"जन्माष्टमी — जब कान्हा भी आया, और मेरी गुड़िया भी"
जन्माष्टमी — जब कान्हा भी आया, और मेरी गुड़िया भी
रात गहरी होने लगी थी... आसमान में बादल यूँ घिरे थे, जैसे कोई ख़ुद ख़ामोशी से कुछ रचने की तैयारी में हो।
भादों की वो अँधेरी रात... बिजली कभी-कभी चमकती, और फिर सन्नाटा लौट आता।
कहते हैं— जब-जब धरती बोझिल होती है, तब-तब कोई कान्हा जन्म लेता है।
उस रात मथुरा की जेल में एक दीया जल उठा था... न हवा बुझा पाई, न पहरेदार रोक पाए।
वो दीया... कृष्ण था।
कान्हा की लीला
यशोदा की गोद में जो मुस्कुराया, उसने पूरी सृष्टि हिला दी।
माखन चुराता, मटकी फोड़ता, गोपियों को छेड़ता...
पर हर शरारत में एक भोलापन था, जिसे देख कर ब्रज की हर आँख भर आती थी।
कान्हा भागता था आँगन में, और यशोदा पीछे दौड़तीं... हाथ में दही की मटकी, मन में बस एक डर— कहीं मेरा लाला गिर न जाए।
क्या यही प्रेम नहीं है? डाँटना... और फिर उसी पल गले लगा लेना।
बाँसुरी जब उसके होंठों से लगती, तो यमुना भी बहना भूल जाती। पेड़ों के पत्ते ठहर जाते, हवा भी धीमी हो जाती, जैसे सब कुछ सुनना चाहता हो वो धुन, जो शब्दों से परे थी।
राधा की आँखों में जो तड़प थी, वो प्रेम की सबसे सच्ची भाषा थी। न शिकायत, न सवाल... बस एक इंतज़ार, जो सदियों से आज तक अधूरा है।
कान्हा ने कभी वादा नहीं तोड़ा... पर कभी वादा किया भी नहीं। शायद यही उसकी लीला थी— पाने से पहले खोने का एहसास दे जाना।
और उसी रात... मेरे घर में भी एक दीया जला
तीस साल पहले, इसी जन्माष्टमी की रात, मेरे घर के आँगन में भी एक किलकारी गूँजी थी।
डॉक्टर ने कहा— "बेटी हुई है।"
और मैं... मैं वहीं ठहर गया।
बाहर मंदिरों में शंख बज रहे थे, "नंद के आनंद भयो" की गूँज हवा में तैर रही थी...
और अंदर, मेरी गोद में मेरी अपनी छोटी सी लीला आँखें मिचमिचा रही थी।
क्या यह इत्तेफ़ाक़ था? या फिर ऊपरवाले का कोई ख़ामोश इशारा— "ले... तुझे भी एक कान्हा भेजा है, बस इस बार वो लड़की के रूप में आया है।"
मेरी बेटी, मेरी कान्हा
उसने भी बहुत कुछ चुराया... पर माखन नहीं, मेरी नींदें चुराईं, मेरा सुकून चुराया, और बदले में एक ऐसा सुकून दिया, जिसका कोई नाम नहीं।
वो भी भागती थी आँगन में, गिरती थी, उठती थी, हँसती थी...
और मैं भी, यशोदा की तरह, डरते-डरते उसके पीछे दौड़ता था।
उसकी शरारतें, उसकी ज़िद, उसका वो मासूम-सा गुस्सा...
सब कुछ याद है, जैसे कल की बात हो। yy
कल तक जो मेरी उँगली पकड़ कर चलना सीख रही थी, आज वो अपनी राह परखुद चल रही है।
यही तो होता है न? कान्हा भी तो एक दिन वृंदावन छोड़ गया था। यशोदा रोई थीं, पर रोका नहीं था।
क्योंकि माँ-बाप का प्रेम बाँधता नहीं, उड़ना सिखाता है।
हर साल जब जन्माष्टमी आती है...
मंदिरों में झूले सजते हैं, कान्हा को झुलाया जाता है, भजन गूँजते हैं...
और मेरे मन में एक और झूला झूलता है— मेरी बेटी के जन्म का दिन।
दो जन्मदिन, एक ही रात में...
एक जिसने पूरी दुनिया को प्रेम की भाषा सिखाई, और एक जिसने मुझे सिखाया— पिता होने का असली अर्थ।
मैं हर साल दही-हाँडी नहीं फोड़ता, पर हर साल अपनी बेटी की आँखों में वही मासूमियत ढूँढता हूँ, जो उस दिन थी, जब पहली बार उसने मुझे देखा था।
क्या वो आज भी उतनी ही मासूम है?
शायद हाँ... शायद नहीं...
पर एक बात तय है— वो आज भी मेरे लिए उतनी ही खास है, जितनी उस रात थी, जब बाहर शंख बज रहे थे और अंदर वो पहली बार रोई थी।
कान्हा और बेटी में एक समानता है
दोनों बिन बुलाए आते हैं, और पूरी ज़िंदगी बदल देते हैं।
दोनों जाने के बाद भी, यादों में जीते रहते हैं।
दोनों को बाँधा नहीं जा सकता, सिर्फ़ प्रेम किया जा सकता है।
और शायद... दोनों ही हमें सिखाने आते हैं— प्रेम क्या होता है, इंतज़ार क्या होता है, और खोकर भी कुछ न खोना क्या होता है।
आज, जब यह जन्माष्टमी फिर आई है...
मैं मंदिर जाऊँगा, कान्हा के सामने सिर झुकाऊँगा।
पर एक दुआ सिर्फ़ अपनी बेटी के लिए होगी—
कि जहाँ भी रहे, जैसी भी रहे, उसकी मुस्कान कभी फीकी न पड़े।
कि उसकी आँखों में वही रौशनी बनी रहे, जो तीस साल पहले इसी रात पहली बार जगी थी।
बेटा, तुम कान्हा नहीं हो, पर तुम मेरी लीला हो...
वो लीला, जिसे मैंने जिया है, हर पल, हर साँस में।
आज भी जब जन्माष्टमी की रात शंख बजते हैं, मेरा दिल एक ही धुन पर धड़कता है—
आधी कान्हा के लिए, आधी तुम्हारे लिए।
और शायद... यही सबसे सच्ची इबादत है—
किसी ईश्वर को पूजना, और अपनी औलाद में वही ईश्वर देख पाना।
जन्माष्टमी मुबारक हो, मेरी कान्हा...
तुम जहाँ भी हो, जैसी भी हो, तुम आज भी उस रात की तरह ही मेरी सबसे बड़ी दुआ हो।
"मेरे लिए स्पेशल बना दिया कान्हा जी अपने इस दिन को."
.....इस लिए आपको बारम्बार। .प्रणाम
आपको आपका जन्मदिन मुबारक।।।
आप ऐसे ही अपनी कृपा बनाये रखना कन्हैया।।।

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