ज़िंदगी में कुछ कोशिशों को आम किया जाए... "बॉस की डाँट को न बदनाम किया जाए"



चलो ज़िंदगी में कुछ कोशिशों को आम किया जाए...

बॉस की डाँट को न बदनाम किया जाए! 



ऑफिस की दुनिया भी बड़ी अजीब है।

सुबह कर्मचारी घर से यह सोचकर निकलता है कि आज पूरा दिन शांति से काम करेगा।

लेकिन उधर बॉस भी घर से यह सोचकर निकलता है कि आज किसी को डाँटना नहीं है।

फिर दोनों ऑफिस पहुँचते हैं...

और दोनों की योजनाएँ दोपहर तक धराशायी हो जाती हैं। 😂

बॉस की डाँट: ऑफिस संस्कृति की सबसे पुरानी परंपरा

सच कहें तो ऑफिस में बॉस की डाँट उतनी ही पुरानी परंपरा है जितनी चाय के साथ बिस्कुट।

फर्क सिर्फ इतना है कि बिस्कुट कभी-कभी मीठा होता है और डाँट हमेशा नमकीन

कर्मचारी की सबसे बड़ी प्रतिभा

कर्मचारी की सबसे बड़ी प्रतिभा क्या है?

काम करना?

नहीं।

EMAIL लिखना?

नहीं।

Excel संभालना?

बिल्कुल नहीं।

सबसे बड़ी प्रतिभा है...

डाँट खाने के बाद भी चेहरे पर "जी सर, बिल्कुल सर" वाली मुस्कान बनाए रखना। 😄

डाँट का पारिवारिक वृक्ष

बॉस भी बेचारा क्या करे?

उसकी भी अपनी कहानी होती है।

ऊपर से उसके बॉस ने उसे डाँटा होता है।

उसके ऊपर वाले को उसके ऊपर वाले ने डाँटा होता है।

और इस तरह डाँट का एक पूरा पारिवारिक वृक्ष तैयार हो जाता है।

जिसकी अंतिम शाखा अक्सर सबसे जूनियर कर्मचारी पर आकर समाप्त होती है। 


"कर्मचारी की सबसे बड़ी प्रतिभा..."
आज चाहे कुछ भी हो जाए, काम बिना डाँट खाए पूरा करना है। 

लेकिन दिन के अंत में...
"ये भी ठीक नहीं हुआ..."
"वो पहले कर लेना था..."
"इतनी देर क्यों लगी?"

तब समझ आता है कि...
कुछ लोगों की नज़र में काम कभी पूरा नहीं होता, सिर्फ़ कमियाँ पूरी होती हैं।

इसलिए दूसरों की हर बात दिल पर मत लो।
अपना काम ईमानदारी से करो, सीखते रहो और आगे बढ़ते रहो।

क्योंकि असली सफलता डाँट से बचने में नहीं, हर दिन खुद को बेहतर बनाने में है। 🌿

"ऑफिस में दो तरह के कर्मचारी होते हैं—
एक जो काम करते हैं,
और दूसरे... जो डाँट खाने के बाद भी अगले दिन मुस्कुराकर फिर काम पर आ जाते हैं। वही असली योद्धा हैं।"
 

जब बॉस और कर्मचारी एक-दूसरे को गलत समझते हैं

लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे मज़ेदार हिस्सा यह है कि कर्मचारी और बॉस दोनों एक-दूसरे को गलत समझते हैं।

कर्मचारी सोचता है—

"बॉस को तो बस मेरी गलतियाँ दिखाई देती हैं।"

और बॉस सोचता है—

"काश यह मेरी बातें पहली बार में समझ लेता।"

दोनों दुखी।

दोनों परेशान।

और दोनों चाय पीते हुए तीसरे व्यक्ति से एक-दूसरे की शिकायत करते हुए पाए जाते हैं। 

क्या हर डाँट बुरी होती है?

लेकिन कभी-कभी डाँट का दूसरा पहलू भी होता है।

जिस दिन बॉस आपको पूरी तरह नज़रअंदाज़ करने लगे, उस दिन थोड़ा डरिए।

क्योंकि उम्मीद वहीं रखी जाती है जहाँ संभावना दिखाई देती है।

हालाँकि यह नियम हर जगह लागू नहीं होता।

कुछ बॉस सचमुच डाँटने की कला में पीएचडी करके आते हैं। 

बॉस के कुछ CLASSIC DIALOGE

उनकी आवाज़ सुनकर Wi-Fi तक अपने आप RECONNECT हो जाता है।

उनके "एक मिनट मेरे केबिन में आइए" से दिल की धड़कनें शेयर मार्केट की तरह ऊपर-नीचे होने लगती हैं।

और उनका "बैठिए" शब्द सुनकर इंसान अपने पूरे जीवन के निर्णयों की समीक्षा करने लगता है। 

ऑफिस की सबसे बड़ी सीख

लेकिन फिर भी ऑफिस हमें एक बड़ी सीख देता है।

कोई भी PRFECT नहीं है।

न बॉस।                    (READ THIS AND SHARE PLEASE)

न कर्मचारी।

न वह PRINTER जो सबसे ज़रूरी समय पर जाम हो जाता है।

हम सब सीख रहे हैं।

हम सब गलतियाँ कर रहे हैं।

और हम सब किसी न किसी की डाँट से बचने की कोशिश कर रहे हैं।

निष्कर्ष: डाँट को नहीं, सीख को याद रखिए

इसलिए अगली बार जब बॉस डाँटे तो तुरंत दुखी मत हो जाइए।

पहले यह देखिए कि गलती सच में आपकी थी या फिर SYSTEM, INTERNET 

और ग्रह-नक्षत्रों की संयुक्त साज़िश थी। 

और अगर गलती आपकी थी...

तो मुस्कुराइए।

सीखिए।

सुधारिए।

और मन ही मन सोचिए—

"चलो ज़िंदगी में कुछ कोशिशों को आम किया जाए...

बॉस की डाँट को न बदनाम किया जाए!" 

क्योंकि ऑफिस की असली सफलता केवल PROMOTION में नहीं होती।

असली सफलता उस दिन होती है जब बॉस डाँटे, और आप चाय पीते हुए कह सकें

"कोई बात नहीं सर, कल फिर कोशिश करेंगे!" 

"ऑफिस में दो तरह के कर्मचारी होते हैं—
एक जो काम करते हैं,
और दूसरे... जो डाँट खाने के बाद भी अगले दिन मुस्कुराकर फिर काम पर आ जाते हैं। वही असली योद्धा हैं।


          "चलो ज़िंदगी में कुछ कोशिशों को आम किया जाए."

                "बॉस की डाँट को न बदनाम किया जाए"

तो अब थोड़ा मुस्कुराइए।।।और अपने काम पर लग जाइये। ..वरना  BOSS










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