"भैया कलाई आपकी... राखी मेरी..."--राखी की थाली की सुगबुगाहट

 

भैया, कलाई आपकी, राखी मेरी..

रक्षाबंधन की रस्मों के लिए सजी थाली, जिसमें राखी और मिठास के लिए मिश्री रखी है

माथा आपका, रोली मेरी...

कल रक्षाबंधन है।

पूरा घर जैसे किसी मीठी-सी प्रतीक्षा में डूबा हुआ है।

रसोई से उठती मिठाइयों की खुशबू...

आँगन में रखी पूजा की थाली...

और कमरे के एक कोने में बैठी ..प्यारी बहना 

जो अपनी  भाइयों के लिए लाई हुई राखियों को बार-बार सजा रही है।

कभी लाल वाली राखी सबसे बड़ी लगती...

तो कभी मोतियों वाली सबसे सुंदर।

उसे देखकर माँ मुस्कुरा दीं।

फिर बोलीं—

"बेटा, राखियाँ तो बहुत प्यार से सजा लीं...
अब सुबह के लिए दूब और ताज़ा पानी भी भर लेना।
पूजा की थाली तभी पूरी मानी जाएगी।"

प्यारी बहना  ने "हाँ  माँ" कहकर थाली वहीं रख दी और दूसरे काम में लग गई।

रात गहराने लगी...

घर के सभी लोग सो गए।

लेकिन...

आज शायद राखी की थाली को नींद नहीं आ रही थी।

जैसे ही चाँदनी खिड़की से भीतर आई...

थाली में रखी राखी ने धीरे से करवट ली...

और मुस्कुराकर बोली—

"भैया कलाई आपकी...
राखी मेरी..."

इतना सुनते ही रोली खिलखिलाकर हँस पड़ी...

"अरी बहन...
कलाई की बात बाद में करना।
सबसे पहले तो माथा मेरा है..."

पास रखा चावल भी चुप कहाँ रहने वाला था...

"तुम दोनों हर साल यही बहस करती हो।
कोई यह भी पूछे कि बिना मेरे तिलक पूरा कैसे होगा?"

इतने में दीपक अपनी लौ सँभालते हुए बोला—

"धीरे बोलो...
कहीं सुबह होने से पहले
हमारा सारा राज़ ही न खुल जाए..."

और फिर...

उस रात...

राखी की थाली में ऐसी बातें हुईं...

जिन्हें शायद हर भाई और हर बहन को एक बार ज़रूर सुनना चाहिए। 

"राखी की थाली आज कुछ ज़्यादा ही सजी हुई थी।

 लेकिन आज उसमें एक अनोखी हलचल थी। 

जैसे हर वस्तु कुछ कहना चाहती हो..."

सबसे पहले राखी मुस्कुराकर बोली—

"भैया कलाई आपकी... लेकिन आज से यह धागा केवल मेरा नहीं,

 आपके हर वचन का भी होगा।"

इतने में रोली हँस पड़ी—

"अरी बहन! तू तो हर बार यही कहती है। पहले मेरा काम होने दे।

 माथा उनका... लेकिन तिलक मेरा।

 जब तक मैं उनके ललाट पर शुभता का रंग न भरूँ, तेरी डोरी भी अधूरी है।"

पीछे बैठा चावल धीरे से बोला—

"तुम दोनों हमेशा अपनी-अपनी बात करती हो। कोई मुझसे भी पूछो।

 मैं छोटा ज़रूर हूँ, लेकिन बिना मेरे तिलक पूर्ण कहाँ होता है?

 मैं तो हर वर्ष यही कामना लेकर आता हूँ कि इस घर की समृद्धि कभी कम न हो।"

इतने में दीपक अपनी लौ सँभालते हुए बोला—

"तुम सब अपने-अपने महत्व की बात कर रहे हो, लेकिन अंधेरा हटाना

 मेरा काम है। रिश्तों में यदि कभी गलतफ़हमियों का अंधेरा आ जाए,

 तो याद रखना... प्रेम का एक छोटा-सा दीप भी उसे मिटा सकता है।"

पास रखी मिठाई खिलखिलाकर बोली—

"अरे! इतना गंभीर मत बनो। मैं इसलिए आती हूँ कि रिश्तों में मिठास बनी रहे। 

वरना केवल वचन और संस्कार ही नहीं, मुस्कान भी ज़रूरी है।"

