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"आओ बात करें… बस बात: मेरी नन्ही परी से शुरू हुई एक प्यारी सी कहानी "

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                " मेरी नन्ही परी से शुरू हुई एक प्यारी सी कहानी " CHAPTER – 4 आओ… बात करें… बस बात… हाँ… आपसे ही कह रही हूँ… आइए… ज़रा बैठिए… कोई जल्दी नहीं है… दुनिया थोड़ी देर इंतज़ार कर सकती है… बस कुछ लम्हे हैं… जो हम रोज़ महसूस तो करते हैं… पर कह नहीं पाते… (आओ… बात करें… बस बात…) ये लफ़्ज़… कहीं से उठाए हुए नहीं हैं मैंने… ये शब्द तो… मेरी ज़िंदगी के सबसे सच्चे हिस्से से निकले हैं… जब मेरी बेटी सिर्फ़ दो साल की थी… वो मेरी उँगली पकड़कर मुझे अपने पास बैठा लेती थी… और अपनी छोटी सी आवाज़ में कहती— “मम्मी… आओ ना… बात करें…” और सच कहूँ… उस एक आवाज़ में ऐसा जादू था… कि मैं दुनिया के सारे काम छोड़कर बस उसके पास बैठ जाती थी… न उसे कोई कहानी चाहिए होती थी… न कोई खिलौना… न कोई जवाब… उसे बस… मेरा साथ चाहिए था… एक ऐसा साथ… जहाँ शब्द कम हों… पर अपनापन पूरा हो… जहाँ समझाने की ज़रूरत न पड़े… बस महसूस हो जाए… शायद… रिश्तों की असली ज़रूरत भी यही है… कोई जो बस “हो”… बिना शर्त… बिना वजह… बच्चों को वक्त देना… सिर्फ़ ज़िम्मेदारी नहीं है… ये वो मौका है… जहाँ हम अ...

" मुसाफ़िर ...ज़िन्दगी भी बड़ी दिलचस्प चीज़ है।क्यों ?"

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  ऐ मुसाफ़िर… ज़रा खुद से पूछ कौन खुश है तुझसे… और तुझे किसको खुश करना है? ज़िन्दगी की इस धारा में तुझे आखिर अकेले ही उतरना है। भीड़ बहुत मिलेगी रास्तों में, सलाहों की दुकानें भी सजी होंगी। हर मोड़ पर कोई न कोई तुझे सही रास्ता बताने को खड़ा होगा। और मज़े की बात यह है कि उनमें से आधे लोग खुद ही अपने रास्ते भूलकर आए होंगे। कोई कहेगा— “यह मत करो, लोग क्या कहेंगे?” कोई कहेगा— “ऐसे जीयो, वैसे मत जीओ।” और कोई तो इतना चिंतित होगा तुम्हारी ज़िन्दगी के बारे में, कि तुमसे भी ज़्यादा परेशान दिखाई देगा। पर सच पूछो तो उसे तुम्हारी ज़िन्दगी से नहीं, तुम्हारे फैसलों से समस्या होती है। ज़िन्दगी भी बड़ी दिलचस्प चीज़ है। जब हम छोटे होते हैं तो लोग कहते हैं— “बेटा पढ़ लो, ज़िन्दगी बन जाएगी।” जब पढ़ लेते हैं तो कहते हैं— “अब नौकरी करो, ज़िन्दगी बन जाएगी।” जब नौकरी कर लेते हैं तो कहते हैं— “अब शादी कर लो, ज़िन्दगी बन जाएगी।” और जब शादी हो जाती है तो वही लोग पूछते हैं— “इतने परेशान क्यों रहते हो?” सच में… कभी-कभी लगता है ज़िन्दगी से ज़्यादा लोगों की उम्मीदें थका...

