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"महक उठा मेरा मन--इत्र की खुशबू में लिपटी एक सदाबहार ज़िंदगी की दास्तान"

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  महक उठा मेरा मन इत्र की खुशबू में लिपटी एक सदाबहार ज़िंदगी की दास्तान कभी-कभी जीवन में कोई मौसम नहीं बदलता, कोई रास्ता नहीं बदलता, कोई मंज़िल नहीं बदलती, फिर भी सब कुछ बदल जाता है। बस एक खुशबू आकर दिल के किसी बंद दरवाज़े को खोल देती है। एक महक, जो याद बन जाती है। एक सुगंध, जो दुआ बन जाती है। एक इत्र, जो साधारण से दिन को भी उत्सव बना देता है। आज सुबह जब हवा की एक नरम लहर खिड़की से भीतर आई, तो लगा जैसे किसी ने चुपके से गुलाब की पंखुड़ियों पर लिखी कोई प्रेम-पाती मेरे मन तक पहुँचा दी हो। और तभी मन ने कहा— "महक उठा मेरा मन, खुशबू को बिखराता। जैसे कोई इत्र रूह में उतरकर, जीवन को गीत बनाता।" खुशबू का संसार केवल सुगंध नहीं, संस्कृति है दुनिया में शायद ही कोई ऐसी सभ्यता हो जिसने खुशबू को सम्मान न दिया हो। प्राचीन मिस्र की रानियाँ सुगंधित तेलों से अपने दिन की शुरुआत करती थीं। अरब की रेतों में ऊद की महक को शाही गरिमा का प्रतीक माना गया। भारत में चंदन, केवड़ा और गुलाब का इत्र मंदिरों से लेकर राजमहलों तक अपनी पहचान बनाए रहा। फ्रांस ने तो इत्र को कला का दर्जा दे दिया। पर सच कहें तो इत्र...

"कुछ दोस्त कभी पुराने नहीं होते... बस मुलाक़ातें देर से होती हैं"

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  कुछ दोस्त कभी पुराने नहीं होते... बस  मुलाक़ातें देर से होती हैं। "दोस्त तो वही होते हैं ,जो आप की ख़ामोशी को तब भी समझते है जब आप बोलते भी नहीं " कल रात घर में बिजली चली गई। शुरुआत में लगा, थोड़ी देर की बात होगी। लेकिन धीरे-धीरे इन्वर्टर भी जवाब दे गया। घर के हर कमरे में अँधेरा उतर आया। आजकल मोमबत्ती भी कहाँ हर घर में मिलती है... खिड़कियों से भी कोई खास प्राकृतिक रोशनी नहीं आती। गर्मी अलग थी... और अँधेरा अलग। मैंने हाथ का पंखा उठाया और अपनी बेटी मनु और उसकी बचपन की दोस्त तान्या के पास जाकर बैठ गई। तीन साल बाद दोनों मिली थीं। कभी हर साल मिलने वाली दो सहेलियाँ.. . अब पढ़ाई, नौकरी और ज़िम्मेदारियों के बीच तीन साल बाद एक-दूसरे के सामने बैठी थीं। मैं बीच-बीच में पानी देती रही... कभी कुछ खाने को... और ज़्यादा समय... बस उन्हें सुनती रही। शायद पहली बार... मैं अपनी बच्चियों को "बच्चियाँ" नहीं... युवा होते इंसान बनकर सुन रही थी।  तीन साल का फ़ासला... और पाँच मिनट में लौट आया बचपन अजीब बात है... कुछ रिश्तों को दोबारा शुरू होने के लिए औपचारिकता की ज़रूरत नहीं पड़ती। न "...

