मंगलवार, 17 मार्च 2026

आओ बात करे....बस बात ....मेरी नन्ही परी ने जब ये नाम दिया

 CHAPTER -4

आओ बात करे .....बस बात

हाँ, आप से ही कह रही हूँ ... 

 आइये ..... ज़रा बैठिये।

कोई जल्दी नहीं  है। ...

बस कुछ लम्हे.......

जो शयद हम रोज़ सोचते है

 पर  कह नहीं  पाते। ..

(आओ... बात करें.....बस बात) 

ये  लफ्ज़ , मैंने कही से चुराए नहीं 

ये शब्द .......जब मेरी बेटी २ साल की थी,

 तब वो मेरी ऊँगली पकड़ कर ,

पास बैठा लेती थी और बोलती 

मम्मी...... "आओ ना ... बात करें" ....और 

 मैं सब काम छोड़ कर उससे बात करती थी


न उसे कोई कहानी  चाहिए थी,

 न ही कोई सवाल। .....

बस मेरा होना काफी था, 

कोई अपना जो साथ हो  

बिना कहे समझने  वाला........

बच्चों को वक़्त देना बहुत ज़रूरी है, 


कुछ भी लौट कर नहीं आता ,लेकिन जब अपने बच्चे ,

सामने होते है तो जैसे बचपन फिर से लौट आता हैं।

 जब भी वक़्त बच्चो के साथ मिले उसे पूरा enjoy कीजिये 

एक बार उनके साथ बच्चा बन कर देखिये, 

"सब काम एक तरफ... वो पल"....


लेकिन आज के इंसान की सबसे बड़ी  सच्चाई यही है कि 

इतनी बड़ी CONTACT LIST पर बात है....

पर CONNECTION ZERO....

सब के नंबर PHONE में हैं ... पर दिल के पास कोई  नहीं ,


कभी कभी बात करने का मन होता है 

पर उस CONTACT LIST में  कोई नह ी होता, 

जिसे बिना सोचे हम बात कर  ले....


क्यों? ...आख़िर  क्यों? .....

आखिर हम इतने व्यस्त कहा होते जा रहे? 

जो रिश्तों को खोते जा रहे....


आज लोग ONLINE बहुत हैं 

पर AVAILABLE नहीं।।।।।


STATUS लगा लेंगे ,

REEL पर दिखाई  देंगे ,

पर कॉल आ जाये ,तो मन कहता है...

अभी बात नह करनी .....


जब  नार्मल बात नहीं होती,

 फिर जो होती है ।

वो होती है थकान  की...ख़ामोशी की...

अंदर भरी हुई बातो की(भीड़).....

और ये वो बाते है, जो हर किसी से नह ी  होती।।।।


इसलिए इंसान अकेला नहीं होता ,

बस थका होता है 

कर वक़्त STRONG बन  कर ,

समझ समझ कर, 

चुप रह कर, 

शयद इसीलिए फ़ोन हाथ में होते हुए भी,

 डायल करने का मन नहीं होता .

और फिर वही अकेलेपन ......


 "क्यों ना.... इसलिए अकेलेपन से ही जीत लिए जाये।।।

खुद को "

आओ बात करे। .. 

खुद के भरोसे को वापिस लाये। .. "मैं खुद ही हु। ..जो भी हूँ "


ना कोई और है... ना ही हो सकता है 

ये बात किसी और को नहीं खुद को बताने है 

आओ प्यार करे......  

खुद से ......

आओ इंतज़ार करे खुद का..

आखिर .... हम कब खुद के लिए खुद को फ्री कर पाएंगे .

(आओ... बात करें.....बस बात) .........

सोमवार, 16 मार्च 2026

"ऐ मुसाफ़िर ....कौन खुश है तुझसे ....और तूने किसको खुश करना है?"

 

ऐ मुसाफ़िर… ज़रा खुद से पूछ

कौन खुश है तुझसे…
और तुझे किसको खुश करना है?

ज़िन्दगी की इस धारा में
तुझे आखिर
अकेले ही उतरना है।

भीड़ बहुत मिलेगी रास्तों में,
सलाहों की दुकानें भी सजी होंगी।
हर मोड़ पर कोई न कोई
तुझे सही रास्ता बताने को खड़ा होगा।

और मज़े की बात यह है कि
उनमें से आधे लोग
खुद ही अपने रास्ते
भूलकर आए होंगे।

कोई कहेगा—
“यह मत करो, लोग क्या कहेंगे?”

कोई कहेगा—
“ऐसे जीयो, वैसे मत जीओ।”

और कोई तो इतना चिंतित होगा
तुम्हारी ज़िन्दगी के बारे में,
कि तुमसे भी ज़्यादा
परेशान दिखाई देगा।

पर सच पूछो तो
उसे तुम्हारी ज़िन्दगी से नहीं,
तुम्हारे फैसलों से
समस्या होती है।

ज़िन्दगी भी बड़ी दिलचस्प चीज़ है।

जब हम छोटे होते हैं
तो लोग कहते हैं—
“बेटा पढ़ लो, ज़िन्दगी बन जाएगी।”

जब पढ़ लेते हैं
तो कहते हैं—
“अब नौकरी करो, ज़िन्दगी बन जाएगी।”

जब नौकरी कर लेते हैं
तो कहते हैं—
“अब शादी कर लो, ज़िन्दगी बन जाएगी।”

और जब शादी हो जाती है
तो वही लोग पूछते हैं—
“इतने परेशान क्यों रहते हो?”

सच में…

कभी-कभी लगता है
ज़िन्दगी से ज़्यादा
लोगों की उम्मीदें
थका देती हैं।

ऐ मुसाफ़िर,
थोड़ा रुक

ज़रा खुद से पूछ—

क्या तू सच में वही कर रहा है
जो तेरे दिल को सुकून देता है?

या इस डर से जी रहा है
कि कहीं कोई नाराज़
न हो जाए?

क्योंकि अगर
हर किसी को खुश करने निकल पड़े
तो एक दिन पता चलेगा—

सब खुश हैं…
सिवाय तेरे।

और यह दुनिया भी कमाल है।

अगर तू सफल हो गया
तो लोग कहेंगे—

“हमें तो पहले ही पता था।”

और अगर ठोकर खा गया
तो वही लोग कहेंगे—

“हमें तो पहले ही शक था।”

मतलब…

तुम जीतो
तो भी कहानी उनकी।

तुम हारो
तो भी कहानी उनकी।

इसलिए बेहतर है
कि कम से कम
कहानी अपनी लिखो।

ज़िन्दगी की इस धारा में
उतरना तो पड़ेगा ही।

कभी लहरें साथ देंगी,
कभी हिचकोले भी मिलेंगे।

कभी लगेगा
सब कुछ आसान है।

और कभी ऐसा भी लगेगा
जैसे किस्मत ने
छुट्टी ले ली हो

पर सच यही है—

अगर तुम पार हो गए
तो ज़िन्दगी संवर जाएगी।

और अगर बीच में ही
डर गए
तो वही हिचकोले
पूरी ज़िन्दगी का
किस्सा बन जाएँगे।

कभी-कभी ज़िन्दगी
हमें हल्का सा धक्का भी देती है
ताकि हम समझ जाएँ
कि हम खड़े कहाँ हैं।

