"चलो एक बार बच्चे बन जाते हैं… बचपन में घूम कर आते हैं"
चलो एक बार बच्चे बन जाते हैं… बचपन में घूम कर आते हैं
चलो...
आज ज़रा बड़े होने की जिम्मेदारियाँ उतार दें,
और एक बार फिर
छोटे-छोटे कदमों में दुनिया नापने निकल जाएँ…
चलो…
एक बार बच्चे बन जाते हैं,
बचपन की गलियों में
फिर से खो जाते हैं…
वो सुबह याद है…
जब नींद अलार्म से नहीं,
माँ की आवाज़ से खुलती थी—
“उठ जा, सूरज निकल आया…”
और हम आधी बंद आँखों से
चादर में दुबक कर सोचते थे—
“काश… आज स्कूल बंद हो जाए…”
बचपन…
एक ऐसा मौसम था
जिसमें हर दिन बसंत लगता था।
न कोई EMI,
न कोई हिसाब,
न रिश्तों की उलझन,
न दुनिया का जवाब…
बस मिट्टी की खुशबू,
और आँखों में
अनगिनत ख्वाब…
यादों की वो पहली गली
उस गली में चलते हैं
जहाँ कंचे खेलते-खेलते
शाम कब हो जाती थी,
पता ही नहीं चलता था।
जहाँ पतंग की डोर
हाथों से नहीं,
दिल से बंधी होती थी।
जहाँ हारने पर आँसू आते थे,
और जीतने पर
पूरा मोहल्ला सुन लेता था—
“मैं जीत गया…!”
"वैज्ञानिक भी कहते हैं कि बचपन की यादें हमें गर्माहट,
अपनापन और पहचान का एहसास कराती हैं, क्योंकि उस समय हम बिना शर्त प्यार महसूस करते हैं।"
शायद इसी लिए…
जब भी हम थक जाते हैं,
तो दिल खुद ही
बचपन की ओर भाग जाता है।
मिट्टी, बारिश और कागज़ की नाव
वो बारिश का पहला दिन…
जब किताबों से ज्यादा
दिल कागज़ की नाव बनाने में लगता था।
छोटी-सी नाव,
और बड़ी-सी उम्मीद—
कि वो पूरी नाली पार कर जाएगी…
और जब नाव डूब जाती थी,
तो हम रोते नहीं थे,
बस हँसकर कहते थे—
“अगली बार बड़ी नाव बनाएँगे…”
काश…
आज भी हम
ज़िंदगी की हर डूबी नाव पर
ऐसे ही मुस्कुरा पाते… चलो एक बार बच्चे बन जाते हैं
बचपन — जहाँ दोस्ती सबसे सच्ची थी
वो दोस्त…
जिससे रोज़ लड़ाई होती थी,
और अगले ही पल
उसके बिना खेल अधूरा लगता था।
न कोई EGO
न कोई FORMALITIES…
बस एक आवाज़—
“चल खेलते हैं…”
और सब ठीक हो जाता था।
"मनोवैज्ञानिक(Phycologist) मानते हैं कि पुरानी यादों को
याद करना रिश्तों की भावना को मजबूत करता है और जीवन में अर्थ का एहसास बढ़ाता है। "
शायद इसलिए…
आज भी जब किसी पुराने दोस्त का नाम सुनते हैं,
तो चेहरे पर
अनजानी मुस्कान आ जाती है।
स्कूल — जहाँ किताबों से ज्यादा कहानियाँ थीं
वो स्कूल का पहला दिन…
जब बैग भारी लगता था,
और दिल हल्का…
टिफिन में रखा पराठा
अपना कम,
दोस्तों का ज्यादा होता था।
और वो आखिरी पीरियड…
जो कभी खत्म ही नहीं होता था।
लेकिन आज…
उसी स्कूल की याद
दिल को सबसे ज्यादा सुकून देती है।
क्योंकि शोध बताते हैं कि पुरानी यादें आत्मविश्वास बढ़ाती हैं और मन को सकारात्मक ऊर्जा देती हैं, खासकर कठिन समय में।
माँ की गोद — सबसे सुरक्षित जगह
बचपन की सबसे प्यारी जगह…
न कोई पार्क,
न कोई मैदान…
बस माँ की गोद…
जहाँ हर डर छोटा लगता था,
और हर आँसू
पल भर में सूख जाता था।
वो गोद…
जिसमें सोकर
हम दुनिया की सबसे बड़ी जीत महसूस करते थे।
