दिल ढूँढ़ता है फिर वही फ़ुर्सत के रात-दिन"-खोए सुकून की तलाश
दिल ढूँढ़ता है फिर वही फ़ुर्सत के रात-दिन
शाम धीरे-धीरे उतर रही थी।
खिड़की के बाहर आसमान पर सूरज की आख़िरी रोशनी ठहरने की कोशिश कर रही थी।
चिड़ियाँ अपने-अपने घोंसलों की तरफ़ लौट रही थीं। पेड़ों के पत्ते हवा के साथ ऐसे हिल रहे थे,
जैसे दिनभर की थकान के बाद एक-दूसरे से कोई धीमी-सी बात कर रहे हों।
और मैं...
अपने ही कमरे में बैठी, हाथ में मोबाइल लिए, जाने कितनी चीज़ें देख रही थी।
संदेश थे।
सूचनाएँ थीं।
काम थे।
लोग थे।
दुनिया थी।
बस... मैं नहीं थी।
अचानक मन के किसी बहुत पुराने कोने से एक आवाज़ आई—
“दिल ढूँढ़ता है फिर वही फ़ुर्सत के रात-दिन...”
और लगा जैसे किसी ने वर्तमान की भीड़ में हाथ पकड़कर मुझे बहुत पीछे खींच लिया हो।
उस समय में...
जब शाम का मतलब सचमुच शाम होती थी।
जब रात का मतलब चैन से सोना होता था।
जब मिलने के लिए किसी स्क्रीन की ज़रूरत नहीं पड़ती थी।
और जब ख़ुश रहने के लिए कोई बड़ी वजह भी नहीं चाहिए होती थी।
क्या सचमुच हमें फुर्सत चाहिए?
शायद नहीं।
हमें सिर्फ़ अपने होने का एहसास चाहिए।
फुर्सत तो हमारे पास आज भी है, लेकिन हमने उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँट दिया है।
कुछ मिनट मोबाइल के लिए।
कुछ मिनट काम के लिए।
कुछ मिनट दूसरों की ज़िंदगी देखने के लिए।
और जो थोड़ा-सा समय बचता है, उसमें हम अपने ही मन से भागने लगते हैं।
कभी सोचा है...
आख़िर हम इतनी जल्दी में कहाँ जा रहे हैं?
सुबह आँख खुलते ही दिन शुरू हो जाता है। काम, घर, रिश्ते, ज़िम्मेदारियाँ, फोन, संदेश, खबरें...
फिर रात आती है।
हम थके हुए बिस्तर पर लेटते हैं और सोचते हैं—
“आज भी अपने लिए समय नहीं मिला।”
लेकिन शायद सच यह है कि हमने अपने लिए समय बनाया ही नहीं।
बचपन की वे बेफ़िक्र शामें
याद है वह समय?
जब गर्मियों की शामें कुछ लंबी हुआ करती थीं।
घर के बाहर चारपाई बिछ जाती थी।
आसमान में तारे निकलते थे।
हाथ में पंखा होता था और पास बैठा कोई अपना।
किसी को जल्दी नहीं थी।
बातें होती थीं।
कभी बिना मतलब की।
कभी पुरानी।
कभी वही बात बार-बार।
लेकिन उन बातों में एक अजीब-सा सुकून था।
आज हमारे पास बात करने के लिए हज़ारों लोग हैं, फिर भी दिल की बात कहने के लिए कोई एक अपना ढूँढ़ना मुश्किल हो गया है।
तब लोग कम थे, मगर रिश्ते गहरे थे।
आज लोग बहुत हैं, मगर समय कम है।
शायद इसलिए दिल बार-बार उसी पुराने समय को पुकारता है।
दिल ढूँढ़ता है फिर वही फ़ुर्सत के रात-दिन...
जब शाम सिर्फ़ शाम हुआ करती थी
आज शाम होते ही मन पूछता है—
क्या-क्या करना बाकी है?
लेकिन कभी शाम ऐसी भी होती थी जब बस यह देखा जाता था कि आसमान कितना सुंदर हो गया है।
सूरज डूब रहा है...
हवा थोड़ी ठंडी हो गई है...
पेड़ों पर लौटती चिड़ियाँ कितनी सुंदर लग रही हैं...
और दूर कहीं किसी घर से आती चाय की खुशबू मन को बिना किसी वजह के ख़ुश कर देती थी।
हमारे पास तब शायद बहुत कम था।
लेकिन हम उस कम में भी पूरा जीवन जी लेते थे।
आज हमारे पास सुविधाएँ बहुत हैं।
लेकिन सुविधा और सुकून एक ही चीज़ नहीं होते।
सुविधाएँ जीवन को आसान बनाती हैं।
सुकून जीवन को सुंदर बनाता है।
फुर्सत दरअसल मन की अवस्था है
शायद फुर्सत घड़ी में नहीं होती।
फुर्सत मन में होती है।
एक माँ अपने बच्चे के साथ बैठकर पाँच मिनट हँस ले, तो वही फुर्सत है।
एक पिता शाम को चुपचाप छत पर बैठकर डूबता सूरज देख ले, तो वही फुर्सत है।
दो पुराने दोस्त बिना किसी काम के घंटों बातें कर लें, तो वही फुर्सत है।
और कभी-कभी...
अपने कमरे में अकेले बैठकर अपने मन से पूछ लेना—
“तू कैसा है?”