बचत सिर्फ़ पैसे की नहीं : शब्द, समय, ज्ञान, मान और धन बचाने की अनमोल कला

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बचत सिर्फ़ पैसे की नहीं होती: शब्द, समय, ज्ञान,  मान और धन बचाने की अनमोल कला "बचत..." यह शब्द सुनते ही आपके मन में सबसे पहले क्या आता है? शायद... "पैसा।" और अगर मैं कहूँ कि बचत का सबसे बड़ा संबंध पैसों से नहीं, बल्कि आपके व्यक्तित्व से है? क्या कभी आपने सोचा है— क्या शब्दों की भी बचत की जा सकती है? क्या समय भी बचाया जा सकता है? क्या ज्ञान जितना बाँटते हैं, उतना बढ़ता है? क्या सम्मान भी एक ऐसी पूँजी है जिसे सँभालकर रखना पड़ता है? हम पूरी ज़िंदगी बैंक बैलेंस बढ़ाने में लगा देते हैं, लेकिन कई बार ऐसे शब्द बोल देते हैं जो वर्षों का रिश्ता तोड़ देते हैं। हम पैसे बचा लेते हैं, लेकिन समय यूँ ही गंवा देते हैं। हम ज्ञान अपने तक सीमित रखते हैं, जबकि वही किसी और का भविष्य बदल सकता है। शायद अब समय आ गया है कि "बचत" का अर्थ सिर्फ़ पैसों तक सीमित न रहे।  1. शब्दों की बचत — सबसे सस्ती चीज़, सबसे महँगी कीमत "एक तीर और एक शब्द—दोनों वापस नहीं आते।" शब्द दिखाई नहीं देते, लेकिन उनका प्रभाव वर्षों तक रहता है। एक कठोर वाक्य किसी के आत्मविश्वास को तोड़ सकता है। एक मध...

"बीच वाले स्टेशन बोले... रुक... रुक..." ज़िंदगी भी कुछ ऐसे ही सिग्नल देती है.

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  "बीच वाले स्टेशन बोले... रुक... रुक... रुक..."   ज़िंदगी भी कुछ ऐसे ही सिग्नल देती है...  रेलगाड़ी... रेलगाड़ी... बीच वाले स्टेशन कहते हैं... "रुक... रुक... रुक..." ट्रेन रुकती है, क्योंकि उसे पता होता है कि हर रुकना, सफ़र का अंत नहीं होता। ज़िंदगी भी बिल्कुल ऐसी ही है। कभी लाल सिग्नल देकर कहती है... "थोड़ा ठहर..." कभी पीला सिग्नल देकर समझाती है... "तैयार रह..." और फिर एक दिन हरा सिग्नल मुस्कुराकर कहता है... "अब चल... मंज़िल तेरी राह देख रही है।" इसलिए हर रुकावट को हार मत समझो। ज़िंदगी के मेले तो यूँ ही लगते रहेंगे... बस मुसाफ़िर बदलते रहेंगे, कुछ साथ चलेंगे, कुछ बीच स्टेशन पर उतर जाएँगे, कुछ नए चेहरे सफ़र में शामिल हो जाएँगे। लेकिन... जो अपनी पटरी पर चलता रहता है, वही एक दिन अपनी मंज़िल तक पहुँचता है। ज़िंदगी हमें चलना नहीं सिखाती... ज़िंदगी हमें सही समय पर रुकना भी सिखाती है। 🌿🚆 "रेलगाड़ी... रेलगाड़ी..." बचपन में यह शब्द सुनते ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती थी।  "आओ बच्चो  खेल दिखाए सीटी  छुक छुक करती रेल चलाये  सीटी द...

ज़िंदगी में कुछ कोशिशों को आम किया जाए... "बॉस की डाँट को न बदनाम किया जाए"

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चलो ज़िंदगी में कुछ कोशिशों को आम किया जाए... बॉस की डाँट को न बदनाम किया जाए!  ऑफिस की दुनिया भी बड़ी अजीब है। सुबह कर्मचारी घर से यह सोचकर निकलता है कि आज पूरा दिन शांति से काम करेगा। लेकिन उधर बॉस भी घर से यह सोचकर निकलता है कि आज किसी को डाँटना नहीं है। फिर दोनों ऑफिस पहुँचते हैं... और दोनों की योजनाएँ दोपहर तक धराशायी हो जाती हैं। 😂 बॉस की डाँट: ऑफिस संस्कृति की सबसे पुरानी परंपरा सच कहें तो ऑफिस में बॉस की डाँट उतनी ही पुरानी परंपरा है जितनी चाय के साथ बिस्कुट। फर्क सिर्फ इतना है कि बिस्कुट कभी-कभी मीठा होता है और डाँट हमेशा नमकीन । कर्मचारी की सबसे बड़ी प्रतिभा कर्मचारी की सबसे बड़ी प्रतिभा क्या है? काम करना? नहीं। EMAIL लिखना? नहीं। Excel संभालना? बिल्कुल नहीं। सबसे बड़ी प्रतिभा है... डाँट खाने के बाद भी चेहरे पर "जी सर, बिल्कुल सर" वाली मुस्कान बनाए रखना । 😄 डाँट का पारिवारिक वृक्ष बॉस भी बेचारा क्या करे? उसकी भी अपनी कहानी होती है। ऊपर से उसके बॉस ने उसे डाँटा होता है। उसके ऊपर वाले को उसके ऊपर वाले ने डाँटा होता है। और इस तरह डाँट का एक पूरा पारिवारिक वृक्ष तैया...