आओ बात करे---चकमक पत्थर से कृत्रिम बुद्धिमत्ता(AI ) तक

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आओ बात करें — सोच बदलने से क्या बदलेगा? chapter --6   आजकल हम अक्सर एक वाक्य सुनते हैं— “सोच बदलो, समाज बदलेगा।” यह बात सुनने में अच्छी लगती है, लेकिन कभी-कभी मन में एक सवाल भी उठता है— आख़िर समाज को बदलने की ज़रूरत क्यों है? क्या हमारे माता-पिता और बुजुर्गों की सोच गलत थी? क्या वे कम समझदार थे? उन्होंने वही सिखाया  जो उन्हें सही लगा, क्योंकि उनका उद्देश्य हमेशा हमारा भला ही था।             तो फिर आज हर जगह सोच बदलने की बात क्यों की जा रही है? बदलाव का मतलब विरोध नहीं होता सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि सोच बदलने का मतलब अपने बुजुर्गों को गलत साबित करना नहीं होता। असल में बदलाव का मतलब है— समझ का विस्तार। समय बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं और इंसान के सामने नई चुनौतियाँ आती हैं। ऐसे में सोच का विकसित होना स्वाभाविक है। सोच के विकास को समझने के लिए एक उदाहरण अगर हम पुराने समय को देखें, तो लोग चकमक पत्थर से आग जलाते थे। फिर समय बदला और माचिस का आविष्कार हुआ। इसके बाद लाइटर आया, जिसने आग जलाना और आसान बना दिया। आज के दौर में तो इलेक्ट्रिक उपकरण...

माँ तो बस माँ है...माँ का प्यार: एक एहसास जो शब्दों से परे है

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माँ तो बस माँ है… शब्द छोटा, संसार बड़ा           " HAPPY MOTHER'S DAY" एक एहसास… एहसास है प्यार का, प्यार का दुलार का, दुलार संसार का— क्योंकि संसार ही माँ है… CHAPTER – 5 : माँ… एक शब्द नहीं, एक संसार है माँ सुबह की पहली किरण है, जो खिड़की में नहीं, दिल में उतरती है। माँ एक आवाज़ है— जो नाम लेकर नहीं बुलाती, फिर भी सबसे गहराई तक पहुँच जाती है। माँ वह स्पर्श है— जो माथे पर हाथ रखते ही हर उलझन सुलझा देता है। माँ धूप भी है, छाँव भी है, थकान भी है, आराम भी है। माँ रसोई की खुशबू में घुली हुई दुआ है, दरवाज़े पर टिका इंतज़ार का सब्र है। माँ की आँखों में नींद कम होती है, चिंता ज़्यादा। माँ की थाली में रोटी कम पड़ जाए, पर हमारे हिस्से की कभी कम नहीं होती। माँ की हथेलियों की लकीरों में हमारी किस्मत बसती है, और उसकी झुर्रियों में हमारे बड़े होने की कहानी लिखी होती है। माँ वह ताकत है जो हमारे हिस्से का दर्द छुपाकर हमें हिम्मत देती है। वह दीवार है— जो खुद दरकती है, पर घर को टूटने नहीं देती। वह दीपक है— जो खुद जलता है, पर उजाला हमें देता है। माँ की गोद—दुनिया का सबसे सुरक्ष...

"दूसरों को सुनते सुनते ,एक दिन उसने खुद को सुन लिया"

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उसने खुद को सुन लिया. .. वो हमेशा दूसरों की आवाज़ सुनती आयी थी। घर की, रिश्तों की, जिम्मेदारियों की... "लेकिन अपनी.........कभी नहीं"। हर सुबह वही ROUTINE— चाय, खाना, काम, बच्चों की चिंता....... और फिर एक हल्की सी थकान जो चेहरे पर नहीं, दिल में रहती थी। वो मुस्कुराती रही, सबको समझाती रही, सबकी तकलीफों को अपने दिल में जगह देती रही। कभी किसी ने पूछा नहीं— "तुम कैसी हो?" और उसने भी कभी बताने की कोशिश नहीं की। क्योंकि उसे लगता था— उसकी तकलीफों से किसी को फर्क नहीं पड़ेगा। धीरे-धीरे उसे खुद भी आदत हो गयी खामोश रहने की। कभी मन में कोई सवाल उठता भी, तो वो खुद ही उसे दबा देती। उसे लगने लगा था— उसकी बातों की कोई ज़रूरत नहीं। "लोग कहते थे," "तुम STRONG हो" पर किसी ने यह कभी नहीं पूछा— STRONG बनते-बनते, वह कितनी बार टूटी। कितनी बार उसने अपने आँसू निगले। कितनी बार उसने अपनी खुशी टाल दी। कितनी बार उसने खुद को समझाया— "अभी नहीं… बाद में।" लेकिन वो "बाद में" कभी आया ही नहीं। फिर एक दिन कुछ अलग हुआ। न कोई बड़ा फैसला, न कोई लड़ाई, न कोई तूफान। ब...