पर हम इंसान भी
बड़े दिलचस्प होते हैं।

संकेत साफ़ होते हैं,
फिर भी समझने में
पूरी उम्र लगा देते हैं।

और फिर एक दिन
अचानक कहते हैं—

“काश…
थोड़ा पहले समझ जाता।”

इसलिए ऐ मुसाफ़िर…

अब संभल जा।

क्योंकि लौटकर
फिर इसी दुनिया की दलदल में
आना पड़ेगा।

और अगर हर बार
वही गलती दोहराई
तो ज़िन्दगी भी कहेगी—

“भाई… कुछ तो नया कर लो।”

देखो,
तुम्हें रोकने का
मुझे कोई शौक नहीं।

मैं तो बस इतना जानता हूँ कि
ज़िन्दगी की किताब में
हर पन्ने का हिसाब
कभी न कभी सामने आता है।

और जब आता है
तो बड़ी शांति से पूछता है—

**“जो जीना था…
वो जिया?

या बस
दूसरों को खुश करते रहे?”**

तो ऐ मुसाफ़िर…

इतना भी गंभीर मत हो
कि ज़िन्दगी बोझ लगने लगे।

थोड़ा हँस भी लिया कर,
थोड़ा खुद पर
मुस्कुरा भी लिया कर।

क्योंकि सच कहूँ—

ज़िन्दगी उतनी मुश्किल नहीं होती
जितना हम उसे
दूसरों की उम्मीदों से
बना देते हैं।

तो अब फिर वही सवाल—

कौन खुश है तुझसे?
और तुझे किसको खुश करना है?

अगर जवाब मिल जाए
तो समझ लेना
तुम्हारी आधी ज़िन्दगी
संवर गई।

और अगर जवाब
अभी न मिले…

तो कोई बात नहीं।

मुसाफ़िर हो…

चलते-चलते
कभी न कभी
मिल ही जाएगा।

बस… चलते रहो।

."जब तक हम खुद को खुश रखना नहीं सीख लेते, किसीको कैसे खुश रख सकते है ?"

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

आओ बात करे---चकमक पत्थर से कृत्रिम बुद्धिमत्ता(AI ) तक

आओ बात करें — सोच बदलने से क्या बदलेगा?

chapter --6 

आजकल हम अक्सर एक वाक्य सुनते हैं—

“सोच बदलो, समाज बदलेगा।”

यह बात सुनने में अच्छी लगती है,

लेकिन कभी-कभी मन में एक सवाल भी उठता है—

आख़िर समाज को बदलने की ज़रूरत क्यों है?

क्या हमारे माता-पिता और बुजुर्गों की सोच गलत थी?


क्या वे कम समझदार थे?

उन्होंने वही सिखाया  जो उन्हें सही लगा, क्योंकि उनका

उद्देश्य हमेशा हमारा भला ही था।

            तो फिर आज हर जगह सोच बदलने की बात क्यों की जा रही है?


बदलाव का मतलब विरोध नहीं होता

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि सोच बदलने का मतलब

अपने बुजुर्गों को गलत साबित करना नहीं होता।

असल में बदलाव का मतलब है—

समझ का विस्तार।

समय बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं और इंसान के सामने नई चुनौतियाँ आती हैं।

ऐसे में सोच का विकसित होना स्वाभाविक है।


सोच के विकास को समझने के लिए एक उदाहरण

अगर हम पुराने समय को देखें, तो लोग चकमक पत्थर से आग जलाते थे।

फिर समय बदला और माचिस का आविष्कार हुआ।

इसके बाद लाइटर आया, जिसने आग जलाना और आसान बना दिया।

आज के दौर में तो इलेक्ट्रिक उपकरणों से भी गर्मी और आग पैदा की जा सकती है।

क्या इसका मतलब यह है कि पहले का तरीका गलत था?

बिलकुल नहीं।

उस समय के हिसाब से वही सबसे बेहतर और उपयोगी तरीका था।

लेकिन जैसे-जैसे समय आगे बढ़ा, वैसे-वैसे नए साधन और नई सोच सामने आती गई।

यही प्रक्रिया प्रगति कहलाती है।


पुरानी सीख और नई समझ का संतुलन

हमारे बुजुर्गों ने हमें जो मूल्य सिखाए हैं,

वे हमारी मजबूत नींव हैं।

लेकिन हर नई पीढ़ी उस नींव पर

एक नई मंज़िल बनाती है।

अगर हम सिर्फ पुरानी बातों को ही पकड़े रहेंगे, तो आगे बढ़ना मुश्किल हो जाएगा।

और अगर हम पुरानी सीख को पूरी तरह नकार देंगे, तो हमारी जड़ें कमजोर हो जाएंगी।

इसलिए सही रास्ता यही है कि

पुरानी सीख और नई समझ के बीच संतुलन बनाया जाए।


क्या नई पीढ़ी सच में ज्यादा समझदार है?

आज के समाज में कभी-कभी ऐसा लगता है कि नई पीढ़ी खुद को

बहुत ज्यादा समझदार मानने लगी है।

लेकिन असली समझदारी यह नहीं है कि हम पुरानी पीढ़ी को गलत साबित करें।

सच्ची समझदारी यह है कि

हम अपने बुजुर्गों का सम्मान करें
उनकी बातों और अनुभव को समझें
और फिर समय के अनुसार उसमें सुधार करें

क्योंकि बिना सम्मान के किया गया बदलाव अक्सर अहंकार में बदल जाता है।


समाज कैसे बदलता है?

समाज कभी भी अचानक नहीं बदलता।

यह बदलाव धीरे-धीरे आता है।

जब लोग सवाल पूछते हैं,

जब लोग सोचते हैं,

जब लोग नई चीज़ों को समझने की कोशिश करते हैं—

तभी समाज आगे बढ़ता है।

लेकिन यह बदलाव तभी सुंदर और सकारात्मक होता है

जब उसमें सम्मान, धैर्य और विनम्रता भी शामिल हो।


आधुनिकता और तकनीकी बदलाव का दौर

आज का समय केवल सामाजिक बदलाव का नहीं, बल्कि तकनीकी बदलाव का भी है।

आज दुनिया में कंप्यूटर, इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) ने

हमारे सोचने और सीखने का तरीका ही बदल दिया है।

पहले ज्ञान सीमित था—

किताबों, अनुभवों या किसी व्यक्ति की सलाह तक।

लेकिन आज एक छोटा सा मोबाइल फोन

दुनिया भर की जानकारी हमारे सामने ला देता है।

इंटरनेट और नई तकनीक के कारण युवा पीढ़ी तेजी से सीख रही है और नई तरह से सोच रही है।

इसी वजह से कई बार ऐसा लगता है कि सोच अचानक बदल गई है।


निष्कर्ष

असल में सोच बदलना परंपराओं का विरोध नहीं है, बल्कि उन्हें समझते हुए आगे बढ़ना है।

हमारे बुजुर्गों की सीख हमारी जड़ों की तरह है,

और नई सोच उन जड़ों पर उगने वाली नई शाखाओं की तरह।

अगर जड़ें मजबूत हों और शाखाएँ फैलती रहें,

तो पेड़ और भी ज्यादा मजबूत और फलदायी बनता है।

ठीक उसी तरह समाज भी आगे बढ़ता है—

पुरानी सीख के सम्मान और नई सोच के संतुलन के साथ।

गुरुवार, 12 मार्च 2026

माँ तो बस माँ है..... शब्द छोटा ,संसार बड़ा---- एहसास ,प्यार, विश्वास का

माँ तो बस माँ है..... शब्द छोटा ,संसार बड़ा

एक एहसास ,

एहसास है प्यार का,

प्यार का दुलार का ,

दुलार संसार का,

संसार तो  माँ  है.......


