"हर कदम बदलते सनम… बदलती दुनिया के साथ बदलते रिश्तों की दास्तान"
हर कदम बदलते सनम… बदलती दुनिया के साथ बदलते रिश्तों की दास्तान शाम ढल रही थी। एक पुराना घर, एक पुरानी खिड़की, और उसी खिड़की के पास बैठा एक बुज़ुर्ग इंसान। हाथ में मोबाइल था। स्क्रीन पर सैकड़ों नाम चमक रहे थे। पर उंगली किसी नाम पर रुक नहीं रही थी। इतने CONTACTS… और बात करने को कोई नहीं। उन्हें अचानक याद आया — वो ज़माना, जब फोन नहीं होता था। जब लोग बिना बताए किसी के घर पहुँच जाते थे। जब मिलने के लिए न APPOINTMENT चाहिए होती थी, न "फ्री हो क्या?" वाला मैसेज। नाराज़गी होती थी, लेकिन रिश्ता नहीं टूटता था। आज सब कुछ है — नेटवर्क है, स्पीड है, हज़ारों FRIENDS हैं। फिर भी एक ख़ामोशी है, जो शायद पहले कभी इतनी गहरी नहीं थी। तो सवाल यही उठता है — क्या रिश्ते सचमुच बदल गए हैं… या बदलती दुनिया ने हमें रिश्ते निभाने का तरीका बदलने पर मजबूर कर दिया है? पुराने रिश्ते — कम साधन, मगर ज़्यादा अपनापन पहले के रिश्तों में एक सादगी थी। पड़ोसी परिवार जैसे होते थे। चिट्ठी आने का इंतज़ार अपने आप में एक एहसास होता था। त्योहारों पर रिश्तेदार इकट्ठा होते, दोस्तों की बैठकें घंटों चलतीं, और रू...