आज समझ आता है—
बचपन की असली खुशी
खिलौनों में नहीं,
रिश्तों में थी।
बचपन — एक एहसास, जो कभी बूढ़ा नहीं होता
बचपन…
एक उम्र नहीं,
एक एहसास है।
जो हर इंसान के अंदर
हमेशा ज़िंदा रहता है।
कभी किसी पुराने गाने में,
कभी किसी खुशबू में,
कभी किसी तस्वीर में…
और अचानक—
हम बड़े इंसान से
फिर छोटे बच्चे बन जाते हैं।
वैज्ञानिक कहते हैं कि पुरानी यादों में जाना, रचनात्मकता और उम्मीद को बढ़ाता है, और कठिन समय में मन को सहारा देता है।
khamosh kalam whispers:-
खामोश कलम जब चलती है,
तो आवाज़ नहीं करती…
पर दिल के हर कोने को
छू जाती है…
“बचपन वो किताब है,
जिसके पन्ने फट भी जाएँ,
तो भी उसकी खुशबू
कभी कम नहीं होती…”
“हम बड़े जरूर हो गए हैं,
पर अंदर का बच्चा
आज भी कागज़ की नाव बनाना चाहता है…”
“जिंदगी ने बहुत कुछ सिखाया,
पर सबसे खूबसूरत सबक
बचपन ने ही दिया…”
जीवन का सबसे गहरा सच
सच कहें तो…
हम बचपन को नहीं,
उस सुकून को याद करते हैं—
जहाँ
हम जैसे थे,
वैसे ही स्वीकार किए जाते थे।
मनोविज्ञान बताता है कि याद हमें अपने पुराने ‘खुद’ से जोड़ता है और जीवन को अर्थपूर्ण महसूस कराता है।
इसलिए…
जब भी जीवन थका दे,
तो एक बार
बचपन की गलियों में
ज़रूर घूम आना…
वहाँ
कोई शिकायत नहीं मिलेगी—
बस मुस्कान मिलेगी…
(दिल से जुड़े सवाल)
Q1. हमें बचपन की यादें इतनी सुकून क्यों देती हैं?
ANSWER:--
क्योंकि बचपन वो समय होता है जब हम बिना शर्त प्यार और सुरक्षा महसूस करते हैं। जब हम उन यादों को याद करते हैं, तो दिमाग में सकारात्मक भावनाएँ सक्रिय होती हैं—जिससे आत्मविश्वास और खुशी बढ़ती है। यही कारण है कि कठिन समय में भी पुरानी यादें हमें ताकत देती हैं।
Q2. क्या बचपन को याद करना सिर्फ उदासी लाता है या खुशी भी?
ANSWER:--
बचपन की यादें अक्सर “bittersweet” होती हैं—थोड़ी खुशी, थोड़ी उदासी। लेकिन अधिकतर मामलों में ये यादें हमें रिश्तों की अहमियत और जीवन का अर्थ समझने में मदद करती हैं,
जिससे मन में आशा और जुड़ाव बढ़ता है।
आप भी बताइये :--बचपन में घूमने का मन होता है न ?
— दिल से
चलो…
आज की भागती दुनिया से
थोड़ा समय चुरा लें…
और एक बार फिर
बचपन की उस गली में जाएँ—
जहाँ
ना कल की चिंता थी,
ना आज का डर…
बस
एक छोटी-सी मुस्कान,
और
एक बड़ी-सी दुनिया…
चलो…
एक बार बच्चे बन जाते हैं…
बचपन में घूम कर आते हैं…
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Bahut sunder likha
जवाब देंहटाएंKaaash hum sab fir se bachpan main wapis ja skte💃
Bacpan ki yaadein sirf khushi hi lati hai
Bt phir bhi ye blog ne dil ko chuu liya
Bacpan ko yaad krke aankh bhar aayi
Ek picture ki tarah sab saamne aa gaya
Thanks for sharing dear ❤️
आप का दिल से धन्यवाद जी। ...
हटाएंआप ने मेरे विचारों को इतना मन से पढ़ा , मैंने उसी मन से लिखे थे
,किसी को अपना बचपन याद आ जाये