CHAPTER- -5

माँ ...एक शब्द नहीं ,

एक संसार है.

माँ सुबह की पहली किरण  है। 

जो खिड़की में नहीं, दिल में उतरती है। 

माँ एक आवाज़ है,

जो नाम ले कर  नहीं बुलाती ,फिर भी सब से गहरी उतरती है,

माँ, वह स्पर्श है,

जो माथे पर हाथ रखते ही सारी उलझने सुलझा देता है। 

माँ....

धुप भी है , छाँव भी है। 

थकन भी है आराम भी है। 

माँ रसोई की खुबू में खुली हुई दुआ है। 

माँ  दरवाजे पर टीके इंतज़ार का सब्र है। 

माँ की आँखों में,

 नींद कम होती है,

चिंता ज्यादा। 

माँ की थाली में ,रोटी कम पड़  जाती है। 

पर हमारे  हिस्से की, कभी कम होती। 

माँ की हथेलियों की लकीरों में, हमरी किस्मत बस्ती है। 

माँ की झुर्रियों में हमारे  बड़े होने की कहानी लिखी होती है। 


माँ वह ताकत है जो हमारे  हिस्से का दर्द छुपा कर 

हमे हिम्मत देती है। 


वह दिवार है जो खुद दरकती है। 

पर घर को टूटने नहीं देती। 

वह दीपक है जो खुद जलता है पर उजाला हमे देता है। 

 माँ की गोद दुनिया का सब से सुरक्षित स्थान है। 

माँ का आंचल सब से अछि छाँव है। 

माँ की  सब से अच्छी सिख है। 

माँ की डांट चुप्पी सब से गहरी समझ है। 

माँ कभी भगवान का दूसरा नाम लगती है.

कभी धरती का धैर्य। 

वह गिरने नहीं देती। 

और अगर गिर जाये तो उठना सिखाती है। 

माँ--- केवल जनम नहीं देती जीना सिखाती है.

चलना सिखाती है । 


और ज़रूरत पड़े तो खड़े होना भी सिखाती है। 


माँ की दुनिया,-----

हम से शुरू हो कर  हम ही  पर खतम होजाती है। 

उसकी दुआएँ हमारे हर रस्ते से पहले पहुंच जाती है। 

माँ की हंसी में घर बसता है। 

माँ की ख़ामोशी में त्याग छिपा होता है। 

माँ के "खाना खा लिया " में पूरा ब्रह्माण्ड छिपा होता है। 

माँ की "सावधान रहना"में 

पूरी उम्र की सुरक्षा छुपी होती है। 


माँ जब दूर होती है तो भी पास होती है। 

जब चुप होती है तो भी साथ होतीहै। 

  •   माँ--- कभी छुट्टी नहीं लेती। 
  •   माँ---  कभी आधी नहीं होती। 
  •   माँ ----कभी कम नहीं होती। 

वह हर भूमिका में पूरी होती है। 
बेटी होकर भी,
पत्नी हो कर  भी ,

और सब से बढ़ कर माँ हो कर,

माँ की ऊगली पकड़ कर हम ने दुनिया देखि 

माँ का हाथ छोड़ कर हम ने दुनिया जी। 

पर हर जीत के बाद जिस की तलाश होती है...वो माँ होती है- 

 माँ --वह आशीर्वाद है जो बिना मांगे मिलता है। 

 माँ--वह प्रार्थना है जो बिना बोले सुनी जाती है। 

वह प्रेम है जो शर्तो से नहीं बांधता। 

 
फूल ,उपहार ,शब्द सब छोटे पड़ जाते है.
क्यों कि माँ का ऋण चुकाया नहीं जा सकता। 
माँ को बस महसूस किया जा सकता है। 
सम्मान दिया जा सकता है। 
 
माँ तू घर की धड़कन है। 
तू जीवन की जड़ है तू हर रिश्ते का आधार है। 
तू है तो सब है 
..
माँ तुझे शब्दों  में बांधना संभव नहीं। ...
फिर भी हर शब्द तुझ से ही शुरू होता है। 

आओ बात करे .....माँ की ....."जो शब्द नहीं तो उसके बिना  शब्द ही नहीं है "
माँ तुझे कोटि कोटि वंदन। .....





 

बुधवार, 11 मार्च 2026

"दूसरों को सुनते सुनते ,एक दिन उसने खुद को सुन लिया"

 उसने खुद को सुन लिया 

वो हमेशा दूसरों की आवाज़ सुनती आयी थी। 

घर की , रिश्तों की, जिम्मेदारियों की...

"लेकिन अपनी.........कभी नहीं"। l


हर सुबह वही ROUTINE---

चाय, खाना, काम, बच्चों की चिंता.......

और फिर एक हल्की सी थकान 

जो चेहरे पर नहीं दिल में रहती थी.

वो मुस्कुराती रही,

सबको समझाती  रही, सबकी तकलीफों 

को अपने दिल में जगह देती रही।

 

और फिर उसे खुद भी आदत हो गयी

खामोश रहने की

कभी मन में कोई सवाल उठता भी ,

तो वो खुद ही उसे दब देती। 

उसे लगने लगा थी उसकी बातों की कोई ज़रूरत नहीं।   


"लोग कहते थे, "

"तुम स्ट्रांग हो"

पर किसी ने यह कभी नहीं पूछा की स्ट्रांग बनते बनते, वह 

कितनी बार टूटी.

 

उस दिन कुछ अलग था। 

न कोई बड़ा फैसला ,

न कोई लड़ाई ,

बस उसने शीशे में खुद को देखा ,

और पहली बार खुद से पूछा--

"तू  ठीक है ना"?


आंखे भर आई। 

"शब्द नहीं थे, पर एहसास बहुत थे"। 

वह बैठ गई। 

रोई नहीं। ..

बस साँस ली। 


उसी पल उसने तय किया ---

अब वह हर बात पर चुप नहीं रहेगी। 

हर दर्द को आदत नहीं बनाएगी। 

और खुद को आखरी नंबर पर रखना,

 "अब बंद करेगी"

वो आवाज़ जो सालो से

उसके भीतर कही छुपी हुई थी। 


वो कह रही थी---

"तुम्हे भी हक़ है महसूस करने का....

तुम्हे भी हक़ है अपनी बात कहने का ".