शायद यह भी फुर्सत है।
हम दूसरों का हाल पूछते-पूछते थक जाते हैं।
बस अपने मन का हाल पूछना भूल जाते हैं।
हमें पुराने दिन नहीं, पुराना सुकून चाहिए
अक्सर हम कहते हैं—
“काश! वह समय वापस आ जाए।”
लेकिन क्या सचमुच हमें वही समय चाहिए?
शायद नहीं।
हमें वह उम्र नहीं चाहिए। ( तो फिर कुछ रुक जाये ..आओ बात करें ....बस बात )
हमें वह सुकून चाहिए जो उस उम्र में था।
हमें वह अपनापन चाहिए।
वह बेफ़िक्री चाहिए।
वह शाम चाहिए जिसमें घड़ी देखने की जल्दी न हो।
वह रात चाहिए जिसमें भविष्य की चिंता न हो।
वह रिश्ता चाहिए जिसमें हर बात समझाने की ज़रूरत न पड़े।
वह दोस्त चाहिए जिसके सामने ख़ामोश रहना भी बातचीत हो।
और सबसे ज़्यादा...
हमें अपना वह रूप चाहिए जो ज़िम्मेदारियों के नीचे कहीं दब गया है।
थोड़ा ठहरना भी ज़रूरी है
ज़िंदगी हमेशा दौड़ते रहने का नाम नहीं है।
कभी-कभी रास्ते के किनारे बैठकर देखना भी ज़रूरी है कि हम कहाँ से चले थे और कहाँ पहुँच गए।
हर मंज़िल के पीछे भागते-भागते कहीं ऐसा न हो कि रास्ते की ख़ूबसूरती ही भूल जाएँ।
इसलिए कभी...
मोबाइल एक तरफ़ रख दीजिए।
चाय बनाइए।
खिड़की खोलिए।
आसमान देखिए।
किसी पुराने गीत को सुनिए।
किसी पुराने दोस्त को याद कीजिए।
माँ की कोई पुरानी बात याद कीजिए।
बचपन की कोई तस्वीर निकालिए।
और फिर अपने आप से कहिए—
“आज कहीं नहीं जाना... आज बस थोड़ा जीना है।”
शायद उस दिन आपको समझ आएगा कि फुर्सत कहीं गई नहीं थी।
हम ही उससे दूर चले गए थे।
कुछ रातें सिर्फ़ सोने के लिए नहीं होतीं
कुछ रातें अपने भीतर उतरने के लिए होती हैं।
जब दुनिया सो रही हो और हम खिड़की के पास बैठकर चाँद को देखते रहें।
जब कोई पुरानी याद अचानक आँखों में उतर आए।
जब किसी बिछड़े हुए इंसान की आवाज़ मन में सुनाई दे।
जब बिना किसी वजह के मुस्कुराहट आ जाए...
और फिर आँखें नम हो जाएँ।
ये वही पल हैं जिन्हें हम अक्सर व्यर्थ समझ लेते हैं।
लेकिन शायद जीवन इन्हीं छोटे-छोटे पलों से बना है।
बड़ी ख़ुशियाँ तो कभी-कभी आती हैं।
सच्चा सुकून अक्सर छोटी चीज़ों में छुपा रहता है।
फिर वही फुर्सत के रात-दिन...
शायद वह समय लौटकर कभी नहीं आएगा।
वही लोग नहीं होंगे।
वही घर नहीं होगा।
वही बचपन नहीं होगा।
वही शामें भी नहीं होंगी।
लेकिन एक बात हमारे हाथ में आज भी है—
हम अपने जीवन में थोड़ा-सा वही सुकून वापस ला सकते हैं।
आज भी किसी अपने के पास बैठ सकते हैं।
आज भी बिना वजह हँस सकते हैं।
आज भी कुछ देर चुप रह सकते हैं।
आज भी बारिश को खिड़की से देख सकते हैं।
आज भी चाँद को देखकर मुस्कुरा सकते हैं।
आज भी अपने मन को थोड़ा आराम दे सकते हैं।
शायद हमें अतीत में लौटने की ज़रूरत नहीं।
हमें बस वर्तमान में थोड़ा ठहरने की ज़रूरत है।
क्योंकि...
जिस फुर्सत को हम बीते दिनों में ढूँढ़ रहे हैं,
हो सकता है वह आज भी हमारे आसपास बैठी हो।
बस हम इतने व्यस्त हैं कि उसे देख नहीं पा रहे।
शाम अब भी उतरती है।
चाँद अब भी निकलता है।
हवा अब भी चलती है।
चिड़ियाँ अब भी घर लौटती हैं।
और दिल...
दिल आज भी वही है।
बस उसकी आवाज़ बहुत शोर के नीचे दब गई है।
तो आज ज़रा उस शोर से दूर होकर सुनिए।
शायद वह बहुत धीरे से कह रहा हो—
“दिल ढूँढ़ता है फिर वही फ़ुर्सत के रात-दिन...”
और शायद इस बार जवाब अतीत से नहीं...
आपके अपने भीतर से आए।
एक सवाल...ये तो बनता है -(ये जवाब खुद को ज़रूर दीजिये )
अगर आज आपको दुनिया की सारी व्यस्तताओं से सिर्फ़ एक शाम की फुर्सत मिल जाए—
तो आप वह शाम किसके साथ, कहाँ और कैसे बिताना चाहेंगे? ( ये जवाब खुद को ज़रूर दीजिये )
तो फिर कुछ रुक जाये। ..आओ बात करें ....बस बात ....खुद से
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