"वक़्त, मुट्ठी से रेत की तरह फिसल रहा है… वक़्त, कब निकलोगे अपने लिए?"


"वक़्त, मुट्ठी से रेत की तरह फिसल रहा है… वक़्त, कब निकलोगे अपने लिए?"

Young woman sitting by a cozy window with hot coffee, looking out at a vibrant sunset over scenic hills with birds flying

शाम धीरे-धीरे उतर रही थी।

खिड़की के पास रखी कुर्सी पर वह चुपचाप बैठी थी। सामने आसमान पर सूरज की आख़िरी लाली ठहरी हुई थी। पेड़ों पर लौटते पंछियों को देखकर अचानक उसे अपना बचपन याद आ गया।

वह भी तो कभी ऐसे ही शाम होते ही घर लौट आया करती थी।

माँ दरवाज़े पर खड़ी रहती थीं।

कभी डाँटतीं—

“कितनी देर लगा दी?”

और वह हँसते हुए कहती—

“बस पाँच मिनट और…”

आज वही “पाँच मिनट” कहीं बहुत दूर छूट गए थे।  

माँ नहीं थीं।

वह आँगन नहीं था।

वह बचपन भी नहीं था।

बस यादें थीं… और एक अजीब-सी ख़ामोशी।

उसने अपनी हथेली खोली।

कुछ नहीं था।

फिर अचानक लगा जैसे वक़्त भी इसी तरह उसकी हथेली से निकल गया हो।

मुट्ठी में भरकर रखा था जिसे कभी,
वही वक़्त आज रेत बनकर उँगलियों के बीच से फिसल रहा था।

और मन ने बहुत धीमे से पूछा—

“वक़्त… कब निकलोगे?”

वक़्त सचमुच मुट्ठी की रेत है

हम अक्सर सोचते हैं कि हमारे पास बहुत समय है।

कल कर लेंगे।

अगले महीने कर लेंगे।

रिटायर होने के बाद करेंगे।

बच्चे बड़े हो जाएँ, फिर अपने लिए जिएँगे।

घर की ज़िम्मेदारियाँ थोड़ी कम हो जाएँ, फिर कहीं घूमने जाएँगे।

मन थोड़ा शांत हो जाए, फिर अपने भीतर झाँकेंगे।

लेकिन वक़्त किसी के लिए रुकता नहीं।

वह न किसी की प्रतीक्षा करता है, न किसी से अनुमति माँगता है।

वह बस चलता रहता है।

सुबह से शाम…

सोमवार से रविवार…

जनवरी से दिसंबर…

और देखते ही देखते एक साल हमारी ज़िंदगी से कम हो जाता है।

कभी कैलेंडर की तारीख़ बदलती है,

कभी बालों में एक सफ़ेद लकीर बढ़ जाती है,

कभी बच्चे हमारे हाथ से निकलकर अपने संसार में चले जाते हैं,

और कभी आईने में खड़ा चेहरा अचानक अपना-सा कम और अजनबी-सा ज़्यादा लगने लगता है।

तब समझ आता है—

उम्र बढ़ना केवल साल बढ़ना नहीं है,
यह उन चीज़ों का धीरे-धीरे छूटना भी है, जिन्हें हम हमेशा अपना समझते रहे।

हमें लगता है वक़्त निकल रहा है, जबकि हम ही निकल रहे हैं

कभी बैठकर सोचिए…

आख़िर वक़्त कहाँ जाता है?

कल भी तो सूरज निकला था।

आज भी निकला।

कल भी हम जागे थे।

आज भी जागे हैं।

फिर ऐसा क्यों लगता है कि ज़िंदगी इतनी जल्दी बीत गई?

शायद इसलिए क्योंकि वक़्त कहीं बाहर नहीं जा रहा।

हम स्वयं वक़्त के साथ आगे बढ़ते जा रहे हैं।

हमारी उम्र का हर दिन हमें थोड़ा-थोड़ा उस अंतिम पड़ाव की ओर ले जा रहा है, 

जहाँ पहुँचकर इंसान पीछे मुड़कर देखता है और सोचता है—

काश…

थोड़ा और जी लिया होता।

काश माँ के साथ थोड़ी और बातें की होतीं।

काश पिता के पास थोड़ा और बैठा होता।

काश बच्चों की शरारतों पर इतना गुस्सा न किया होता।

काश अपने मन की बात कहने में इतनी देर न की होती।

काश अपने लिए भी कुछ पल बचाए होते।

लेकिन ज़िंदगी में सबसे भारी शब्द शायद यही है—

“काश।”

क्योंकि बीता हुआ वक़्त लौटकर नहीं आता।

बचपन कब पीछे छूट गया?