उसने पहली बार 

अपने दिल की बात को 

चुप करने की कोशिश नहीं की। 

उसने उसे सुना। ....

समझा। ....

और स्वीकार किया। 


उस दिन दुनिया नहीं बदली। 

लोग भी वही  रहे,

पर वह बदल गयी। 


क्युकी जिस दिन कोई इंसान

 खुद को सुन लेता है

.

उसी दिन से उसकी नयी शुरुआत होती है....

चल ऐ ज़िन्दगी। .. 

अब नया दौर ज़िन्दगी का तय कर  आते है    


सन्देश: खुद को सुनना selfish   नहीं होता , self - awareness

ज़रूरी होता है। 


शुक्रवार, 6 मार्च 2026

महिला दिवस -----नारी जाति का सम्मान करने से बनता है ---उज्जवल समाज

महिला दिवस -----नारी जाति का सम्मान----उज्जवल समाज

संसार में महिला दिवस एक दिन नहीं, 

बल्कि नारी के सम्मान के योगदान को याद करने का अवसर है,

महिलाये परिवार,समाज और देश की शक्ति का  आधार है

सिर्फ सशक्त नहीं........ सम्मानित भी....

"सम्मान " ज़रूरी है। 

सिर्फ शब्दों से नहीं,

 व्यवहार में। 

पिता- माता को ,

भाई- बहन को,-

 पति- पत्नी को

देवर -भाभी को

"सम्मान देंग, तो नींव मजबूत होंगी "

आज का समाज तेज है। 

डिजिटल है।

 दिखावे से भरा हुआ है। 

"SOCIAL MEDIA "ने हमे आवाज़ दी है। 

पर उसी के साथ निर्णय लेने की जल्दी देदी। 

आज एक लड़की  ,उसकी सोच से पहले जज की जाती है। 

उसकी मुस्कान को गलत  समझ लिया जाता है। 

उसकी चुप्पी  को कमजोरी मान लिया जाता है। 

ये सिर्फ महिलाओ की समस्या नहीं है। 

ये सोच की समस्या है।

       कहते है ---"नज़र को बदल लो नज़ारे बदल जायेंगे ,

                         सोच को बदल लो सितारे बदल जायेंगे"  

बचपन बदल गया है। 

बच्चे अब कहानियों से कम स्क्रीन से ज्यादा सीखते है। 

रिश्तों की समझ , रील्स की लम्बाई जितनी छोटी  गयी है। 

और इसलिए सम्मान धीरे धीरे optional होता जा रहा है। 

यही चिंता का विषय है। 

क्योंकि जब समाज की सोच बदलती है। 

तो भविष्य की दिशा भी बदलती है। 


अधूरी जानकारी: भयानक बीमारी 

अगर आज कोई  online content से यह सिख रहा है 

की ताक़त का मतलब दबाब है ,

तो वह रिश्तोंमें संतुलन कैसे समझेगा। 

अगर एक लड़की

 हर वक़्त तुलना और ट्रॉल्लिंग से गुजर रही है,

तो उसका आत्मविश्वास कैसे सुरक्षित रहेगा? 

हम एक ऐसे दौर में है जहा "नारी  सशक्तिकरण" की बाते बहुत है,
 पर सम्मान देने की आदत कम है। 
और बिना सम्मान के कोई भी सशक्तिकरण अधूरा है। 
"
"INTERNATIONAL WOMEN'S DAY" 
सिर्फ महिलाओ को strong कह देने का दिन नहीं है। 
यह दिन है यह सोचने का --
"क्या हम अपने घरो में सम्मान देना सीखा रहे है."?
"क्या हम अपने बेटों को सवेदनशील बनना सीखा रहे है?
क्या हम अपनी बेटियों को डर के नहीं, विश्वास के साथ जीना सीखा रहे है।
 
समाज स्त्री और पुरुष दोनों से बनता है। 
अगर एक असुरक्षित होगा,
 तो दूसरा भी स्थिर नहीं रह पायेगा। 
पुरुष को भी एक तय ढांचे में कैद कर दिया गया है। 
मत रो"
हमेशा "मज़बूत बने रहो"
"कमजोरी मत दिखाओ"

और महिलाओ से कहा गया 
"ज्यादा मत बोलो"   ...."ज्यादा आगे मत बढ़ो "। 
"ज्यादा मत दिखो"

दोनों पर दबाब है। 
दोनों पर अपेक्षाएं है। 
फिर भी हम एक दूसरे को दोष देते रहते है। 
असल में ज़रूरत दोष की नहीं दिशा की है। 

social मीडिया बुरा नहीं है। 
पर बिना समझ के उपयोग खतरनाक है। 
अगर बच्चे ,वायरल को सफलता समझेंगे ,
तो मूल्य पीछे छूट जायेंगें। 

अगर LIKES  से आत्मसमान बढ़ेगा तो रिश्ते कमजोर पड़ेंगे। 
इसलिए आज ज़रूरत है डिजिटल साक्षरता की। 
 डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा ज़रूरी है। .ये हम आने वाले  ब्लॉग में विचार करेंगे .

"आज अपनी जननी को प्रणाम ,और पूरी महिला वर्ग को सम्मान देना ही एक ऊँची सोच को व्यक्त करता हैं 
आओ बात करे..... उस सोच पर  जो "महिलाओं को सम्मान का एहसास सिर्फ शब्दों में नहीं व्यवहार में भी करवाएं ".......

और सिर्फ आज नहीं हर पल ,हर कदम पर.... महिला सशक्त तो  समाज सशक्त 
        " HAPPY INTERNATIONAL WOMEN'S DAY"

बुधवार, 4 मार्च 2026

होली...रंग....तरंग .....उमंग ......



 होली .....

होली में रंग,

रंग में तरंग,

तरंग में उमंग ,

        उमंग तेरे प्यार की ,

         प्यार की फुहार की,

          फुहार है बहार की ,

           बहार इंतज़ार की ,

इंतज़ार उस पल का,

पल में इकरार का,

इकरार दिल-ए -यार का,

यार के एतबार का। 

              ऐतबार की बात में,

              बात की हर सांस में,

              सांस के हर राग में,

               राग की मिठास में,.

मिठास मुस्कान की,

मुस्कान अरमान की,

अरमान उड़ान की,

उड़ान आसमान की,

                 आसमान नीला है,

                 नीली तो पतंग है,

                 पतंग संग डोर है,

                 डोर है हवाओं में

हवा में तेरा  नशा  ,

नशे की वो घडी,

घडी जो ठहरी ज़रा ,

                ठहरी सी वो नज़र ,

                 नज़र में  तेरा असर ,

                  असर से भीगा मन ,

                   मन मेंयाम रँग।

श्याम रंग जो चढ़ गया ,

दुनिया से तर गया ,

तर के वो किधर गया,

किधर का  ही सवाल है,

सवाल बेमिसाल है,

                    बेमिसाल जोश  है                 

                     जोश मदहोश है,

                       मदहोश सी वो चाल है,,

                     चाल मस्तानी है,

मस्तानी ,जवानी है,

जवानी की कहानी है,

 कहानी तो पुरानी  है 

पुरानी  बात छोड़ दो ,

            छोड़ना तो स्वार्थ है,

           स्वार्थ का क्या अर्थ है,

           अर्थ तो व्यर्थ है,

          व्यर्थ ही समर्थ है,

समर्थ ही तो होना है ,

होना तो विश्वास है,

विश्वास रब के साथ है,

रब ही तो अंदर है,

          अंदर एक समंदर है,

          समंदर में तो पानी है ,,

           पानी में रवानी है, 

रवानी " वह क्या बात है 

बात तो एक बोली है 

बोली तो बस" होली है "

"होली रे होली "


प्यार भरी ,सम्मान भरी ,विश्वास भरी। ..रंग भरी। ............



बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

माँ केआँगन की होली के रंग.... गुजिया की खुश्बू के संग

 होली.... मेरे बचपन की....

माँ रंगो की एक थाली बनाती थी। 

कभी कभी घर में रंग नहीं होते थे ,

तो भी माँ को कोई शिकायत नहीं होती थी। 


वो हल्दी निकलती

कुमकुम रखती,

और मुस्कुरा कर कहती---

"यही रंग हैं। ... 

इन्ही से होली  मना लो।"


और हमें सच में वो हल्दी धूप 

जैसे खिली पीले  पीले रंगों सी लगती थी। 

कुमकुम लाल गुलाल सा माँ की ममता जैसा लगता था। 


रंग कम थे, पर माँ की आँखों में पूरी होली चमकती थी। 

पास ही एक दूसरी थाली होती थी----

जिस में गुजिया 

लबालब भरी होती थी।  

गरम खुशबूदार , जैसे माँ के कड़ाई

  से अभी अभी निकली हो,


वो माँ के किचन की गुजिया थी....

जिस का स्वाद आज भी

 किसी हलवाई की दुकान में नहीं मिलता। 


और मज़े की बात ये थी ---

माँ सिर्फ गुजिया बनाना नहीं,

 चोरी करना भी सीखा जाती थी। 

कहती "अभी मत खाना"

और फिर जान बुझ कर 

पीठ फेर लेती। 


हम एक दूसरे को देखते,

आँखों ही आँखों में हसंते ,

और एक गरम गुजिया 

चुपचाप उठा लेते। 


माँ देख भी लेती थी,

 पर डांटती नहीं थी। 

बस हल्की सी मुस्कान

 होठों पर आ जाती थी---

जैसे कह रही हो,

"होली है..

आज शरारत माफ़ है। 


"आज सोचती हू"माँ ने

 हम को रंगो से ज्यादा, खुश रहना सिखाया। 

और गुजिया से ज्यादा पल चुराना। 


श ायद इसलिए आज भी जब  होली आती है। 

तो दिल रंग ढूंढ़ता नहीं,

सीधे माँ के आँगन में चला आता है। 


क्यों कि वहाँ होली 

सब से ज्यादा अपनी लगती थी। 

माँ के आँगन की होली कुछ अलग ही होती थी। 

वह रंग ज्यादा गहरे नहीं होते थे,

पर एहसास बहुत पक्के होते थे। 

 

सुबह की धुप आँगन में ऐसे उतरती थी। 

जैसे हर कोने को चुपचाप 

आशीर्वाद दे रही हो,

माँ तुलसी के पास खड़ी हो,

 कर मुस्कुरा देती थी---

और लगता था , जैसे कह रही हो ......

"आज का दिन अपने -आप अच्छा हो जायेगा "

 होली के रंग हो न हो,

 प्यार के रंगो से भरी ही लगती है। 

"पलकों की नमी माँ की यादों को ऐसे ही सहेज लेती  है "

तो  चलो रंगो को ,गुजिया की खुश्बू से भर 
हम आज अपने बच्चों के लिए ऐसा आँगन तैयार  करे 
ताकि
  हमारे बच्चे  भी  माँ का  आँगन ऐसे ही याद रखें। ..
जैसे हम अपनी माँ का का याद रखते है। 

क्यों सही कहा ना......"होली रे..... .होली" 

"हैप्पी होली".....

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

इस होली रंग बदले: गुलाल के साथ , रिश्तों में सम्मान और प्यार के रंग

 

होली है....

तो रंग तो होना ही चाहिए। 

पर दोस्तों, इस बार रंगों को

 थोड़ा सा बदल कर देखें।


हरा ,नारंगी, लाल, गुलाल के साथ

क्यों न  

कुछ प्यार भरे शब्दों की होली खेली  जाये। 


क्योकि चेहरों को सुर्ख लाल करना,

 सिर्फ रंगों से ज़रूरी नहीं ,

कभी कभी दो मीठे शब्द भी

 वो रंग चढ़ा जाते है.

जो दिनों तक नहीं उतरता। 


इस होली 

माता पिता के दुलार के रंग हों,

भाई बेहन के विश्वास के रंग हो,

पति-पत्नी के प्यार और सम्मान के रंग हो,

और हर रिश्ते में 

व्यवहार के रंग  भर दिए जाये 


क्योंकि 

रंग अगर रिश्तों में उतर जाएँ 

तो ज़िंदगी खुद त्यौहार बन जाती है। 


होली सिर्फ, शोर, भीड़, और दिखावे का नाम नहीं ,

होली तो वो मौका है,

जब हम अपनी कड़वाहट, शिकायतें 

और मन की गांठें 

धो डालते है। 


इस बार अगर कोई पास नहीं,

तो दूर बैठे किसी अपने को 

बस एक सन्देश भेज दीजिये----

"याद हो....तुम "


यकींन  मानिये,

 वो रंग 

किसी भी गुलाल से ज्यादा 

गहरा होगा। 


होली है.....

तो आओ इस बार 

रंगों की नहीं,

रिश्तों की होली खेलें 

प्यार की होली खेलें 

सम्मान की होली खेलें 


हैप्पी होली। .....

आओ बात करे... के सभी पाठकों को बहुत सम्मान और प्यार से होली की शुभकामनाएं 

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

ख़ामोशी के दर्द----कुछ अपने, कुछ अपनों के ... दिल को छू लेने वाली सच्चाई

CHAPTER-4

 और वो चली गयी......

वो ज्यादा बोलती नहीं थी 

बस सब सुन लेती थी 

घर के शोर में उसकी आवाज़ कभी ऊपर नहीं आयी 

बच्चों की पढ़ाई 

घर की जिम्मेदारियां 

और रिश्तों के बीच वो खुद को कही रख ही नहीं पाई ....


लोग कहते थे वो strong  

पर STRONG का मतलब ये नहीं होता  

कि दर्द महसूस ही न हो...... 

वो रोज़ थक कर भी मुस्कुरातीं रही 

अपनी परेशानियों को बाद में

 देख लेंगे कह कर टालती रही 


किसी ने नहीं पूछा......

उसका दिन केसा गया...... 

किसी ने नहीं देखा 

 कब उसकी आँखों की चमक धीरे धीरे बुझने लगी 


और फिर एक दिन ---

सब कुछ नार्मल। ..

सुबह भी हुई...

 शाम भी आयी 


लेकिन बस एक चीज़ बदल गयी 

वो फिर किसी को नज़र नहीं आयी....

