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"हर कदम बदलते सनम… बदलती दुनिया के साथ बदलते रिश्तों की दास्तान"

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  हर कदम बदलते सनम… बदलती दुनिया के साथ बदलते रिश्तों की दास्तान शाम ढल रही थी। एक पुराना घर, एक पुरानी खिड़की, और उसी खिड़की के पास बैठा एक बुज़ुर्ग इंसान। हाथ में मोबाइल था। स्क्रीन पर सैकड़ों नाम चमक रहे थे। पर उंगली किसी नाम पर रुक नहीं रही थी। इतने CONTACTS… और बात करने को कोई नहीं। उन्हें अचानक याद आया — वो ज़माना, जब फोन नहीं होता था। जब लोग बिना बताए किसी के घर पहुँच जाते थे। जब मिलने के लिए न APPOINTMENT चाहिए होती थी, न "फ्री हो क्या?" वाला मैसेज। नाराज़गी होती थी, लेकिन रिश्ता नहीं टूटता था। आज सब कुछ है — नेटवर्क है, स्पीड है, हज़ारों FRIENDS हैं। फिर भी एक ख़ामोशी है, जो शायद पहले कभी इतनी गहरी नहीं थी। तो सवाल यही उठता है — क्या रिश्ते सचमुच बदल गए हैं… या बदलती दुनिया ने हमें रिश्ते निभाने का तरीका बदलने पर मजबूर कर दिया है? पुराने रिश्ते — कम साधन, मगर ज़्यादा अपनापन पहले के रिश्तों में एक सादगी थी। पड़ोसी परिवार जैसे होते थे। चिट्ठी आने का इंतज़ार अपने आप में एक एहसास होता था। त्योहारों पर रिश्तेदार इकट्ठा होते, दोस्तों की बैठकें घंटों चलतीं, और रू...

"जन्माष्टमी 2026: ब्रज में आनंद भयो, जय कान्हैया लाल की"

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  जन्माष्टमी 2026: ब्रज में आनंद भयो, जय कान्हैया लाल की भूमिका हर साल भादों की अंधेरी रात में एक ऐसा पल आता है, जब पूरा ब्रज—मथुरा, वृंदावन, गोकुल और द्वारका—झूम उठता है। शंख बजते हैं, घंटियाँ गूँजती हैं, और लाखों कंठों से एक ही स्वर फूटता है— "नंद के आनंद भयो, जय कान्हैया लाल की!" यह पल है जन्माष्टमी , यानी भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव। साल 2026 में यह पावन पर्व शुक्रवार, 4 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा। इस लेख में हम जानेंगे कृष्ण जन्म की अमर कथा, उनकी बाल-लीलाओं का रस, जन्माष्टमी 2026 की सही तिथि और मुहूर्त, तथा इस पर्व को मनाने के तरीके। जन्माष्टमी 2026: तिथि, मुहूर्त और शुभ समय पंचांग के अनुसार जन्माष्टमी भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। साल 2026 में अष्टमी तिथि 4 सितंबर को सुबह 02:25 बजे शुरू होकर 5 सितंबर की रात 12:13 बजे तक रहेगी। रोहिणी नक्षत्र 4 सितंबर को रात 12:29 बजे शुरू होकर उसी दिन रात 11:04 बजे तक रहेगा, जबकि मध्यरात्रि का शुभ क्षण—जब कृष्ण का वास्तविक जन्म माना जाता है—5 सितंबर की रात 12:26 बजे आएगा। भारत के अधिकांश राज्यों म...

"रक्षाबंधन 2026: त्योहार लौट आते हैं, क्या हम भी लौट पाते हैं?"

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  रक्षाबंधन 2026: त्योहार लौट आते हैं, क्या हम भी लौट पाते हैं? दिन और तारीख: शुक्रवार, 28 अगस्त 2026 पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 27 अगस्त 2026 को सुबह 9:08 बजे पूर्णिमा तिथि समाप्त: 28 अगस्त 2026 को सुबह 9:48 बजे)  रक्षाबंधन 2026 रक्षाबंधन 2026 एक तरफ़ मोबाइल स्क्रीन पर लगातार आती notifications हैं। दूसरी तरफ़ थाली में सजी राखी, रोली, चावल और मिठाई। कहीं एक बहन हाथ में राखी लिए दरवाज़े की तरफ़ देख रही है। कहीं एक भाई किसी मीटिंग से निकलने की कोशिश में है। और कहीं माँ फोन पर बस इतना पूछ रही है — "इस बार राखी पर आ पाओगे न?" जवाब देने से पहले हम अपनी व्यस्तताओं का हिसाब लगाने लगते हैं  कैलेंडर खोलते हैं, छुट्टियाँ गिनते हैं, टिकट के दाम देखते हैं। और कहीं गहरे में एक सवाल दब जाता है — त्योहार तो हर साल लौट आते हैं, लेकिन क्या हम सचमुच उन अपनों तक लौट पाते हैं, जिनके लिए हमारे दिल में सबसे ज़्यादा जगह है? हम इतने व्यस्त कब हो गए? सुबह आँख खुलते ही मोबाइल, फिर ऑफिस, मीटिंग्स, बच्चों की पढ़ाई, घर का सामान, EMI, भविष्य की चिंता। रात को सोने से पहले फिर वही स्क्रीन। इसी भागद...