कभी हमारे लिए सबसे बड़ी खुशी थी—

बारिश में भीगना।

गली में दोस्तों के साथ खेलना।

माँ के हाथ का खाना।

छुट्टियों का इंतज़ार।

दादी की कहानी।

पिता की उँगली पकड़कर बाज़ार जाना।

और शाम होते ही घर से आवाज़ आना—

“अंदर आ जाओ, बहुत देर हो गई।”

तब हमें लगता था कि बड़े होकर बहुत आज़ादी मिलेगी।

बड़े हुए तो पता चला—

बचपन की पाबंदियाँ कितनी प्यारी थीं।

तब समय हमारे पास था,

लेकिन समझ नहीं थी।

आज समझ है,

लेकिन समय मुट्ठी में नहीं है।

यही तो ज़िंदगी की सबसे ख़ामोश विडंबना है।

जिस उम्र में हमारे पास समय था, तब हम उसे जीने की जल्दी में थे।

और जिस उम्र में समय की कीमत समझ आई,

तब वह धीरे-धीरे हमारी हथेली से फिसलने लगा।

रिश्ते भी वक़्त के साथ बदल जाते हैं

वक़्त केवल हमारी उम्र नहीं बदलता।

वह रिश्तों का रंग भी बदल देता है।

कभी एक दोस्त के बिना दिन अधूरा लगता था।

आज महीनों बीत जाते हैं, बात नहीं होती।

कभी भाई-बहन एक कमरे में बैठकर घंटों लड़ते थे।

आज फोन पर भी बात करने का समय नहीं मिलता।

कभी बच्चे हमारे पीछे-पीछे घूमते थे।

“माँ, ये चाहिए…”

“पापा, मेरे साथ खेलो…”

और हम काम में व्यस्त होकर कहते थे—

“अभी नहीं… बाद में।”

वह “बाद में” कब आया?

शायद कभी आया ही नहीं।

बच्चे बड़े हो गए।

उनकी अपनी दुनिया बन गई।

और हमें अचानक याद आया—

हमने तो उनके बचपन को ठीक से देखा ही नहीं।

इसलिए अगर आज कोई आपका अपना आपके पास बैठना चाहता है,

तो मोबाइल थोड़ी देर रख दीजिए।

उसकी बात सुन लीजिए।

क्योंकि हो सकता है,

आज जो बच्चा आपके पास बैठा है,

कल उसके पास आपके लिए समय न हो।

और हो सकता है,

कल आपके पास उसके लिए समय हो…

लेकिन वह बचपन फिर आपके पास न हो।

.;'“जब समय मिलेगा…” — यह सबसे बड़ा भ्रम है

हम अपनी ज़िंदगी का कितना हिस्सा इस वाक्य में गुज़ार देते हैं—

“जब समय मिलेगा…”

जब काम कम होगा।

जब पैसे ज़्यादा होंगे। 

जब बच्चे बड़े होंगे।

जब घर की ज़िम्मेदारियाँ पूरी होंगी।

जब शरीर साथ देगा।

जब मन ठीक होगा।

जब छुट्टी मिलेगी।

जब सब ठीक हो जाएगा।

लेकिन सच यह है कि—

ज़िंदगी में कभी सब कुछ ठीक नहीं होता।

कुछ न कुछ हमेशा अधूरा रहेगा।

कोई चिंता होगी।

कोई ज़िम्मेदारी होगी।

कोई इच्छा अधूरी होगी।

कोई व्यक्ति नाराज़ होगा।

कोई सपना इंतज़ार करेगा।

इसलिए ज़िंदगी को “सही समय” का इंतज़ार करते-करते मत गुज़ारिए।

क्योंकि शायद सही समय कोई अलग दिन नहीं है।

शायद सही समय वही है, जो अभी आपकी हथेली में है।


थोड़ा अपने लिए भी जी लीजिए

दूसरों के लिए जीना बहुत सुंदर बात है।

माँ होना,

पिता होना,

पत्नी होना,

पति होना,

बेटी होना,

बहन होना,

दोस्त होना—

हर रिश्ता हमें कुछ देता है और हमसे कुछ माँगता भी है।

लेकिन इन सब रिश्तों के बीच एक रिश्ता अक्सर छूट जाता है—

अपने साथ हमारा रिश्ता।

हम सबको खुश रखने की कोशिश करते हैं।

सबकी चिंता करते हैं।

सबके लिए समय निकालते हैं।

लेकिन जब बात अपने मन की आती है,

तो कहते हैं—

“मेरे पास समय नहीं है।”