वो चली गयी..( दुनिया से ) 

लोग हैरान थे 

उसने कुछ कहा "क्यों नहीं ?"

किसी को बताया क्यों नहीं 


लेकिन वो बताती किसे। .....सब तो  अपने थे,

वो अपने "क्या सुनते  भी है"?...ये तो उसे पता ही नहीं था 

ये वो अपने थे..... 

जो कुछ बोलने पर खुद ही जज बन जाते थे 


इसलिए जब भी उसने बोला 

 "अरे कभी तो समझा करो"  कहा गया 

जब भी रोई उसे  स्ट्रांग बनो समझाया गया 

 वो दुनिया से नहीं.......

 चुप रहने की आदत से हारी थी 

और उसके जाने के बाद 

घर में सब कुछ था..... पर सुकून नहीं.......


हम एक औरत को उसके फ़र्ज़ हमेशा याद दिलाते रहते हैं 

लेकिन खुद अपनी ड्यूटी जो उस के प्रति वो हम कभी याद भी रखना नहीं चाहते ,

हम किस तरह का समाज बना रहे है 

शायद रिश्ते उतने परिपक्व नहीं रहे ,पर अपने घर के प्रति ,समाज के प्रति ,हमे कुछ तो खुद को जिम्मेदारी लेने के योग्य बनाना होगा ......

कम से कम खुद से तो बात करनी ही होगी। ."तो आओ बात करें "........




  


रविवार, 15 फ़रवरी 2026

मासूम सी ख़्वाहिश ...माँ का आँगन ,और वो नन्ही चिड़िया

 अरे नन्ही चिड़िया,

कभी मेरे  आँगन में भी आया कर। ..

कभी कुछ अपनी सुना , 

कभी मेरी सुन् जाया कर। ....ऐ नन्ही चिड़िया...


 किसी को  फुर्सत नहीं ,

यहाँ बात करने की। .

इसलिए बस नन्हे नन्हे पंखो से..

 आँगन में उतर आया। .....

ऐ नन्ही चिड़िया .........

कभी मेरे आँगन में भी आया कर। ...


कभी धुप की गर्मी,

कभी छाँव की ठंडक 

कभी बारिश की बूंदो से थक कर 

बस मेरे आँगन में बैठ जाया कर .. ..

ऐ नन्ही चिड़िया। ..

कभी मेरे आँगन में भी आया कर ...


फिर हम दोनों फुर्सत से ,

अपनी अपनी कह लेंगे। ..

तू भी ची ची कर  लेना , 

 पल भर  फिर यु ही रह लेंगे।। 

फिर पंखो को फैला कर....

 अपने आसमान में उड़ जाया कर ,

ऐ नन्ही चिड़िया। .. 

कभी मेरे आँगन में भी आया कर....

 ..

उस बचपन के आँगन में...

 तू आज भी उड़ कर  जाती होगी। ..

माँ होती थी जिस आँगन में,

 तू वहाँ  से दाना लाती होगी 

अपने पंखो में छुपा मुझे भी 

माँ के आँगन में घुमाया कर..

.ऐ  नन्ही चिड़िया। ...

कभी मेरे आँगन में भी आया कर....

 

उस घर की सोंधी सी मिटटी
 
आज भी मन को महकती है ,

भाई बहन  के प्यार की खुशबू 
माँ-बापू की याद दिला जाती है 
बस  उनकी यादों को लेकर 
तू प्यार के गीत सुनाया कर 
ऐ नन्ही चिड़िया। ..
कभी मेरे आँगन में भी आया कर
 
अगर ये पंक्तियाँ आप के मन के किसी कोने को छू जाएँ ,
तो समझिये,--- चिड़िया सही आँगन  तक पहुंच गई। 

शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

आओ बात करे :शिवरात्रि और मन के अँधेरे की

 शिवरात्रि पर स्पेशल 

"हे भोले बाबा, मेरे भोले नाथ , 

तीनो लोक में  तू ही तू."..

 जब दुनिया के शोर में मन अपनी आवाज़ खो देता है,

तब शिव का नाम ही है जो हमे वापस खुद से मिलता है। 


शिवरात्रि सिर्फ एक त्यहार नहीं,

ये एक अंतर-यात्रा है---

जहा हम अपनी कमज़ोरी, अपना दर्द, अपनी थकान 

भोले नाथ के चरणों में अर्पण कर  देते है।

जब शिव के साथ माँ पार्वती  होती है तो  भक्ति में शक्ति और शक्ति में 

करुणा जुड़ जाती है 


शिव का अर्थ: विनाश नहीं निर्माण है 

अक्सर लोग शिव को विनाश का देवता  कहते हैं,पर सच ये है,

 शिव विनाश नहीं परिवर्तन  है। 


जो गलत है उसे तोडना ,जो सच है उसे बचाना, 

ये शिव का स्वरुप है :-

शिव:" वो शून्य है जहाँ से सब शुरू होता है.

और वो स्थिरता है जहा सब ठहर जाता है,"


जब जीवन में सब कुछ उलझा हुआ लगता है 

तब शिव हमे सिखाते है -

सब कुछ पकड़ने से नहीं , बल्कि छोड़ने से मिलता है। 

माँ  पार्वती : शक्ति जो संभाल लेती है 


अगर शिव तपस्या है

 तो पार्वती  समर्पण है ,

माँ पार्वती  सिर्फ पत्नी नहीं है 

वो जीवन की साथी शक्ति है 


जब शिव ने विष पिया,

तो माँ   पार्वती दर्द को समझा,

जब शिव शून्य में चले गए 

तो माँ पार्वती  ने संसार को संभाला 


ये ही सच है--

"शक्ति बिना शिव दिशाहीं है और शिव बिना शक्ति अधूरी "

शिव और पार्वती के सम्बन्ध सिर्फ प्रेम के नहीं ,

संतुलन का प्रतीक  हैं 


शिव : वैराग्य 

पार्वती : संसार 

शिव :ध्यान 

पार्वती: जीवन 

शिव :शांति 

पार्वती :साहस 

इसी संतुलन से ही परिवार , समाज और जीवन  चलता है .


आज के जीवन में रिश्तों में जब सिर्फ शर्ते होती जा रही है 

शिव पार्वती हमे याद दिलाते है--

साथ होना मतलब साथ जीना नहीं ,

सब संभालना भी होता है--


शिवरात्रि : रात जो रोशन बन जाये 

शिवरात्रि वो रात है जब अँधेरा भी पूछता है--

"अब मुझे कब ख़तम होना है".?