"राखी... ये रक्षाबंधन है ऐसा, जो हर धागे से कुछ ज्यादा कहता है"

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  राखी... ये रक्षाबंधन है ऐसा,  जो हर धागे से कुछ ज्यादा कहता है कल्पना कीजिए — सुबह के 7 बजे हैं, आपका फोन बजता है और दूसरी तरफ से आवाज आती है, "भाई, आज राखी है, भूल तो नहीं गए?" उस एक वाक्य में जो मुस्कान आपके चेहरे पर आती है, वो दुनिया की किसी भी खुशी से बड़ी होती है। यही तो है रक्षाबंधन का असली जादू — एक धागा, जो दिलों को इस कदर बांध देता है कि सालों की दूरी भी उसके सामने बौनी पड़ जाती है। अगर आप सोच रहे हैं कि रक्षाबंधन बस एक रस्म है , तो रुकिए। यह लेख आपकी सोच बदल देगा। आज हम बात करेंगे रक्षाबंधन के असली मतलब की, कुछ PRACTICAL TIPS की, और खामोश कलम के कुछ खास विचारों की, जो इस त्यौहार को आपके लिए और भी खास बना देंगे। रक्षाबंधन का असली मतलब क्या है ? रक्षाबंधन शब्द दो हिस्सों से बना है — "रक्षा" यानी सुरक्षा, और "बंधन" यानी बंधन या रिश्ता। पर क्या यह सिर्फ भाई की तरफ से बहन की सुरक्षा का वादा है? नहीं। आज के दौर में यह रिश्ता दोतरफा हो चुका है। बहनें भी अपने भाइयों के लिए उतनी ही मजबूती से खड़ी होती हैं। यह त्यौहार अब सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि ...

"वक़्त, मुट्ठी से रेत की तरह फिसल रहा है… वक़्त, कब निकलोगे अपने लिए?"

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"वक़्त, मुट्ठी से रेत की तरह फिसल रहा है… वक़्त, कब निकलोगे अपने लिए?" शाम धीरे-धीरे उतर रही थी। खिड़की के पास रखी कुर्सी पर वह चुपचाप बैठी थी। सामने आसमान पर सूरज की आख़िरी लाली ठहरी हुई थी। पेड़ों पर लौटते पंछियों को देखकर अचानक उसे अपना बचपन याद आ गया। वह भी तो कभी ऐसे ही शाम होते ही घर लौट आया करती थी। माँ दरवाज़े पर खड़ी रहती थीं। कभी डाँटतीं— “कितनी देर लगा दी?” और वह हँसते हुए कहती— “बस पाँच मिनट और…” आज वही “पाँच मिनट” कहीं बहुत दूर छूट गए थे।   माँ नहीं थीं। वह आँगन नहीं था। वह बचपन भी नहीं था। बस यादें थीं… और एक अजीब-सी ख़ामोशी। उसने अपनी हथेली खोली। कुछ नहीं था। फिर अचानक लगा जैसे वक़्त भी इसी तरह उसकी हथेली से निकल गया हो। मुट्ठी में भरकर रखा था जिसे कभी, वही वक़्त आज रेत बनकर उँगलियों के बीच से फिसल रहा था। और मन ने बहुत धीमे से पूछा— “वक़्त… कब निकलोगे?” वक़्त सचमुच मुट्ठी की रेत है हम अक्सर सोचते हैं कि हमारे पास बहुत समय है। कल कर लेंगे। अगले महीने कर लेंगे। रिटायर होने के बाद करेंगे। बच्चे बड़े हो जाएँ, फिर अपने लिए जिएँगे। घर की ज़िम्मेदारियाँ थोड़ी कम हो ...

15 अगस्त: "तिरंगा फहरा तो दिया--लेकिन क्या इंसान भी आज़ाद हुआ?"