कभी अकेले बैठिए।

बिना किसी काम के।

बिना फोन के।

बिना किसी को जवाब दिए।

बस अपने साथ।

अपने मन से पूछिए—

“मैं सच में कैसा हूँ?”

शायद भीतर कोई बहुत पुरानी इच्छा आज भी आपका इंतज़ार कर रही हो।

शायद कोई सपना धूल में दबा हो।

शायद कोई गीत जिसे आप गाना चाहते थे,

अब भी आपके भीतर बज रहा हो।

उसे सुनिए।

वक़्त बहुत तेज़ है।

हर दिन को बड़ा बनाने की ज़रूरत नहीं

हम सोचते हैं कि ज़िंदगी तभी अच्छी होगी जब कुछ बड़ा होगा।

बड़ी सफलता।

बड़ा घर।

बड़ी यात्रा।

बहुत पैसा।

बहुत प्रसिद्धि।

लेकिन उम्र के एक पड़ाव पर आकर समझ आता है—

ज़िंदगी बड़ी घटनाओं से कम,

छोटे-छोटे पलों से ज़्यादा बनती है।

सुबह की चाय।

बरामदे में बैठना।

बारिश की आवाज़।

किसी अपने की हँसी।

पुराना गीत।

माँ की याद।

बच्चे का सिर अपनी गोद में रखना।

किसी दोस्त का अचानक फोन आ जाना।

मंदिर की घंटी।

सूरज का डूबना।

और रात में मन का शांत होकर सो जाना।

यही तो जीवन है।

हम बड़ी खुशियों के इंतज़ार में छोटी खुशियों को खो देते हैं।

और फिर एक दिन समझ आता है—

जिसे हम मामूली समझ रहे थे, वही हमारी सबसे बड़ी पूँजी थी।

वक़्त को रोक नहीं सकते, लेकिन उसे जी सकते हैं

हम समय को रोक नहीं सकते।

न कल वापस ला सकते हैं,

न आने वाले कल को अपने हिसाब से बाँध सकते हैं।

लेकिन एक चीज़ हमारे हाथ में है—

आज।

आज किसी अपने से प्यार से बात कर सकते हैं।

आज किसी को माफ़ कर सकते हैं।

आज किसी पुराने दोस्त को फोन कर सकते हैं।

आज माँ की तस्वीर के सामने बैठकर उन्हें याद कर सकते हैं।

आज बच्चे के साथ पाँच मिनट खेल सकते हैं।

आज अपने लिए एक कप चाय शांति से पी सकते हैं।

आज अपनी पसंद की किताब खोल सकते हैं।

आज सूरज को डूबते हुए देख सकते हैं।

आज बस इतना कह सकते हैं—

“ज़िंदगी, मैं तुम्हें जल्दी में नहीं जीना चाहता।”