इस रात हम जागते  नहीं 

हम जागरूक होते है 


अपनी गलतियों को देखते है 

अपनी कमियों को स्वीकार करते है 

और एक नयी शुरआत की प्रतिज्ञा लेते है 


शिवरात्रि का उपवास भूख का नहीं अहंकार का त्याग है 

सब कुछ शिव के चरणों में रख देते है 


आओ  बात करे इस शिवरात्रि उस शिव की जिन का

नाम ही विशेष है  नमः शिवाय का अर्थ

ॐ नमः शिवाय 

ये सिर्फ एक मन्त्र नहीं 

ये एक स्वीकृति है 

का अर्थ है ब्रह्माण्ड 

नमः -में झुकता हूँ 

शिवाय : सच के सामने 

इसका अर्थ है ;-

"मैं अपनी झूटी पहचान छोड़ कर अपने  सच के सामने झुकता हूँ। 


जब मन भारी हो,

जब शब्द कम पड़ जाये तब बस इतना कह देना काफी होता है 

ॐ  नमः शिवाय

आज के जीवन में शिव तत्व 

आज का इंसान बिना मेहनत  के सब कुछ चाहता है 

 जल्दी मिल जाये ,और इस सब में शांति भूल गया है 


शिव हमें सिखाते है 

कम में संतोष 

शून्य में शक्ति 

मौन में उत्तर 


और माँ पार्वती  हमे याद दिलाती है 

जिम्मेदारी से भागना  नहीं, दर्द  को दबाना नहीं

 और प्रेम कमजोरी नहीं ...


शिव शक्ति : दोनों मिलकर जीवन को संतुलित  और सार्थक  बनाते है 

ॐ  नमः शिवाय

ॐ  नमः शिवाय
ॐ  नमः शिवाय........

शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

वो चुप थी...ख़ामोशी में छुपी भावनाओं की कहानी


CHAPTER --3

वो चुप थी....

इसलिए नहीं ..

कि उसके पास..

 कहने को कुछ नहीं था,

बल्कि इसलिए 

कि उसने बहुत कुछ कह कर  देख लिया 

उसकी चुप्पी ....


कमजोरी नहीं थी

वो उन जज्बातो का बोझ थी 

जो हर बार 

"सब ठीक है"

कह कर दबा दिए जाते है 


वो औरत थी---

जिसे खुश रहना सिखाया गया ,

पर खुश होना नहीं। 


उसे प्यार मिला,

पर शर्तों के साथ। 

इज्जत मिली,

पर चुप रहने की कीमत पर 

अपनापन मिला पर,

 अपनी पहचान छोड़ने के बाद। 


वो हंसती थी 

ताकि घर का माहौल हल्का रहे 

वो सहती थी। 

ताकि रिश्ते ,

भारी  न हो जाये। 


किसी ने नहीं देखा 

उस ख़ामोशी के पीछे 

कितनी बार,

 उसका दिल टुटा था। 


कितनी बार

 वो बस इतना चाहती थी

 बस कोई पूछ ले ---

"तुम सच में ठीक है ?"


उसकी चुप्पी में 

शिकायते नहीं थी ,

बस उम्मीदें थीं। 

उम्मीद, कि कभी तो 

उसके जज्बात 

बिना बोले समझे जायेंगे। 


वो प्यार चाहती थी---

मुस्कान वाली नहीं,

सुकून वाली। 


पर जब हर बार 

उसकी भावनाओं को 

"ज़्यादा सोचना"

कह कर  ताल दिया गया 


तो उसने बोलना छोड़ दिया। 

कहना छोड़ दिया


और उस दिन जब वो सच में चुप हो गई ,

लोगो ने कहा--

" आज कल वो बदल गयी है"


 हाँ  ...

वो बदल गयी थी 

और वो सब के लिए नहीं,

खुद के लिए जीना सीख रही थी . 


MORAL....

औरत की चुप्पी को 

उसकी सहमति मत समझिये 

कभी कभी 

खामोशी 

सब से ऊँची चीख़ होती है.


 






शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2026

ख़ामोशी जब जब बोलने लगती है

***CHAPTER--2

आओ बात करे....

उन बातों की,
जो हर रोज़
 होठों तक आ कर ,
फिर भीतर ही कही गिर जाती है।

क्यों कि हर कोई बोलना चाहता है, 
पर सुनना ......
सुनना  किसी को नहीं आता। 

हम ने भी कोशिश की थी,,
समझने की,जताने  की,
खुद को सही ठहराने की ,
पर हर बार शब्द 
किसी दीवार से टकरा कर 
लौट आये। 

तभी हम ने चुप रहना सिख लिया। 
चुप्पी आसान लगती है।
क्यों की उसमें सवाल नहीं होते,
जवाब नहीं देने पड़ते। 
पर ये चुप्पी। ....
 धीरे धीरे बोझ बन जाती है।
 
और एक दिन। .....
 यही ख़ामोशी बोलने लगती है। 

सीने में अजीब-सी  घुटन , 
आँखों में बिना नाम का दर्द,
और दिल में 
बिन बोले शब्दों की भीड़। 

वो लम्हा डरावना होता है ,
जब इंसान 
खुद से भी बात करना छोड़ दे। 

इससे पहले की
ख़ामोशी चिल्लाने लगे ,
इससे पहले
 की अंदर का शोर
हमें  तोड़ दे----

आओ बात करे.. ..बस बात। .....
किसी और से नहीं
बस खुद से। 

बिना शर्म,
बिना डर ,
बिना ये सोचे कि 
कोन  क्या कहेगा। 

बस बात......
दिल की ,
सच की,
और उस इंसान की 
जो अब तक
 सब के लिए मज़बूत बना रहा। 

आओ.... बात करें। .....
क्योकि .... 
कभी कभी बात करना ही इलाज होता है। 

तो  अब आप क्या सोच रहें ?????

करेंगे ना बात। .......




  

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

आओ बात करे... chapter -1 ....खुद को मज़बूत कर के जीवन को संभालना

 CHAPTER --1🍃🌠🌠🌠

आओ बात करे... बस बात...

 

आओ बात करे.....

आज किसी और से नहीं।।।

खुद से। ...


क्युकी अक्सर हम सबसे बातें करते है

 पर अपने भीतर  JO CHAL रहा होता है,

 उसे सुनने का वक़्त नहीं निकलते,....


ज़िन्दगी हमे मजबूत दिखना सीखा देती है 

मुस्कुराते रहना ,

सब संभाल लेना,

और "I AM OK" कह देना।।।। 

ये सब आदत बन जाता है..

पर सच ये है कि 

हर मजबूती के पीछे 

एक थकी हुई AWAAZ  होती है 

जो बस इतना कहना चाहती है..


थोड़ा रुक जाओ। ....

आओ बात करे... बस बात...


उन लम्हो की,

जहा हम टूटे थे ,

पर कह नहीं पाए  

   उन सवालों   की ,

 जिन के जवाब कभी  मिल ही नही  पाए.


और उन ख्वाहिशों की ,

जो "जिम्मेदारियों" के निचे 

कही दब सी गयी


आओ बात करे... बस बात..

तो ..आओ...बात करे......

कभी कभी लगता है

 ज़िन्दगी हम से आगे निकल गयी है 

पर सच ये है की 

हम ही खुद से पीछे छूट गए है ,


आज कोई फैसला नहीं करना। 

आज कुछ साबित नहीं करना 

बस इतना सा सहस काफी है 

कि खुद से आँख मिला कर कह सके--

"मैं यहाँ हूँ"----


अगर आज भी दिल में

 हलकी सी कसक है ,

तो यकीं मानों ---

वो कमजोरी नहीं 

"ज़िंदा होने का साबुत है "


तो चलो ....🌠

आज की बात को यही विराम देते है.....