सबकी बातें सुनकर नारियल बोला—

"तुम सब बाहर की सुंदरता हो। मैं भीतर की सच्चाई का प्रतीक हूँ।

 मेरा कठोर खोल देखकर कोई भ्रमित न हो। प्रेम भी ऐसा ही होता है—

बाहर से अनुशासन, भी

तर से कोमलता।"

इतने में थाली के कोने में रखा कलावा मुस्कुराया—

"राखी बहन है, मैं उसका साथी। मैं याद दिलाता हूँ कि हर बंधन 

केवल उत्सव का नहीं होता, कुछ बंधन जिम्मेदारियों के भी होते हैं।"

राखी फिर बोली—

"भैया... हर वर्ष मैं आपकी कलाई पर बँध जाती हूँ। लोग कहते हैं 

कि मैं आपकी रक्षा का वचन लेती हूँ। पर क्या केवल बहन की रक्षा ही भाई का धर्म है?"

भैया मुस्कुराए—

"नहीं बहना... रक्षा केवल संकट से नहीं होती। तुम्हारे आत्मसम्मान की रक्षा भी मेरा धर्म है।

 तुम्हारे सपनों का सम्मान भी मेरी जिम्मेदारी है। और जब कभी तुम थक जाओ,

 तुम्हें यह विश्वास दिलाना कि तुम अकेली नहीं हो—यही मेरी सच्ची राखी है।"

बहन की आँखें नम हो गईं।

इतने में रोली फिर बोली—

"और बहन... तुम्हारा भी एक धर्म है। भाई की हर गलती पर केवल चुप

 रह जाना प्रेम नहीं होता। कभी-कभी सच कहना भी राखी निभाना होता है।"

थाली में एक पल के लिए मौन छा गया।

फिर दीपक धीरे से बोला—

"देखा... आज किसी ने रक्षा को अधिकार नहीं बनाया। सबने उसे कर्तव्य बना दिया।"

इतने में खिड़की से आती हवा ने राखी को हल्के से छू लिया।

राखी मुस्कुराई और बोली—

"मैं केवल रेशम का धागा नहीं हूँ। मैं उस विश्वास का नाम हूँ,

 जो कहता है—दूरी चाहे कितनी भी हो, रिश्ता नहीं टूटेगा।"

चावल ने हँसते हुए कहा—

"और मैं हर वर्ष यह याद दिलाने आता हूँ कि छोटे-छोटे दाने मिलकर ही अन्न बनते हैं।

 वैसे ही छोटे-छोटे प्रेम, छोटे-छोटे त्याग और छोटे-छोटे सम्मान मिलकर ही परिवार बनाते हैं।"

मिठाई ने तुरंत बात आगे बढ़ाई—

"अगर मन में कड़वाहट जमा हो जाए, तो पहले उसे दूर करो। 

वरना मेरे मीठे होने का भी क्या लाभ?"

दीपक की लौ अब और स्थिर हो गई थी।

उसने धीमे से कहा—

"रिश्ते तब तक उजले रहते हैं, जब तक उनमें 'मैं' कम और 'हम' अधिक होता है।"

राखी ने भाई की कलाई पर बँधते हुए  कहा—

"भैया... कलाई आपकी, राखी मेरी।
माथा आपका, रोली मेरी।
मुस्कान आपकी, दुआ मेरी।
संघर्ष आपका, विश्वास मेरा।
सम्मान आपका ही नहीं... हर नारी का हो।
और स्नेह केवल मेरा नहीं... हर रिश्ते का हो।"

भैया ने बहन का माथा चूमते हुए उत्तर दिया—

"और बहना...
तुम्हारी रक्षा केवल मेरे हाथों से नहीं,
मेरे विचारों से भी होगी।
क्योंकि जिस दिन हर पुरुष,
 

हर स्त्री का सम्मान करना सीख जाएगा...
उस दिन हर दिन रक्षाबंधन होगा।"

दीपक की लौ मुस्कुरा उठी...


रोली और चावल ने तिलक को पूर्ण किया...

मिठाई ने मिठास बाँटी...

और वह छोटा-सा रेशमी धागा चुपचाप कह गया—

"मैं धागा नहीं...
प्रेम, विश्वास, सम्मान और उत्तरदायित्व का वह बंधन हूँ,
जो केवल कलाई पर नहीं,
हृदय में बँधता है।" 

     (तो क्यों न इस बार राखी की थाली की भी सुन ली जाये।

       और रिश्तों को और मजबूत बनाया जाये )

खामोश कलम  की  और  

राखी की  शुभकामनायें 🌺

 


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