शायद वक़्त निकल नहीं रहा… हमें जगाने आ रहा है

कभी-कभी हमें लगता है कि समय हमसे सब कुछ छीन रहा है।

यौवन।

लोग।

रिश्ते।

मौके।

सपने।

लेकिन शायद समय का काम छीनना नहीं,

समझाना है।

वह हमें बताता है कि कुछ भी स्थायी नहीं है।

जो आज है,

कल नहीं होगा।

इसलिए उसे पकड़कर रखने की जगह,

उसे प्रेम से जीना सीखिए।

फूल को तोड़कर हमेशा के लिए रखने की कोशिश मत कीजिए।

उसे खिलते हुए देखिए।

बच्चे को हमेशा छोटा बनाए रखने की कोशिश मत कीजिए।

उसे बड़ा होते देखिए।

रिश्तों को अपनी मुट्ठी में बंद मत कीजिए।

उन्हें साँस लेने की जगह दीजिए।

और अपने बीते हुए कल को लेकर इतना मत रोइए कि आज भी हाथ से निकल जाए।

क्योंकि—

बीता हुआ कल आपकी कहानी है,
लेकिन आज का दिन आपकी आख़िरी लिखी जा रही पंक्ति है।

उसे सुंदर लिखिए।

और एक दिन… हम भी किसी की याद बन जाएँगे

यह बात सुनना थोड़ी कठिन है।

लेकिन सच है।

एक दिन हमारी कुर्सी खाली होगी।

हमारी आवाज़ किसी को याद आएगी।

हमारे कमरे में हमारी चीज़ें होंगी।

किसी किताब में हमारा नाम होगा।

किसी पुराने फोटो में हमारा चेहरा होगा।

कोई हमारी कही हुई बात याद करेगा।

और शायद कोई शाम को खिड़की के पास बैठकर कहेगा—

“काश… उनसे थोड़ी और बातें की होतीं।”

उस दिन हमारे पास लौटने का कोई रास्ता नहीं होगा।

इसलिए आज ही कह दीजिए—

“मैं तुमसे प्यार करता हूँ।”

आज ही कह दीजिए—

“मुझे तुम्हारी याद आती है।”

आज ही कह दीजिए—

“माफ़ कर देना।”

और अगर किसी से बहुत समय से बात नहीं हुई,

तो कभी-कभी पहला कदम उठाने में कोई हार नहीं होती।

क्योंकि रिश्ते जीतने के लिए नहीं,

जीने के लिए होते हैं।

वक़्त… कब निकलोगे?

शायद वक़्त कभी जवाब नहीं देगा।

वह बस चलता रहेगा।

घड़ी की सुइयों की तरह।

सूरज की किरणों की तरह।

नदी के पानी की तरह।

मुट्ठी से गिरती रेत की तरह।

लेकिन शायद सवाल यह नहीं होना चाहिए—

“वक़्त, कब निकलोगे?”

सवाल यह होना चाहिए—

“जब तक तुम मेरे पास हो… मैं तुम्हें कैसे जी रहा हूँ?”

क्योंकि अंत में हमारे पास यह कहने का अवसर नहीं होगा कि हमने कितना कमाया,

कितना बनाया,

कितना जमा किया,

कितने लोगों को पीछे छोड़ा।

शायद उस आख़िरी मोड़ पर बस यही याद आएगा—

किसे गले लगाया था।

किसके आँसू पोंछे थे।

किसके साथ हँसे थे।

किसे माफ़ किया था।

और कितनी शामें हमने सचमुच महसूस की थीं।

इसलिए आज…

थोड़ा धीरे चलिए।

चाय को जल्दी-जल्दी मत पीजिए।

बच्चे की बात बीच में मत काटिए।

किसी बुज़ुर्ग के पास बैठिए।

किसी पुराने दोस्त को याद कीजिए।

अपने मन को थोड़ी ख़ामोशी दीजिए।

और आज शाम जब सूरज डूबे,

तो कुछ पल उसके साथ बैठकर देखिए।

शायद तब आपको महसूस हो—

वक़्त मुट्ठी से रेत की तरह फिसल जरूर रहा है,
लेकिन उसकी हर गिरती हुई रेत में
एक खूबसूरत पल अब भी चमक रहा है।

उसे पकड़ने की कोशिश मत कीजिए।

बस…

जी लीजिए।

क्योंकि शायद ज़िंदगी का सबसे बड़ा सच यही है—

वक़्त कभी नहीं रुकता…
लेकिन हम चाहें तो उसके साथ चलते हुए
हर पल को एक ख़ूबसूरत याद बना सकते हैं।

और जब अगली बार मन बहुत बेचैन होकर पूछे—

“वक़्त… कब निकलोगे?”

तो अपने भीतर से एक आवाज़ आए—

“मैं निकल नहीं रहा…
मैं तुम्हें याद दिलाने आया हूँ कि
ज़िंदगी अभी बाकी है।”

तो फिर… जब वक़्त सचमुच आपकी मुट्ठी से फिसलने लगेगा, क्या आप उसे रोकने की कोशिश करेंगे—या उसके साथ बैठकर उसे जीना चुनेंगे?

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