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मन पीछे क्यों भागता है? बीते कल की शिकायत छोड़, आज में जीना सीखें

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  मन पीछे क्यों भागता है? आज से शिकायत छोड़ जीने की कला शाम ढल रही थी। खिड़की के बाहर सूरज धीरे-धीरे संतरी होता जा रहा था, और भीतर एक स्त्री चाय का कप हाथ में लिए, आँखें बंद किए बैठी थी। चाय ठंडी हो चुकी थी, पर उसे होश ही नहीं था। उसका मन कहीं और था — बरसों पुराने किसी कमरे में, किसी आवाज़ में, किसी ऐसे पल में जो अब कभी लौटकर नहीं आएगा। बाहर पंछी घोंसलों की ओर लौट रहे थे, पर उसका मन लौटना ही नहीं जानता था — वह तो बस पीछे भागता रहता, बार-बार, उसी गली में, उसी दर्द में, उसी सवाल में — "ऐसा क्यों हुआ?" क्या आपने भी कभी खुद को ऐसे किसी पल में पाया है? जहाँ शरीर वर्तमान में बैठा हो, पर मन किसी बीते हुए कल में भटक रहा हो? यह कोई अकेली कहानी नहीं है। यह हर इंसान की कहानी है। मन का पुराना रिश्ता अतीत से मन, एक अजीब सा साथी है। यह हमेशा वहीं जाना चाहता है जहाँ दर्द छिपा हो, जैसे ज़ख्म पर बार-बार उंगली रखने की आदत। जो बीत गया, वह अब सिर्फ एक स्मृति है — एक परछाईं, जिसमें न रंग बचा है, न साँसें। फिर भी मन उसी परछाईं को गले लगाए बैठा रहता है, जैसे वह अब भी सच हो। सोचिए, नदी का पानी ...