकरी कर लेते हैं तो कहते हैं— “अब शादी कर लो, ज़िन्दगी बन जाएगी।” और जब शादी हो जाती है तो वही लोग पूछते हैं— “इतने परेशान क्यों रहते हो?” सच में… कभी-कभी लगता है ज़िन्दगी से ज़्यादा लोगों की उम्मीदें थका...