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  15 अगस्त: तिरंगा फहरा तो दिया, पर मन अब भी कहाँ आज़ाद हुआ? सुबह के साढ़े सात बजे हैं। स्कूल के मैदान में बच्चे कतार में खड़े हैं,  वर्दी पर इस्त्री की सलवटें अभी ताज़ा हैं। कोई बच्चा तिरंगे की टोपी पहने है,  किसी की मुट्ठी में छोटा-सा झंडा है जिसे वह बार-बार हवा में लहरा रहा है।  तभी ऊपर, बहुत ऊपर, वह रस्सी खिंचती है और तिरंगा खुलता है — केसरिया, सफ़ेद, हरा —  हवा में फहरता हुआ। तालियाँ गूँजती हैं। राष्ट्रगान की पहली पंक्ति के साथ ही जैसे पूरा मैदान साँस रोक लेता है। यह दृश्य हर साल दोहराता है। हर 15 अगस्त को। और हर बार, इस दृश्य के भीतर एक ख़ामोशी छिपी होती है, जिसे शायद हम में से बहुत कम लोग सुन पाते हैं। क्योंकि जब झंडा फहरता है, तब एक सवाल भी साथ ही हवा में तैरने लगता है — "1947 में देश आज़ाद हुआ था... लेकिन क्या इंसान भी आज़ाद हुआ?"   (TEEJ SPECIAL) यह सवाल न कोई नारा है, न कोई आरोप। यह बस एक एहसास है, जो हर साल इसी दिन दस्तक देता है और फिर अगले ही पल भीड़, जश्न और मिठाइयों की गहमागहमी में कहीं गुम हो जाता है। आज, बस एक बार, आइए इस सवाल को ग...

दिल ढूँढ़ता है फिर वही फ़ुर्सत के रात-दिन"-खोए सुकून की तलाश

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  दिल ढूँढ़ता है फिर वही फ़ुर्सत के रात-दिन शाम धीरे-धीरे उतर रही थी। खिड़की के बाहर आसमान पर सूरज की आख़िरी रोशनी ठहरने की कोशिश कर रही थी।  चिड़ियाँ अपने-अपने घोंसलों की तरफ़ लौट रही थीं। पेड़ों के पत्ते हवा के साथ ऐसे हिल रहे थे,  जैसे दिनभर की थकान के बाद एक-दूसरे से कोई धीमी-सी बात कर रहे हों। और मैं... अपने ही कमरे में बैठी, हाथ में मोबाइल लिए, जाने कितनी चीज़ें देख रही थी। संदेश थे। सूचनाएँ थीं। काम थे। लोग थे। दुनिया थी। बस... मैं नहीं थी। अचानक मन के किसी बहुत पुराने कोने से एक आवाज़ आई— “दिल ढूँढ़ता है फिर वही फ़ुर्सत के रात-दिन...” और लगा जैसे किसी ने वर्तमान की भीड़ में हाथ पकड़कर मुझे बहुत पीछे खींच लिया हो। उस समय में... जब शाम का मतलब सचमुच शाम होती थी। जब रात का मतलब चैन से सोना होता था। जब मिलने के लिए किसी स्क्रीन की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। और जब ख़ुश रहने के लिए कोई बड़ी वजह भी नहीं चाहिए होती थी। क्या सचमुच हमें फुर्सत चाहिए? शायद नहीं। हमें सिर्फ़ अपने होने का एहसास चाहिए। फुर्सत तो हमारे पास आज भी है, लेकिन हमने उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँट दिया ह...

"भैया कलाई आपकी... राखी मेरी..."--राखी की थाली की सुगबुगाहट

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  भैया, कलाई आपकी, राखी मेरी.. माथा आपका, रोली मेरी... कल रक्षाबंधन है। पूरा घर जैसे किसी मीठी-सी प्रतीक्षा में डूबा हुआ है। रसोई से उठती मिठाइयों की खुशबू... आँगन में रखी पूजा की थाली... और कमरे के एक कोने में बैठी .. प्यारी बहना  जो अपनी  भाइयों के लिए लाई हुई राखियों को बार-बार सजा रही है। कभी लाल वाली राखी सबसे बड़ी लगती... तो कभी मोतियों वाली सबसे सुंदर। उसे देखकर माँ मुस्कुरा दीं। फिर बोलीं— "बेटा, राखियाँ तो बहुत प्यार से सजा लीं... अब सुबह के लिए दूब और ताज़ा पानी भी भर लेना। पूजा की थाली तभी पूरी मानी जाएगी।" प्यारी बहना  ने "हाँ  माँ" कहकर थाली वहीं रख दी और दूसरे काम में लग गई। रात गहराने लगी... घर के सभी लोग सो गए। लेकिन... आज शायद राखी की थाली को नींद नहीं आ रही थी। जैसे ही चाँदनी खिड़की से भीतर आई... थाली में रखी राखी ने धीरे से करवट ली... और मुस्कुराकर बोली— "भैया कलाई आपकी... राखी मेरी..." इतना सुनते ही रोली खिलखिलाकर हँस पड़ी... "अरी बहन... कलाई की बात बाद में करना। सबसे पहले तो माथा मेरा है..." पास रखा...