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गुरुपूर्णिमा पर विशेष-- " ज्ञान से ज्यादा साहस"

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  गुरुपूर्णिमा पर विशेष —  प्रथमे गुरु को वंदना, द्वितीय महेश प्रणाम। तृतीय माँ मेरी शारदे, पूरन कीजो काज।। वीणा-पुस्तक धारिणी, हंसवाहिनी मात। विद्या-बुद्धि दीजिए, रखिए मेरी लाज।। गुरुपूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि उस अदृश्य प्रकाश को प्रणाम करने का दिन है, जो हमारे भीतर ज्ञान, विश्वास और दिशा का दीपक जलाता है। यह वह दिन है जब हम अपने जीवन में आए हर उस गुरु को याद करते हैं, जिसने हमें केवल पढ़ाया नहीं, बल्कि जीना सिखाया। पहली गुरु :--माँ --पिता   बचपन में माँ पहली गुरु बनकर हमें बोलना सिखाती है। पिता जीवन की जिम्मेदारियाँ समझाते हैं। स्कूल का शिक्षक अक्षरों का संसार खोलता है। फिर समय आगे बढ़ता है और जीवन स्वयं गुरु बन जाता है— कभी किसी असफलता के रूप में, कभी किसी टूटे रिश्ते के रूप में, तो कभी किसी ऐसे मौन के रूप में, जो हमें भीतर तक बदल देता है। मुझे हमेशा लगता है कि गुरु वह नहीं जो केवल मंच पर खड़ा होकर ज्ञान दे। सच्चा गुरु वह है, जिसकी उपस्थिति से मन शांत होने लगे। जिसकी एक बात वर्षों तक भीतर गूंजती रहे। जिसने हमें हमारी कमजोरियों से भागना नहीं, उन्हें स्वीक...