एक मुस्कान खुद के लिए । ....
ज़िंदगी भर दूसरों के लिए हर वक़्त जीके देख लिया।
अपनी हद्द में रह कर भी
हद से गुजर कर देख लिया।
न वो खुश हुए ,
ना कभी शुक्रगुजार हुए।
और शायद अब ये सवाल भी बेकार है।
गलती कहा रह गई।
इसलिए अब....
अब खुद से समझौता नहीं होगा।
अब अपनी चुप्पी को आदत नहीं बनने दूँगी।
हर बार की तरह खुद को आखरी नंबर पर नहीं रखूँगी।
बस खुश रहूँगी। .....
दुसरो को खुश करते करते
अगर खुद ही टूट जाएँ ,
तो इसे त्याग नहीं ,
खुद को खो देना कहते है...
खुद के लिए भी कुछ
पलों को जी लिया जाये,
एक मुस्कान...... खुद को,
भी दे कर जी लिया जाये।
जो किया, जिन के लिए किया
वो सब अपने है
कोई पराये नहीं
फिर भी कोई बढ़ाई नहीं। ..
कभी तो कुछ ख़ुशी
दूसरों से भी महसूस हो
कुछ अपने करने की। .............. ?
अब सब कुछ नहीं बदलूंगी ,
पर इतना ज़रूर बदलूँगी। .....
कोई एहमियत दे या न दे। .
मैं खुद को एहमियत ज़रूर दूँगी।
न किसी को परेशान करने की इत्छा
न खुद परेशान होना है।
आज से ,
एक मुस्कान। ....
खुद के लिए।
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