क्युकी हर गहरी बातचीत 

एक छोटे से वाक्य से शुरू होती है ---


तो ..आओ...बात करे......👥

 

बुधवार, 28 जनवरी 2026

जब मैं छोटी थी --मासूमियत से समझदारी तक का सफर

और जब मैं  छोटी थी.......
            
       एक सफर मासूमियत से समझदारी तक

 और जब मैं   बहुत छोटी थी 
ज़िन्दगी बहुत साधारण सी ही थी...
ख़ुशी का मतलब सिर्फ इतना होता था कि 

माँ की गोद , पिताजी की उगंली 
और शाम को गली में अपने दोस्तों के साथ खेलना।

बस ......हम्म्म 
मुझे याद है 
जब छोटीसी  बात पर दिल भर आता था
 ख़ुशी में बिना मतलब के हंस पड़ती थी 
न फ्यूचर का बोझ था
 न ही लोगों की सोच का डर

सपने तब भी थे। ... पर मासूम थे 

मैं  जब छोटी थी सपने बहुत बड़े nahi थे 
बस इतना चाहती  थी की
सब हमेशा साथ रहे 
किसी को खोने का ख्याल भी डरा
पर लगता था ऐसा होता ही नहीं है  

तब मुझे नहीं पता था 
कि ज़िन्दगी सिर्फ स्कूल और खेल का नाम नहीं 
ये इम्तहान भी लेती है 

फिर धीरे धीरे मैं  बड़ी होने लगी 

और जैसे जैसे  बड़ी हुई 
ज़िन्दगी ने रंग बदलने शुरू कर दिए 
लोग जो पहले अपने लगते थे,
उनका रैवैया बदलने लगा 

मैं सीखने लगी ---
चुप रहना ,
समझना ,
और खुद को संभालना |
मुझे पहली बार एहसास हुआ,
की हर आंसू दिख ाने के लिए नहीं होते 
और हर दर्द बत ाया भी नहीं जा सकता 

और जब मैं  छोटी थी ---मैं सिर्फ महसूस करती थी
 
आज मैं  समझती हूँ ,
आज मुझे पता है हर कोई साथ नहीं देता. 
लेकिन खुद का साथ सब से ज़रूरी होता है . 

ज़िन्दगी ने मुझे टूटना भी सिखाया 
और खुद को जोड़ना  भी ,

आज जब मैं पीछे मुड़ कर देखती हूँ  
तो  उस छोटी सी लड़की को गले लगाने का मन करता है .

उससे कहना चाहती  हूँ। ...
बचपन तो सब का मासूम होता है...
 वो मासूमियत ही तो बचपन है 
"तू कमजोर नहीं थी 
बस, तुझे ज़िन्दगी का पता नहीं था "

आज अगर मैं  स्ट्रांग हूँ ......
 सिर्फ इसलिए क्यूंकि 
मैंने हर दर्द से कुछ सीखा 


 हम्म्म बहुत कुछ ......

ज़िन्दगी जीने केलिए 
ज़िन्दगी से भागने के लिए नहीं। ....

पर अच्छा लग रहा है। ..
ऐसा लग रहा है ,
एक नयी इंसान बन रही हूँ 


क्या आपको भी ऐसा लग रहा है.?
तो चलो कुछ किया जाये ,
एक नयी सोच के साथ 
उन पलों  को जिया जाये .
 
 
चलो फिर आज बड़े हो जाये। .....कुछ बड़पन के साथ भी जीया  जाये
 

धन्यवाद। ........

सोमवार, 19 जनवरी 2026

मुस्कराहट .......एक ख़ुशी

एक मुस्कान खुद के लिए । ....


ज़िंदगी भर दूसरों के लिए हर वक़्त जीके देख लिया। 

अपनी हद्द में रह कर भी 

हद से गुजर कर देख लिया।


न वो खुश  हुए ,

ना  कभी शुक्रगुजार हुए। 

और शायद  अब ये सवाल भी बेकार है। 

 गलती कहा रह गई। 

इसलिए अब....

अब खुद  से  समझौता  नहीं   होगा। 

 अब अपनी चुप्पी को  आदत नहीं बनने दूँगी। 

हर बार की तरह खुद को आखरी नंबर पर नहीं रखूँगी। 

बस खुश रहूँगी। .....


दुसरो को खुश करते करते 

अगर  खुद ही टूट जाएँ , 

तो  इसे त्याग नहीं  ,

खुद को खो देना कहते है...


खुद के लिए भी कुछ

 पलों को जी लिया  जाये,

एक मुस्कान...... खुद को, 

भी दे कर जी लिया जाये। 


जो किया, जिन के लिए किया 

वो सब अपने है  

कोई पराये नहीं  

फिर भी कोई बढ़ाई  नहीं। ..


कभी तो  कुछ ख़ुशी 

दूसरों से भी महसूस हो 

 कुछ अपने करने की। .............. ?


अब सब कुछ नहीं बदलूंगी , 

पर इतना ज़रूर बदलूँगी। ..... 

कोई एहमियत दे या न दे। .

मैं  खुद को एहमियत ज़रूर दूँगी। 

  

न किसी को परेशान करने की इत्छा 

न खुद परेशान होना है। 


आज से ,

एक मुस्कान। ....

खुद के लिए। 


 


शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

"एक नयी शुरुआत.... चल ऐ ज़िन्दगी, फिर से जीते है..."


🍃एक नयी  शुरुआत... चल फिर से जीते हैं 

                        "ऐ ज़िन्दगी"

कुछ कहानियां शोर मचा कर नहीं आती... 

वो चुपचाप ज़िन्दगी के किसी कोने में जनम लेती है 

और धीरे धीरे हमे और मज़बूत बना देती है. 


एक नयी शुरुआत करने का मन है.

फिर से कुछ  एहसासो, कुछ नए विचारों को साथ ले कर, 

खुद को स्ट्रांग बनाने की कोशिश कर रहीं हूँ। 


जाने क्यों... 

शयद इसलिए, क्यूंकि रुक-- रुक कर,

 जीना खुद को थका देता है। 


या ....फिर इसलिए ,क्यूंकि अब हार मान लेना, 

दिल को मंजूर नहीं होता। 

बहुत बार लगा, की बस यही रुक जाऊ । 

पर हर बार ज़िन्दगी ने मुझे आगे बढ़ना सिखाया। 


ज़िन्दगी चलने का नाम है। 

रुकना तो  फिर वैकुंठ धाम है। 

यह बात समझ आते ही ,

अंदर कहीं कुछ बदलने लगता है। 


दिल से एक आवाज़ उठती है---

"चल ऐ ज़िन्दगी... 

आज एक बार खुलकर 

फिर से जीते है"। 


ना  पूरी तैयारी  के साथ,

 न ही हर जवाब हाथ में लेकर 

बस इतनी सी हिम्मत के साथ 

की जो भी सामने आये ,

उसका सामना मुस्कुरा कर किया जाये। 


बस अब यही जीना है। 

और शायद... यही 

"मेरी  नयी और सही शुरुआत"। .......