माँ — हर धड़कन में बसने वाला एहसास--
HAPPY MOTHER'S DAY.....
माँ — हर धड़कन में बसने वाला एहसास
यह सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का सबसे खूबसूरत एहसास है।
एक ऐसा नाम, जिसे लेते ही दिल को सुकून मिलता है, आँखों में नमी आ जाती है
और होंठों पर अनजानी सी मुस्कान आ जाती है।
माँ वह है, जो खुद अधूरी रहकर हमें पूरा बनाती है।
जो अपने हिस्से की खुशियाँ चुपचाप हमारे नाम कर देती है।
जो हमारी हर खामोशी को बिना कहे समझ लेती है।
जब हम छोटे थे, तो हमें लगता था कि माँ बस हमारे लिए खाना बनाती है,
स्कूल भेजती है, डाँटती है, प्यार करती है।
लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ी, समझ आया—
माँ सिर्फ ये सब नहीं करती,
माँ तो हर दिन खुद को थोड़ा-थोड़ा भूलकर हमें याद रखती है।
माँ का हर पल — एक अनकही कहानी
सुबह सबसे पहले उठने वाली माँ ही होती है।
घर के हर कोने में उसकी आहट होती है।
रसोई में चाय की खुशबू, मंदिर में धीमी सी घंटी, और हमारे कमरे के बाहर उसकी पुकार—
“उठ जाओ बेटा, देर हो जाएगी…”
उसकी आवाज़ में ALARM नहीं, अपनापन होता है।
हम कभी सोचते भी नहीं कि
जो हाथ हमारे टिफिन बनाते हैं,
वही हाथ रात को थककर चुपचाप दर्द सहते हैं।
जो चेहरा हमें हर दिन मुस्कुराता दिखता है,
उसके पीछे कितनी चिंताएँ छुपी होती हैं,
ये हम अक्सर देर से समझते हैं।
("माँ मुझे अपने आँचल में छुपा ले ,
गले से लगा ले के और मेरा कोई नहीं" )--एक मशहूर गीत के बोल
Q&A — माँ से जुड़े कुछ अनकहे सवाल
सवाल: माँ इतनी चुप क्यों रहती है?
क्योंकि वह जानती है,
हर बात कह देने से रिश्ते हल्के हो जाते हैं।
वह अपनी थकान, अपना दर्द, अपनी इच्छाएँ—सब चुपचाप तह करके दिल में रख लेती है।
सवाल: माँ को सबसे ज्यादा खुशी कब मिलती है?
जब हम बिना कहे पूछ लें—
“माँ, आप ठीक हो ना?”
उस एक सवाल में उसे पूरी दुनिया का प्यार मिल जाता है।
सवाल: माँ नाराज़ क्यों होती है?
क्योंकि उसे फर्क पड़ता है।
जहाँ प्यार गहरा होता है,
वहीं चिंता भी सबसे ज्यादा होती है।
सवाल: क्या माँ कभी अपने लिए जीती है?
शायद बहुत कम।
वह अपने सपनों को अक्सर बच्चों की फीस, पिता की दवा और घर की ज़रूरतों के नीचे रख देती है।
और फिर भी कहती है—
“मुझे क्या चाहिए, तुम खुश रहो बस।”
खामोश कलम :--
कई बार मैं सोचती हूँ,
अगर माँ की चुप्पी को शब्द मिल जाएँ,
तो शायद दुनिया की सबसे लंबी किताब लिखी जा सकती है।
उस किताब में शिकायतें कम होंगी,
दुआएँ ज्यादा होंगी।
उसमें त्याग के अध्याय होंगे,
ममता की कविताएँ होंगी,
और हर पन्ने पर सिर्फ एक नाम लिखा होगा—
“बच्चे”
माँ कभी अपने लिए नहीं लिखती,
वह हर कहानी में हमें लिखती है।
माँ का स्पर्श :---
जब बचपन में बुखार आता था,
तो दवा से पहले माँ का हाथ माथे पर रखा जाता था।
अजीब बात है ना?
उस स्पर्श में सचमुच राहत होती थी।
आज बड़े हो गए हैं,
दर्द भी बड़े हो गए हैं,
लेकिन सच कहूँ—
आज भी सबसे ज्यादा सुकून माँ की गोद में सिर रखकर मिलता है।
वह पूछती नहीं,
बस सिर सहलाती है…
और सारी परेशानियाँ थोड़ी हल्की लगने लगती हैं।
दूर होकर भी पास
कई लोग घर से दूर रहते हैं।
शहर बदल जाते हैं,
कमरे बदल जाते हैं,
लेकिन माँ की आवाज़ कभी नहीं बदलती।
फोन पर वही सवाल—
“खाना खाया?”
“ठीक से रहना।”
“थक जाते हो तो थोड़ा आराम कर लिया करो।”
दुनिया इसे सामान्य बातचीत समझती है,
लेकिन जो घर से दूर हैं,
वे जानते हैं—
यही शब्द जीने की ताकत बन जाते हैं।
माँ की आँखें :---
माँ की आँखें बहुत अजीब होती हैं।
वह हमारी झूठी हँसी भी पहचान लेती हैं।
हम कहते हैं—
“सब ठीक है।”
और वह बस देखती है…
जैसे कह रही हो—
“मुझसे छुपा नहीं सकते।”
उसकी आँखों में डाँट भी होती है,
दुआ भी,
चिंता भी,
और एक ऐसा विश्वास भी
जो पूरी दुनिया हारने के बाद भी हमें जीतने का हौसला देता है।
जब माँ बूढ़ी होने लगे
सबसे कठिन समय वह होता है
जब पहली बार महसूस होता है
कि माँ अब पहले जैसी तेज़ नहीं रही।
जो हमें पकड़कर चलना सिखाती थी,
अब उसे सीढ़ियाँ उतरते समय सहारे की ज़रूरत होती है।
उस दिन दिल बहुत चुप हो जाता है।
तब समझ आता है—
समय सिर्फ हमारे साथ नहीं,
माँ के साथ भी चल रहा था।
और हम शायद बहुत व्यस्त थे
यह देखने में कि
हम बड़े हो रहे हैं,
वह बूढ़ी हो रही है।
माँ कोई रिश्ता नहीं,
एक पूरी दुनिया है।
वह घर की दीवार नहीं,
घर की धड़कन है।
हम चाहे कितने भी बड़े हो जाएँ,
कितनी भी दूर चले जाएँ,
माँ की दुआएँ हमेशा हमारे आगे चलती हैं।
अगर आज माँ पास है,
तो उसके साथ थोड़ा समय बैठिए।
बिना मोबाइल, बिना जल्दी, बिना वजह।
बस पूछिए—
“माँ, आप खुश हो ना?”
शायद वह मुस्कुरा देगी और कहेगी—
“हाँ”
लेकिन उस “हाँ” के पीछे
एक पूरी जिंदगी छुपी होगी।
और अगर माँ दूर है,
तो आज ही फोन कर लीजिए।
क्योंकि कुछ रिश्ते
सिर्फ महसूस नहीं किए जाते—
संभाले भी जाते हैं।
माँ…
तुम शब्द नहीं,
मेरी सबसे खूबसूरत दुआ हो।
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